फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

MP Election 2023: जनसंघ, भाजपा और कांग्रेस की दो-दो पीढ़ियों ने किया राज; जानिए किसने कहां बनाई पकड़

सार

MP Assembly Election 2023: मालवा-निमाड़ ने मध्य प्रदेश को छह मुख्यमंत्री डॉ. कैलाशनाथ काटजू, भगवंतराव मंडलोई, प्रकाशचंद सेठी, कैलाश जोशी, वीरेंद्र कुमार सखलेचा और सुंदरलाल पटवा दिए और इनमें से चार के वंशज भी यहां की राजनीति में अहम भूमिका में रहे।
विज्ञापन
1 of 13
मध्य प्रदेश की वंशवाद राजनीति। - फोटो : Amar Ujala Digital
राजनीति में वंशवाद की बेल गहरी जड़ों के साथ मालवा-निमाड़ में भी खूब फली-फूली हैं। यहां जनसंघ, भाजपा और कांग्रेस के कई नेताओं की दो-दो पीढ़ियों ने राज किया है और इनका यहां की राजनीति में खासा दबदबा भी रहा है। मालवा-निमाड़ ने मध्य प्रदेश को छह मुख्यमंत्री डॉ. कैलाशनाथ काटजू, भगवंतराव मंडलोई, प्रकाशचंद सेठी, कैलाश जोशी, वीरेंद्र कुमार सखलेचा और सुंदरलाल पटवा दिए और इनमें से चार के वंशज भी यहां की राजनीति में अहम भूमिका में रहे। इसी तरह इस अंचल से जो तीन नेता शिवभानुसिंह सोलंकी, सुभाष यादव और जमुना देवी उपमुख्यमंत्री बने उन तीनों के वंशजों का भी यहां की राजनीति में खासा दखल है।
विज्ञापन

2 of 13
कैलाश जोशी और दीपक जोशी - फोटो : Amar Ujala Digital
कैलाश जोशी-दीपक जोशी
राजनीति के संतपुरुष कैलाश जोशी बागली क्षेत्र से लगातार सात चुनाव जीते। वे ऐसे नेता हैं, जिन्हें जनता वोट के साथ चुनाव खर्च के लिए नोट भी देती थी। 1998 में पहला चुनाव हारे तो पार्टी ने राज्यसभा में भेज दिया। भोपाल से दो बार सांसद भी रहे। बेटे दीपक की स्थिति पूत के पांव पालने में दिखने जैसी रही। छात्र राजनीति में खूब नाम कमाया। भोपाल के हमीदिया कालेज के अध्यक्ष रहे, जनता विद्यार्थी मोर्च के प्रांत संयोजक रहे और 2003 में अपने पिता के परंपरागत क्षेत्र बागली से विधायक चुने गए। परिसीमन में इसके सुरक्षित हो जाने के बाद 2008 में हाटपिपल्या से चुनाव जीते। 2013 में फिर यहीं से जीते, लेकिन 2018 में हार गए। अब दीपक कांग्रेस में हैं और कन्नौद-खातेगांव सीट से मजबूत दावेदार हैं।
विज्ञापन

3 of 13
वीरेंद्र कुमार सखलेचा और ओमप्रकाश सखलेचा - फोटो : Amar Ujala Digital
वीरेंद्र कुमार सखलेचा और ओमप्रकाश सखलेचा
जब मध्य प्रदेश में जनसंघ के पास गिने-चुने विधायक होते थे, तब उनमें से एक नाम वीरेंद्र कुमार सखलेचा का था। जावद से वे कई बार विधायक चुने गए। संविद सरकार में वे जनसंघ के कोटे से उपमुख्यमंत्री रहे फिर राज्यसभा सदस्य बने। 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री बने। 1980 में वे चुनाव जीते पर धीरे-धीरे पार्टी की मुख्यधारा की राजनीति से अलग होते गए। आखिरी चुनाव उन्होंने 1998 में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जावद से लड़ा, लेकिन जीत नहीं पाए। इसके पहले भी वे बागी प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरे थे। 2003 में जब मध्य प्रदेश में उमा भारती की अगुवाई में चुनाव लड़ा गया था, तब इनके उद्योगपति बेटे ओमप्रकाश सखलेचा को पहली बार जावद से पार्टी टिकट मिला तो पिता की पुण्याई काम आई और जीत गए। तब से अब तक वे लगातार चार चुनाव जीत चुके हैं और इस बार फिर मैदान में हैं।

सुंदरलाल पटवा और सुरेंद्र पटवा
1957 सुंदरलाल पटवा पहली बार विधायक बने, उसके बाद विधानसभा और लोकसभा के कई चुनाव जीते। दो बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में केंद्र में कई विभागों के मंत्री रहे। मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी रहे और भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष भी रहे। दत्तक पुत्र सुरेंद्र पटवा भोजपुर से तीन बार विधायक चुने जा चुके हैं और शिवराज मंत्रिमंडल में मंत्री भी रहे।

4 of 13
भगवंतराव मंडलोई - फोटो : Amar Ujala Digital
भगवंतराव मंडलोई और नंदा मंडलोई
भगवंतराव मंडलोई दो अलग-अलग चक्र में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। वे खंडवा से विधायक चुने गए थे। उनके सक्रिय राजनीतिक से दूर होने के सालों बाद उनकी बहू नंदा मंडलोई 1984 में खंडवा से विधायक बनीं, लेकिन इनकी राजनीतिक पारी ज्यादा लंबी नहीं रही।

शिवकुमार सिंह और महेंद्र सिंह और सुरेंद्र सिंह शेरा और मंजू ठाकुर
निमाड़ खासकर पूर्वी निमाड़ की राजनीति में ठाकुर नवलसिंह बड़ा नाम रहे। बेटे शिवकुमार सिंह को भी राजनीति में बड़ा मुकाम हासिल हुआ। 1972 में पहली बार विधायक बने थे। फिर विधानसभा और लोकसभा के कई चुनाव जीते। 1998 में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद शपथ लेने के पूर्व ही खंडवा से बुरहानपुर लौटते समय रेलवे स्टेशन पर निधन हो गया। उपचुनाव में बेटी मंजू ठाकुर विधायक बनी। एक भाई महेंद्र सिंह कई बार बुरहानपुर के महापौर और बाद में खंडवा से सांसद भी रहे। छोटे भाई सुरेंद्रसिंह अभी बुरहानपुर से विधायक हैं।
विज्ञापन

5 of 13
शिवभानु सिंह सोलंकी और सूरजभान सोलंकी - फोटो : Amar Ujala Digital
शिवभानु सिंह सोलंकी और सूरजभान सोलंकी
शिवभानुसिह सोलंकी सालों तक धार जिले की मनावर सीट से विधायक रहे। कई मुख्यमंत्रियों की कैबिनेट में रहे और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का दायित्व भी संभाला। 1980 में कांग्रेस को बहुमत मिलने के बाद वे मुख्यमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार थे, लेकिन आलाकमान ने अर्जुन सिंह को मौका दे दिया। सोलंकी जब राजनीति के उत्तरार्ध में थे, तब अपने पायलट बेटे सूरजभानु सोलंकी को जिनका राजनीति से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था, धार से लोकसभा का चुनाव लड़वाकर सांसद बनवाया। सूरजभानु दो बार धार से सांसद रहे और 2013 में हरसूद से विधानसभा चुनाव भी लड़े, लेकिन हार गए।

विक्रम वर्मा और नीना वर्मा
छात्र जीवन से राजनीति में सक्रिय विक्रम वर्मा धार सीट से 1977 में पहली बार विधायक बने। यहीं से कई चुनाव जीते। संसदीय सचिव और केबिनेट मंत्री रहे, नेता प्रतिपक्ष की भूमिका भी निभाई। 1998 में धार से ही विधानसभा चुनाव हारे भी। राज्यसभा सदस्य बनने के बाद केंद्र में खेल और युवा कल्याण मंत्री रहे। पत्नी नीना वर्मा 2008 में पहली बार विधायक बनी और लगातार तीन चुनाव जीत चुकी हैं।
विज्ञापन

6 of 13
जमुनादेवी और उमंग सिंगार। - फोटो : Amar Ujala Digital
जमुनादेवी और उमंग सिंगार
बुआ-भतीजे की यह जोड़ी धार की राजनीति में काफी चर्चा में रही। बुआ जमुनादेवी 60 के दशक में उस समय संसद में पहुंची जब वहां गिनी-चुनी महिलाएं ही नजर आती थीं। बाद में राज्यसभा में गईं फिर हार का सिलसिला चला और 1984 में कुक्षी से फिर विधानसभा में पहुंची। 1990 में हारी फिर लगातार जीतती गईं और दो साल पहले निधन तक उपमुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष बनी रहीं। बेटी डॉ. हेमा की राजनीति में कोई रुचि नहीं रही तो भतीजे उमंग सिंगार को पहली बार धार से लोकसभा चुनाव लड़वाया पर जीत नहीं पाया। उमंग 2008 में गंधवानी से विधायक बने और अभी तक लगातार जीत रहे हैं।

फूलचंद वर्मा और राजेंद्र वर्मा
सरकारी नौकरी छोड़कर फूलचंद वर्मा 1967 में पंधाना से पहली बार विधायक बने। बाद में देवास-शाजापुर और उज्जैन से कई लोकसभा चुनाव जीते। केंद्रीय अनुसूचित जाति आयोग के सदस्य भी रहे। बेटे राजेंद्र सोनकच्छ से उपचुनाव जीते और बाद में एक बार और विधायक रहे।
विज्ञापन

7 of 13
सीताराम साधौ - विजयलक्ष्मी साधौ - फोटो : Amar Ujala Digital
सीताराम साधौ और विजयलक्ष्मी साधौ
सीताराम साधौ जब तक जिंदा रहे उनकी सादगी की मिसाल दी जाती रही। कई चुनाव जीते संसदीय सचिव व निगम के अध्यक्ष रहे। 1984 में पार्टी ने एमबीबीएस कर रही इनकी बेटी विजयलक्ष्मी को मौका दिया तो वे महेश्वर से विधायक बनीं। फिर पांच चुनाव जीतीं। वे राज्यसभा में भी रही हैं।

बृजमोहन मिश्रा और अर्चना चिटनीस
बृजमोहन मिश्रा नेपानगर से कई बार विधायक रहे। दो चुनाव हारे भी। मध्यप्रदेश में मंत्री और विधानसभा अध्यक्ष भी रहे। बेटी अर्चना चिटनीस 2003 में नेपानगर से पहली बार विधायक बनी, बाद में बुरहानपुर से चुनाव जीती और केबिनेट मंत्री भी रही। 2018 में बुरहानपुर से विधानसभा चुनाव हार गई। अभी भाजपा की प्रदेश प्रवक्ता भी हैं।

8 of 13
नरेंद्र नाहटा - फोटो : Amar Ujala Digital
भंवरलाल नाहटा और नरेंद्र नाहटा
अपने समय के नामी वकील भंवरलाल नाहटा पहले सीतामऊ से विधायक रहे और 1980 में मंदसौर से सांसद चुने गए। 1984 में इनके इंजीनियर बेटे नरेंद्र नाहटा को कांग्रेस ने मनासा से सुंदरलाल पटवा के खिलाफ मैदान में उतारा तो पहले ही चुनाव में पटना जैसे दिग्गज को शिकस्त देकर जीते। बाद में दो चुनाव और जीते तथा दिग्विजय मंत्रीमंडल में मंत्री भी रहे।

लक्ष्मणसिंह गौड़ और मालिनी गौड़
संघ के प्रियपात्र लक्ष्मणसिंह गौड़ पहली बार 1993 में विधायक बने। शिवराज मंत्रिमंडल में स्कूल शिक्षा मंत्री बी रहे। इसके पहले उमा भारती ने उन्हें पंचज कार्यक्रम की जिम्मेदारी सौंपी थी। लगातार तीन बार चुनाव जीते। एक सड़क दुघटना में निधन के बाद पत्नी मालिनी गौड़ 2008 में पहला चुनाव लड़ी और तीनों में जीती। इंदौर की महापौर भी रही और इस बार फिर मैदान में हैं।

9 of 13
तुकोजीराव पवार और गायत्री राजे पवार - फोटो : Amar Ujala Digital
कृष्णाजीराव पवार-तुकोजीराव पवार और गायत्री राजे पवार
देवास के पूर्व शासक कृष्णाजीराव पवार देवास सीट से ही दो बार विधायक रहे। बेटे तुकोजीराव पिता से भी आगे निकले। 1990 में पहला चुनाव जीते और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। छह चुनाव जीते। इनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में पत्नी गायत्री राजे विधायक बनीं और 2018 में फिर चुनाव जीती। इस बार वे फिर मैदान में हैं।

कांतिलाल भूरिया और डॉ. विक्रांत भूरिया
1980 में कांतिलाल भूरिया पहली बार विधायक बने, तब से अब तक कई बार सांसद और विधायक रह चुके हैं। प्रदेश और केंद्र में मंत्री, प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। दो लोकसभा और एक विधानसभा चुनाव हारे भी हैं। इनके बेटे डॉ. विक्रांत भी राजनीति में सक्रिय हैं, मध्यप्रदेश युवक कांग्रेस के अध्यक्ष हैं पर 2018 में पहले विधानसभा चुनाव में शिकस्त खाना पड़ी।

10 of 13
सुभाष यादव और अरुण यादव - फोटो : Amar Ujala Digital
सुभाष यादव और अरुण यादव-सचिन यादव
सहकारी राजनीति के दिग्गज सुभाष यादव ने पहले संसद व बाद में विधानसभा में कांग्रेस का परचम लहराया। दो बार सांसद व तीन बार विधायक रहे। 2008 में कसरावद से विधानसभा चुनाव हारने के पहले अपने बड़े बेटे अरुण को दो लोकसभा चुनाव जितवाए। अरुण केंद्र में मंत्री और प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। छोटे बेटे सचिन दो बार विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं और कमलनाथ मंत्रिमंडल में मंत्री भी रहे।

प्रतापसिंह बघेल और सुरेंद्रसिंह बघेल (हनी)
1972 में प्रतापसिंह बघेल पहली बार विधायक बने। 1977 की जनता लहर में भी चुनाव जीते। 1980 में चुनाव जीतने के बाद अर्जुनसिंह मंत्रिमंडल में मंत्री बने। 1985 में धार से सांसद बने और 1993 में धरमपुरी से विधायक बनकर दिग्विजय मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री रहे। एक चुनाव भाजपा के टिकट पर भी कुक्षी से लड़े, लेकिन हार गए। बेटे सुरेंद्रसिंह दो बार कुक्षी से ही चुनाव जीत चुके हैं और कमलनाथ मंत्रिमंडल में मंत्री भी रहे। इस बार भी मैदान में हैं।

11 of 13
निर्मला भूरिया - फोटो : Amar Ujala Digital
दिलीप सिंह भूरिया और निर्मला भूरिया
1972 में पहली बार विधायक बने दिलीपसिंह भूरिया सालों तक झाबुआ जिले में कांग्रेस राजनीति के पर्याय रहे। 1980 से 1996 तक सांसद रहे। फिर भाजपा में चले गए। दो चुनाव लड़े पर हारे। फिर एक चुनाव जीते, पर निधन हो गया। इनकी बेटी निर्मला 1998 में कांग्रेस के टिकट से पेटलावद से विधायक बनीं। पिता के साथ भाजपा में चली गई और 2003 में फिर अपने पिता के परंपरागत क्षेत्र पेटलावद से चुनाव जीता। वे यहां से दो चुनाव जीत चुकी हैं, लेकिन पिता के निधन के बाद हुए लोकसभा उपचुनाव और 2018 के विधानसभा चुनाव में हारना पड़ा।

थावरचंद गेहलोत और जितेंद्र गेहलोत
वर्तमान में कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गेहलोत कई बार आलोट से विधायक रहे। पटवा मंत्रिमंडल में मंत्री भी रहे। बाद में देवास-शाजापुर क्षेत्र से सांसद रहते हुए केंद्र में मंत्री भी रहे। बेटे जितेंद्र 2013 में आलोट से ही विधायक बने, पर 2018 में हार गए। इस बार भी जितेंद्र यहीं से टिकट के प्रबल दावेदार हैं।

12 of 13
कैलाश विजयवर्गीय और आकाश विजयवर्गीय - फोटो : Amar Ujala Digital
कैलाश विजयवर्गीय और आकाश विजयवर्गीय
कैलाश विजयवर्गीय 1990 में पहली बार विधायक बने, इसके पहले इंदौर नगर निगम में पार्षद भी रहे। बाद में विधायक रहते हुए इंदौर के महापौर भी बने। 2008 तक लगातार छह बार विधायक रहे, वह भी तीन अलग-अलग क्षेत्र इंदौर-4, इंदौर-2 और महू से। इस बार फिर 10 साल बाद विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं इंदौर-1 से। बेटे आकाश को पहली बार 2018 में टिकट मिला और इंदौर-3 से विधायक बने।

किशोरीलाल वर्मा और देवेंद्र वर्मा
सरकारी नौकरी से राजनीति में आए किशोरीलाल वर्मा पंधाना से तीन चुनाव जीते और प्रदेश के शिक्षा राज्यमंत्री भी रहे। ओंकारेश्वर में पत्नी के साथ एक धार्मिक यात्रा के दौरान इनका मर्डर हो गया था। उपचुनाव में बेटे देवेंद्र पहली बार विधायक बने। परिसीमन के बाद खंडवा से लगातार चुनाव जीत रहे हैं।

वेस्ता पटेल, महेश पटेल, सेना पटेल और मुकेश पटेल
दबंग नेता की छवि रखने वाले वेस्ता पटेल अलीराजपुर से विधायक रहे। बाद में उनकी अपने ही विधानसभा क्षेत्र में हत्या हो गई थी। बड़े बेटे महेश पटेल को कांग्रेस दो बार अलीराजपुर और एक बार जोबट से टिकट दे चुकी है, पर तीनों बार हारे। छोटे बेटे मुकेश 2018 में अलीराजपुर से ही विधायक बने। बहू सेना पटेल भी अलीराजपुर से विधानसभा का चुनाव लड़ चुकी है और नगर पालिका अध्यक्ष भी रही है।

 
विज्ञापन

13 of 13
प्रेम सिंह दत्तीगांव और राज्यवर्धन सिंह - फोटो : Amar Ujala Digital
प्रेम सिंह दत्तीगांव और राज्यवर्धन सिंह
1990 में जब धार से कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया था, तब प्रेमसिंह दत्तीगांव बदनावर से विधायक बने। दो बार विधायक रहे। उनकी मौत के बाद बेटे राज्यवर्धन ने क्षेत्र संभाला और 2003 व 2008 बदनावर क्षेत्र से ही जीते। 2013 में हार गए, लेकिन 2018 में फिर जीते, अब भाजपा में आ गए हैं और उपचुनाव में जीत के बाद इस बार फिर मैदान में हैं।

उमराव सिंह पटेल और गजेंद्र पटेल
1977 की जनता लहर में उमरावसिंह बड़वानी से विधायक बने थे और बाद में शिक्षा मंत्री भी रहे। बाद में एक चुनाव और जीता। बेटे गजेंद्र भी राजनीति में सक्रिय हैं। भगवानपुरा से 2013 में विधानसभा का चुनाव हारे, पर 2019 में खरगोन बड़वानी क्षेत्र से लोकसभा सदस्य चुने गए। अभी भाजपा के प्रदेश महामंत्री भी हैं।

केशवराव देशमुख, दुर्गाबाई देशमुख, धैर्यशीलराव देशमुख और संयोगितादेवी देशमुख
केशवराव देशमुख 1962 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर पहली बार शाहपुर से विधानसभा चुनाव जीते। 1964 में पति की असामयिक मौत के बाद दुर्गाबाई देशमुख सोशलिस्ट पार्टी से चुनाव लड़ीं और दो बार विधायक रहीं। 11977 में इनके बेटे धैर्यशीलराव देशमुख जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े जीते और 1979 में कांग्रेस में चले गए। 1980 में फिर विधायक बने। 1996 में यहां उपचुनाव में देशमुख की पत्नी संयोगितादेवी विधायक बनी। वे 1998 में दोबारा चुनी गईं।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें