दो पहाड़ों के बीच से ये जो खूबसूरत रास्ता आप देख रहे हैं कभी ये तस्वीर ऐसी नहीं थी। 65 साल पहले यहां 300 फीट लंबा पहाड़ हुआ करता था।
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तस्वीरें: बीवी की याद में हथौड़े से पहाड़ तोड़कर मांझी ने बनाया था रास्ता
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इस पहाड़ के कटने के बाद बिहार के गया जिले के वजीरगंज से मांझी के गांव गलोहर की दूरी लगभग 50 किलोमीटर तक कम हो गई।
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पहाड़ काटने जैसे इस हैरतअंगेज काम को अंजाम दिया बिहार की मुसहर किसान दशरथ मांझी ने। जिन्होंने 22 साल की अथक मेहनत के बल पर अकेले दम पर 300 फुट लंबे पहाड़ को काटकर एक चौड़ा रास्ता बना दिया।
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एक छैनी हथौड़े से पहाड़ का सीना चीरकर रास्ता बनाने वाले मांझी के संघर्ष की कहानी इतनी आसान भी नहीं है। अपने इसी भागीरथी प्रयास के जरिए मांझी ने देश दुनिया में अपनी पहचान बनाई। उन्होंने दिखाया कि कैसे एक आम आदमी अगर जीवन में कुछ ठान ले तो कुछ भी आसान किया जा सकता है।
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पहाड़ काटने का ये सिलसिला शुरू हुआ एक दुर्घटना से जब मांझी की पत्नी फाल्गुनी देवी उनके लिए खाना लाते समय पहाड़ से गिरकर चोटिल हो गई थी।
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दशरथ मांझी घायल पत्नी की जान बचाने के लिए उसे अस्पताल ले जाना चाहते थे लेकिन वो गांव से 70 किलोमीटर की दूरी पर था। दिक्कत ये थी कि उस समय आने जाने के लिए कोई साधन भी नहीं थे।
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नतीजा ये हुआ कि गरीब मांझी की पत्नी ने गांव में ही वैध के उपचार के दौरान दम तोड़ दिया। पत्नी की मौत ने मांझी को झकझोर दिया। जिसके बाद उन्होंने एक ऐसा निश्चय लिया जिससे हर कोई उन्हें अचंभे से देखने लगा।
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दशरथ ने अतरी और वजीरगंज के बीच की 75 किलोमीटर की दूरी को कम करने के लिए गहलौर के एक पहाड़ को काटने का निर्णय किया। जिसके काटने से दोनों ब्लाक के बीच की दूरी मात्र 15 किलोमीटर रह जाती।
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खेतों में मजदूरी करने वाले मांझी ने अपनी बकरियां बेचकर एक छैनी और हथौड़ा खरीदा। इसके बाद वो रात दिन पहाड़ को काटने के काम में जुट गए। उन्होंने अपनी झोपड़ी भी पहाड़ के निकट ही बना ली ताकि आने जाने में समय खर्च न हो।
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मांझी के इस काम की चर्चा गांव में हुई तो लोगों ने उन्हें पागल कहना शुरू कर दिया, लेकिन मांझी डटे रहे। साल 1960 से शुरू हुआ यह सिलसिला 1982 तक बिना रुके चलता रहा। जिसके बाद मांझी ने विशालकाय पहाड़ को काटकर 360 फीट लंबा, 25 फीट ऊंचा और 30 फीट चौड़ा रास्ता बना दिया।
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मांझी की इस अथक मेहनत से क्षेत्र के हजारों लोगों का जीवन सुलभ हो गया। इससे उनके पिछड़े आदिवासी इलाके की प्रमुख कस्बे से दूरी 75 किलोमीटर से घटकर मात्र 15 किलोमीटर रह गई। लोगों को अस्पताल जाने और बच्चों को स्कूल आने जाने में सहूलियत हो गई।
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मांझी के इस काम से उन्हें देश दुनिया में प्रसिद्िध मिली। लोग उन्हें माउंटेनमैन के नाम से जानने लगे। वहीं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी उन्हें सम्मानित किया।
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साल 2007 में 73 साल की उम्र में साहसी योद्धा मांझी की दिल्ली के एम्स अस्पताल में कैंसर से मौत हो गई थी। उनकी मौत के बाद उन पर कई फिल्में भी बनीं।
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अपने टीवी सीरियल सत्यमेव जयते में सामाजिक मुद्दों को उठाने वाले मशहूर अभिनेता आमिर खान भी मांझी के जीवन से इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने अपना एक एपिसोड उन्हें समर्पित किया और उनका जीवन छोटे पर्दे पर उकेरा।
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हाल ही में दशरथ मांझी फिर चर्चाओं में हैं। मशहूर फिल्मकार केतन देसाई ने उनके जीवन पर द माउंटनेमैन नाम से फिल्म बनाई है। जिसका ट्रेलर हाल ही में रिलीज हुआ है। इसमें बॉलीवुड अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दकी ने मांझी की भूमिका निभाते हुए उनके जीवन संघर्ष को दिखाया है।
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बिहार के एक मुसहर किसान की भूमिका को निभाने वाले नवाजुद्दीन ने अपना काफी समय उन्हीं के गांव में बिताया। नवाजुद्दीन के अनुसार फिल्म में भूमिका निभाते समय उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि मांझी ने कैसी कठिनाइयों में अपना जीवन काटा होगा।