केंद्र सरकार द्वारा बुनकरों के लिए ''समर्थ योजना'', 90% अनुदान पर करघा वितरण, मुद्रा लोन जैसी योजनाएं चलाई जा रही हैं।
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हथकरघा की परंपरा और तकनीकी विकास
महेश्वर में हथकरघा उद्योग एक प्राचीन और सशक्त परंपरा रही है। यहां के डबल बॉक्स करघे पर कार्य करने वाले सिद्धहस्त बुनकर अत्यंत कुशलता से काम करते हैं। वर्ष 1921 में तत्कालीन शासक श्रीमंत तुकोजीराव होलकर ने ''विविंग एंड डाइंग डेमोंस्ट्रेशन फैक्ट्री'' की स्थापना की, ताकि बुनकरों को तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान किया जा सके। यह संस्थान आज "शासकीय हथकरघा महेश्वर" के नाम से जाना जाता है।
रेवा सोसायटी: पुनरुत्थान की कहानी
1978 में देवी अहिल्याबाई होल्कर के वंशज प्रिंस शिवाजीराव होल्कर व शालिनी देवी होल्कर ने "रेवा सोसायटी" की स्थापना कर महेश्वरी साड़ियों को एक नया स्वरूप दिया। इस संस्था ने सैकड़ों बुनकरों को प्रशिक्षित कर उन्हें रोजगार प्रदान किया और महेश्वरी हैंडलूम को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित किया।
डिजाइनों में रचनात्मकता और नर्मदा की छाप
महेश्वरी साड़ियों की डिजाइनों में समयानुकूल परिवर्तन होते रहे हैं। घाटों, मंदिरों, किलों और नर्मदा की लहरों से प्रेरित कलाकृतियां साड़ियों की बॉर्डर और पल्लू पर उकेरी जाती हैं। आज भी राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता श्याम रंजन सेन गुप्ता जैसे डिजाइनर बुनकरों को नवीनतम डिजाइनों की प्रेरणा देते रहते हैं।
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