साहिल के सुकूं से किसे इनकार, लेकिन तूफान से लड़ने में मजा ही कुछ और है...
कुछ ऐसे ही इरादे हैं इनके। एक वादा खुद से है इनका कि वे देंगे भावी पीढ़ी को एक बेहतर कल। यह संकल्प भी है और जीने का मकसद भी। ये एक ऐसा युवा भारत तैयार कर रही हैं जो बनेगा बदलाव का सूत्रधार। ढर्रे पर चलना इन्हें पसंद नहीं। संघर्ष से सफलता की ओर बढ़ चुके इनके कदम तमाम मिथकों को तोड़ रहे हैं। संसाधनों की कमी को नजरअंदाज कर इन्होंने न केवल अवसर पैदा किए, बल्कि कई ऐसे परिवर्तन कर डाले, जो नजीर बन चुके हैं। इस कड़ी में आज बात ऐसी शिक्षाविदों के बारे में, जो बन चुकी हैं गेमचेंजर। रोली खन्ना की रिपोर्ट...
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सांख्यिकी की पहली महिला टीचर व विभाग प्रमुख
‘सशक्तीकरण बाहरी नहीं, बल्कि मानसिक मजबूती का नाम है। खुद को दुनिया की चुनौतियों का सामना करने के लायक बनाइए।’
लखनऊ विश्वविद्यालय के सांख्यिकी विभाग में पहली महिला फैकल्टी व हेड ऑफ डिपार्टमेंट बनीं। आमतौर पर साइंस पढ़ने का मतलब डॉक्टर या इंजीनियर बनना माना जाता है, लेकिन इन्होंने पूर्वाग्रह तोड़ दिए। गणित में अच्छी स्टूडेंट थीं। एक प्रोफेसर ने समझाया और उन्होंने सांख्यिकी चुन लिया। यहीं से तय हो गई जीवन की दिशा। डॉ. शीला मिश्रा ने लखनऊ विश्वविद्यालय से ही एमएससी किया और यहीं नियुक्ति हो गई।
महिला मुद्दों की पैरोकार
डॉ. शीला मिश्रा बताती हैं कि छात्र जीवन में बुनियादी जरूरतों के लिए हम लोगों ने विश्वविद्यालय में काफी संघर्ष किया। टॉयलेट तक नहीं थे। विभाग जॉइन करते ही सबसे पहले लेडीज टॉयलेट बनवाया। सांख्यिकी विभाग में पहली बार जेंडर सेंसटाइजेशन पर बात शुरू हुई। दो पेपर शुरू हुए जो महिला सशक्तीकरण की दिशा में मील का पत्थर हैं, पहला, जेंडर स्टेटिस्टिक्स और दूसरा, बायो स्टेटिस्टिक्स। उत्तर भारत में लखनऊ विश्वविद्यालय एकमात्र विवि था, जहां ये विषय पढ़ाए जाने लगे और इसमें एमफिल व पीएचडी की डिग्री दी जाने लगी। खास बात है कि ये इलेक्टिव कैटेगरी होने के कारण अन्य विभागों के स्टूडेंट्स भी इसमें एडमिशन ले सकते हैं। डॉ. शीला के मुताबिक, उनके स्टूडेंट्स ‘ब्रिंगिंग द चेंज’ के कॉन्सेप्ट पर काम कर रहे हैं, जिसमें वे पढ़ाई, शोध के साथ-साथ विभिन्न सामाजिक गतिविधियों में बराबर से हिस्सा लेते हैं।
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सफर संघर्ष से सफलता तक ‘नकारात्मकता को खुद को छूकर गुजरने तक मत दीजिए। हर किसी के प्रति अपना नजरिया सकारात्मक रखिए, फिर देखिए बदलाव कैसे होते हैं।’
मुजफ्फरनगर में पैदाइश हुई थी। चार भाई-बहनों में सबसे छोटी और सबसे लाडली। सबकुछ ठीक था, लेकिन अचानक से कुछ ऐसा हुआ जिसने इन्हें और मजबूत बना दिया। थक-हार कर निराश बैठने के बजाय इन्होंने तय कर लिया कि चलते जाना है। मंजिल की तलाश थी। इसी जद्दोजहद के बीच बड़े भाई के साथ मिलकर पिता द्वारा स्थापित पायनियर स्कूल संभाल लिया। आज लखनऊ और बाराबंकी में स्कूल की 19 शाखाएं संभाल रही हैं।
पिता के सपनों को दिए नए आयाम
पायनियर मॉन्टेसरी स्कूल की एल्डिको शाखा की प्रिंसिपल शर्मिला सिंह कहती हैं कि स्ट्रगल को जिस दिन हम एंजॉय करना सीख जाते हैं, चीजें खुद-ब-खुद आसान हो जाती हैं। लोग मनोरंजन के लिए घूमने या पिक्चर देखने चले जाते हैं, वहीं मुझे बच्चों के बीच रहना पसंद है। उनके चेहरे की खुशी देखकर सुकून मिलता है। जहां तक सवाल इतनी बड़ी स्कूल चेन को संभालने का है तो कहती हैं कि जब आप जिम्मेदारी से काम करना शुरू करते हैं तो मुश्किलें रास्ते से हट जाती हैं। मेरे साथ परिवार का भरपूर सहयोग रहा, इसलिए मेरे लिए चीजें उतनी कठिन नहीं रहीं।
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बेटी ने मुझे पढ़ाया
‘बेटियों की शिक्षा आज भी एक चुनौती है। उनके प्रति दुर्भावाना दुख देती है। सोच बदलनी जरूरी है।’
बुंदेलखंड की रहने वाली हूं। चार बेटियां और एक बेटे की मां हूं। जिन्दगी में कभी-कभी ऐसा कुछ होता है जो आपको न केवल झकझोर देता है, बल्कि आपको बदल भी देता है। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। मेरी एक बेटी महज 16 साल की उम्र में अनायास ही चल बसी। यह वही बेटी थी जिसने मुझे पढ़ने के लिए प्रेरित किया था। उसने ही मेरा ग्रेजुएशन का फॉर्म भरवाया। उसके रहते ही मैंने डिग्री ले ली थी। फिर उसका निधन हो गया। उसके बाद मैंने पीजी किया। फिर पति का ट्रांसफर लखनऊ हुआ और हम यहां चले आए।
मैंने बेटियों को पढ़ाने का संकल्प लिया
लखनऊ आने के बाद मुझे अपनी तीनों बेटियों के एडमिशन के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। काफी मुश्किलों से उनका एडमिशन करा सकी। एक तो बेटी की मौत से अंदर तक टूट चुकी थी, दूसरे बेटियों की पढ़ाई के लिए लंबा संघर्ष। संकल्प लिया कि बेटियों के लिए ऐसा स्कूल खोलना है, जहां उनको बेहतर शिक्षा मिल सके। इसी के बाद 1987 में सेंट जोसेफ स्कूल, राजाजीपुरम की नींव पड़ी। आज हमारी पांच शाखाएं हैं। काफी समय तक मैं स्कूल में एक्टिव रही, अब फाइनेंस डिपार्टमेंट देखती हूं। बाकी जिम्मेदारी बच्चों ने संभाल ली है।
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एक सोच ने बदल दी स्कूलों की तस्वीर रश्मि मिश्रा, अनिशा सिंह, सुरभि शर्मा, कल्पना लाल, प्रिया अरोड़ा, पारुल पाठक, नीलम मिश्रा, गीत त्रिवेदी, गीता वर्मा, प्रगति गुप्ता
बेसिक शिक्षा का स्तर काफी गिरा हुआ है। स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती। यहां पढ़ने और पढ़ाने वालों का कोई भविष्य ही नहीं होता....। और भी न जाने कितनी ऐसी बातें सुनते-सुनते थक चुकी थी। एक दिन तय किया कि इस सोच को बदलना है। सरोजनीनगर ब्लॉक की एक टीचर रश्मि मिश्रा ने कोशिश शुरू की। पास के ही एक दूसरे स्कूल की टीचर अनिशा सिंह ने साथ दिया और मिलकर गांधी जयंती पर प्रतियोगिता का आयोजन किया। बच्चों व अभिभावकों दोनों को पसंद आया और इसी कोशिश का नतीजा है कि 800 स्कूल जुड़ चुके हैं।
...ताकि प्रतियोगिता के लिए तैयार हो सकें बच्चे
रश्मि व अनिशा बताती हैं कि कुछ स्कूल और जुड़े तो हमने अपने खर्च पर प्रतियोगिता का आयोजन शुरू किया। गांव वालों का बहुत सहयोग मिला, वे तख्त लगाकर मंच बना देते, घरों से चादर ले आते। धीरे-धीरे यह सिलसिला चल निकला। इस बीच हमने 350 प्रश्नों का एक बैंक तैयार किया। अब सरकारी आदेश के तहत प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता का आयोजन हर साल किया जाता है। रश्मि के मुताबिक, बच्चों को प्रतियोगिताओं के लिए तैयार करने की जरूरत है। हम उन्हें वैसे ही तैयार कर रहे हैं।
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पढ़ने से रोका गया तो खोल दिया स्कूल
‘शिक्षा सिर्फ सर्टिफिकेट हासिल करने का नाम नहीं। यह एक बच्चे और युवा को अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्य पूरा करना भी सिखाती है।’
अभी 11वीं तक ही पढ़ सकी थीं कि शादी कर दी गई। आम लड़कियों की तरह इन्हें भी पारिवारिक जरूरतों को समझने और एक कुशल गृहिणी बनाने के उद्देश्य से होमसाइंस पढ़ाई गई। ससुराल आईं तो यहां भी बाहर जाकर पढ़ने देने के लिए कोई सहमत नहीं हुआ। पढ़ाई तो करनी थी, इसलिए प्राइवेट ही बीए कर लिया। फिर पीजी करने की बारी आई। घरवाले नाखुश थे, लेकिन फिर मान गए। इस बीच पढ़ी-लिखी चचेरी बहन को ससुराल में जला दिया गया। इस घटना ने झकझोर दिया। पहले पढ़ाई के लिए रोक, फिर बहन का अपने लिए न लड़ पाने की सच्चाई ने अंदर तक हिला दिया और बेटियों को शिक्षित करने का मन ही मन बीड़ा उठाया और स्टडी हॉल की नींव पड़ी।
अभावों को मात देकर आगे बढ़ना सिखा रहीं
स्टडी हॉल की संस्थापक शिक्षाविद उर्वशी साहनी बताती हैं कि वह शिक्षा ही क्या जो आपको खुद के लिए लड़ना न सिखा सके। मुझे जब पढ़ने से रोका गया था, तभी तय कर लिया था कि बच्चियों के लिए स्कूल खोलना है। शिक्षा के जरिए उनकी हिचक तोड़नी है। स्टडी हाॅल को हमने दो भागों में बांटा। एक हिस्सा उन बच्चियों के लिए जो अभावों में जी रही हैं, वहीं दूसरा हिस्सा आम बच्चों के लिए। अभावों में जी रहीं 30 बच्चियों से ये स्कूल शुरू हुआ था। उर्वशी के मुताबिक, हम गरीब तबके के बच्चों को सिखाते हैं कि क्या हुआ यदि साधन नहीं तो अपने रास्ते खुद बनाओ। अमीर बच्चों को कहते हैं कि अपने संसाधनों का इस्तेमाल कर अभाव से घिरे बच्चों की मदद कीजिए। खास बात है कि यहां पढ़ने वाली अभावग्रस्त बच्चियां देश-विदेश में अपनी प्रतिभा साबित कर रही हैं। स्टडी हाॅल के साथ ही मलिहाबाद में विद्यास्थली, पिपरसंड में कॉलेज व कई ट्यूटरिंग सेंटर चलते हैं।
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सोशल मीडिया को बनाया बदलाव का जरिया
‘क्लास का सबसे कमजोर बच्चा जब आपकी बात समझने लगे, तब जानिए कि आपकी कोशिशें सफल हो गईं।’
आज जब लोग सोशल मीडिया से दूर रहने की सलाह बच्चों, खासकर स्टूडेंट्स को देते हैं, डॉ. उपमा चतुर्वेदी ने अपने कॉलेज में ही सोशल मीडिया सेल बनाया। फेसबुक, ट्विटर से कॉलेज को जोड़ा। विरोध बहुत हुआ, क्योंकि इस तरह कॉलेज की एक्टिविटी को सार्वजनिक करना कुछ को पसंद नहीं आया, पर बदलाव तो हो चुका था। अब विरोध करने वाले इस बात से नाराज होते हैं कि उनके बारे में सोशल मीडिया पर क्यों नहीं कुछ डाला जाता है। बहरहाल अवध गर्ल्स पीजी कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ. उपमा बेटियों की खातिर एक बेहतरीन, प्रगतिशील समाज बनाने की दिशा में सक्रिय हैं।
टीचर-प्रिंसिपल से लेकर मेंटर तक
उपमा कहती हैं कि हमारी कोशिश है कि बेटियां जब कॉलेज से जाएं तो एक सशक्त नागरिक के रूप में अपनी पहचान बनाएं। वीमेन सेफ्टी, मीडिया-पुलिस से संपर्क, कॉन्फिडेंस बिल्डिंग वर्कशॉप हमारे यहां की जरूरी एक्टिविटीज में शामिल हैं। 12वीं तक की पढ़ाई बलरामपुर में, फिर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवेश, 1988 में मास्टर्स पूरा किया और यूनिवर्सिटी में टॉप किया। 1989 में भूगोल पढ़ाने के लिए अवध गर्ल्स पीजी कॉलेज में नियुक्ति हुई और 2014 में प्रिंसिपल बनीं। नजराना-ए-अवध जैसे सफल आयोजन के जरिए स्टूडेंट्स के हुनर को मंच देने की कोशिश का सिलसिला अनवरत जारी है। खुद को टीचर से ज्यादा वह अपने स्टूडेंट्स की मेंटर मानती हैं। यही इनके व्यक्तित्व की खासियत है।
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गांव के बच्चों तक पहुंचाई डिजिटल क्रांति
‘संसाधनों की कमी नहीं, उन्हें इस्तेमाल करने का स्मार्ट तरीका अपनाना होगा। काम जो भी कीजिए, अलग और नए अंदाज में।’
गांव के बच्चे भी स्मार्ट फोन पर पढ़ाई करते हैं। यह सुन कर किसी को भी आश्चर्य हो सकता है, पर अब हकीकत है ये। पूर्व माध्यमिक विद्यालय लवल, मोहनलालगंज के बच्चे दीक्षा एप के जरिए स्मार्ट फोन पर पढ़ाई करते हैं। यहां पढ़ने वाले हर बच्चे के माता-पिता के मोबाइल फोन पर एप डाउनलोड है। यह संभव हो सका है शिक्षिका श्वेता शुक्ला की बदौलत। इनफॉरमेशन कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी को लागू कर मोहनलालगंज के इस गांव ने डिजिटल इंडिया की ओर कदम बढ़ा दिए हैं।
‘नवरंग’ मॉडल से बदली सोच
श्वेता कहती हैं कि पढ़ाई ही सबकुछ है, लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी है कि हम बच्चों को एक बेहतर माहौल दें। इसी को ध्यान में रख नवरंग मॉडल बनाया गया है। इसके तहत बच्चों में स्कूल आने की आदत डालने के लिए शाइनिंग स्टार अवाॅर्ड दिए जाते हैं। नए प्रवेश लेने वाले बच्चों को जहां वेलकम, स्वच्छता किट दी जाती है, वहीं कॉन्वेंट स्कूलों की तरह होमवर्क डायरी, आईडी कार्ड भी दिए जाते हैं। इसके अलावा मैथ्स कॉर्नर, स्पेशल डे जैसे प्रयोग भी नवरंग के तहत किए गए।
एक जुनून ने बना दिया शिक्षिका ‘स्टूडेंट्स के लिए टीचर रोल मॉडल होते हैं। दोनों के बीच हिचक नहीं संवाद जरूरी है। स्वाभाविक मुद्दों को टालने से कुछ नहीं होगा।’
खुद को किसी इलाके या शहर का निवासी कहने के बजाय भारतीय कहने में यकीन रखती हैं। 2004 में पीएचडी पूरी होते ही सीडीआरआई में साइंटिस्ट की जॉब मिल गई, पर इन्हें तो टीचर ही बनना था। मौका मिला तो साइंटिस्ट की नौकरी छोड़ लखनऊ विश्वविद्यालय में बतौर फैकल्टी जॉइन कर लिया। जिस विषय पर दुनिया भर में लोग शोध करने से बचते हैं, इन्होंने वही विषय शोध के लिए चुना। लखनऊ विश्वविद्यालय में जूलॉजी विभाग में असोसिएट प्रोफेसर डॉ. गीतांजलि मिश्रा को एनिमल बिहेवियर को पढ़ने में महारत हासिल है। खासकर जानवरों, कीडे़-मकोड़ों में जनन प्रक्रिया के बारे में इनका शोध है।
लोग जिस विषय से कतराते हैं, इनका उसी पर जोर
गीतांजलि कहती हैं कि स्कूल में हमारे टीचर ह्यूमन रिप्रोडक्शन का पाठ छोड़ आगे बढ़ जाते थे। भूल से भी यदि किसी ने सवाल पूछ लिए तो उसे अवॉयड करते। मेरी आदत थी कि मुझे सवाल पूछना अच्छा लगता था। हालांकि उनके मना करने का परिणाम ये हुआ कि मैं उसके बारे में ज्यादा गहरे तक पढ़ गई। डॉ. गीतांजलि के मुताबिक, यूं तो मुझे एनिमल बिहेवियर पढ़ाना होता है, लेकिन छात्र कीड़े-मकोड़ों के बीच सेक्सुअल रिलेशन पर भी बात करने से कतराते हैं। ऐसे में इंसानी जनन प्रक्रिया के बारे में बात करना तो बहुत दूर की बात है, जबकि ये सब सामान्य सी चीजें हैं। जिसे हमने उलझा दिया है। मेरी कोशिश है कि स्टूडेंट्स संवाद करें, चीजों को समझें तब फैसला करें कि क्या सही है क्या गलत।