शैलेशानंद महाराज, हरि गिरि महाराज और अवधेशपुरी महाराज
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संत समाज भी नाराज, यह धार्मिक स्वतंत्रता का हनन
स्वस्तिक पीठ के पीठाधीश्वर डॉ. अवधेशपुरी का कहना है कि दर्शन के नाम पर हो रही वसूली ने भक्त और भगवान में दूरी बना दी है। सरकार सोचें कि जिन भांजे-भांजियों को पांच किलो राशन मुफ्त दिया जा रहा है, उन गरीब परिवारों से महाकाल पर जल चढ़ाने के लिए 750 रुपये लेना कहां तक उचित है? गरीब भक्तों से सशुल्क दर्शन के नाम पर बाबा महाकाल के दर्शन से दूर करना उनके संवैधानिक मूल अधिकार से वंचित करना है। उनकी धार्मिक स्वतंत्रता को छीना जाना है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के महामंत्री हरिगिरि महाराज ने कहा कि महाकाल मंदिर की व्यवस्थाओं के अनुसार तो बाबा महाकाल के दर्शन और पूजन पर भी अब जैसे पूंजीपतियों का ही अधिकार हो गया है। यह गलत है। हमें इस ओर ध्यान देना चाहिए कि बाबा महाकाल पूंजीपतियों के ही बनकर न रह जाएं। मैं सरकार से इस बात की भी चर्चा करूंगा कि आम श्रद्धालुओं से महाकाल दूर न हो जाए। वह सबके थे, सबके हैं और सबके रहेंगे।
भगवान के दर्शन में व्यवसायीकरण न हो
जूना अखाड़ा के महामंडलेश्वर शैलेशानंद ने कहा कि बाबा महाकाल सभी के हैं। उनके दर्शन में भी समानता होनी चाहिए। राजस्व बढ़ाना अच्छी बात है। दर्शन के नाम पर शुल्क वसूले जाने का मैं पुरजोर विरोधी हूं। राजस्व अर्जन के लिए पूर्व की तरह मंदिर में फूलों से बिजली का उत्पादन, गौशाला और अन्य तरीकों से धन लाभ अर्जित किया जा सकता है। जिस प्रकार मंदिर में दर्शन के नाम पर टिकटों में अंतर किया गया है, यह किसी सिनेमाघर की तरह प्रतीत हो रहा है। इससे भक्त आहत हैं और श्रद्धालुओं में गलत संदेश पहुंच रहा है। हमारे देवस्थल दर्शन और तीर्थाटन के लिए हैं लेकिन इसे पर्यटन के रूप में जिस प्रकार से विकसित किया जा रहा है उसका मैं विरोधी हूं।