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यूपी: जिला पंचायत अध्यक्षी में बढ़ी भाजपा की चुनौती, बड़ा सवाल किस ओर जाएंगे निर्दलीय

Wed, 05 May 2021 02:43 PM IST
ishwar ashish अनिल श्रीवास्तव, अमर उजाला, लखनऊ
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- फोटो : social media
जिला पंचायत सदस्य के चुनाव नतीजों ने भाजपा की चुनौती बढ़ा दी है। नतीजों के एलान के साथ ही जिला पंचायतों पर काबिज होने के लिए भाजपा व सपा के बीच जोर-आजमाइश तेज हो गई है। सपा की राह भी बहुत आसान नहीं नजर आ रही है। इस चुनाव में जिला पंचायत सदस्य का चुनाव जीते निर्दलीयों की भूमिका काफी अहम हो गई है। देखने वाली बात यह भी होगी कि जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में वे किधर जाते हैं? हालांकि भाजपा की कोशिश जहां ज्यादा से ज्यादा जिलों में अपना जिपं अध्यक्ष बनवाने की है वहीं सपा भी कोई कसर बाकी नहीं रखना चाहती है।

जिला पंचायत सदस्य के नतीजों और इससे बने राजनीतिक परिदृश्य ने भाजपा के लिए चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। हालांकि अतीत पर नजर डालें तो जिपं अध्यक्ष के चुनाव में सत्तारूढ़ दल का ही दबदबा रहा है। जिस दल की सरकार उस दल के जिला पंचायत अध्यक्ष।
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मायावती व अखिलेश यादव। - फोटो : amar ujala
मौजूदा परिस्थितियों पर नजर डालें तो सपा और बसपा के पक्ष में आए नतीजों तथा निर्दलीयों को बड़े पैमाने पर मिली जीत ने पूरा राजनीतिक परिदृश्य बदल दिया है। जिस तरह के समीकरण बनते दिख रहे हैं, उसके चलते कोई बड़ा चमत्कार न हुआ तो पुरानी कहानी दोहराना मुश्किल दिखाई पड़ रहा है। हालांकि सपा के लिए भी राह बहुत आसान नहीं है। जिला पंचायतों पर काबिज होने के लिए उसे निर्दलीयों की दरकार तो होगी ही, अपने सदस्यों को सहेजे रखना भी बड़ी चुनौती रहेगी।
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सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव - फोटो : अमर उजाला
दरअसल, इन नतीजों ने हालात से समझौता करके बैठी सपा की उम्मीदें बढ़ा दी हैं। ये उम्मीदें इसलिए और बढ़ गई हैं, क्योंकि सपा के पक्ष में जो नतीजे आए हैं, उनमें सपा नेतृत्व की बहुत मेहनत नहीं है। सिवाय इसके कि इटावा, मैनपुरी, एटा जैसे इलाके में सपा और प्रसपा के उम्मीदवार मुलायम, अखिलेश तथा शिवपाल के नाम व झंडे को एक साथ लेकर चुनाव लड़े।

इनको बड़े पैमाने पर मिली जीत और अन्य स्थानों से आए नतीजों ने यह संदेश दिया है कि जनता उन्हें विकल्प मानती है। अखिलेश-शिवपाल मिलकर लड़ें तो अब भी उनकी संभावनाएं बरकरार हैं। यह संदेश नए राजनीतिक समीकरणों को जन्म दे सकता है।

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- फोटो : social media
भाजपा को इसका नुकसान यह हो सकता है कि बहुत से निर्दलीय आगामी विधानसभा चुनाव के बाद के नफा-नुकसान का आकलन करते हुए अपनी भूमिका तय कर सकते हैं। चूंकि जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में दलबदल जैसा कोई कानून नहीं है, इसलिए दलीय आधार पर जीते लोग भी पाला बदल सकते हैं।
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- फोटो : amar ujala
जोड़-तोड़ आसान नहीं
आज के सियासी हालातों और कुछ जिलों में जिस तरह सपा के उम्मीदवार बड़ी संख्या में जीते हैं, उसे देखते हुए भाजपा के लिए जिलों में तोड़-फोड़ करके सदस्यों को अपने पाले में लाना बहुत आसान नहीं दिख रहा है। सपा के अलावा बसपा और अन्य दलों के प्रत्याशियों व निर्दलीयों को पता है कि आठ-नौ महीने बाद ही विधानसभा चुनाव होने हैं। अभी कोरोना का साया है।

दिसंबर-जनवरी तक विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लग सकती है। निर्दलीयों की उम्मीदें भी अगली सरकार पर टिकेंगी। देखने वाली बात यह होगी कि जिला पंचायत अध्यक्ष की दावेदारी के लिए भाजपा व सपा निर्दलीयों के विश्वास हासिल करने में कैसे कामयाब हो पाते हैं क्योंकि सारा दारोमदार इन्हीं पर रहेगा।
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- फोटो : अमर उजाला
पंचायत चुनाव के नतीजों ने जिस तरह भाजपा के अजेय होने के दावे पर सवालिया निशान लगाया है, उसके चलते कोई भी नवनिर्वाचित जिला पंचायत सदस्य पाला बदलने से पहले भविष्य की राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में जरूर रखना चाहेगा। खासतौर से सपा के लोगों को तोड़ना तो बहुत ही मुश्किल होगा। निर्दलीय और दूसरे दल वाले भी कोई फैसला करने से पहले भविष्य की सुरक्षा को दिमाग में जरूर रखना चाहेंगे।
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