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लखनऊ के दो दोस्तों की कोशिशों से मिला बेसहारा बच्चों को ‘घर’, हर एक बच्चे को देते हैं 'स्पेशल केयर'

Thu, 26 Sep 2019 03:56 PM IST
Amulya Rastogi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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मलिन बस्ती के बच्चों के साथ आर्यन व शालू - फोटो : amar ujala
बचपन के दोस्त अर्थव बहादुर और शालू सिंह इन दिनों अनूठे मिशन में जुटे हैं। वे मानसिक मंदित, दृष्टिहीन और सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित बच्चों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में जुटे हैं। हालांकि यह सिर्फ उनकी कोशिशों का एक हिस्सा है। दरअसल, चाइल्ड लाइन, बाल कल्याण समिति के पास आने वाले अनाथ व बेसहारा बच्चों में से विशेष बच्चों को दृष्टि सामाजिक संस्थान भेजा जाता है, जहां शालू व अर्थव न केवल उन्हें घर जैसा माहौल देते हैं, बल्कि उनकी सामाजिक, सांस्कृतिक व आर्थिक मजबूती के लिए भी काम करते हैं।
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बच्चों के साथ मस्ती करते हुए - फोटो : amar ujala
यहां उन्हें प्यार-दुलार मिलता है और साथ ही बनाया जा रहा है मजबूत। खास बात है कि जब युवाओं का शगल घूमना-फिरना, मौज-मस्ती होता है, इन दोनों ने खुद को एक ऐसी जिम्मेदारी से बांध लिया है, जिसे ताउम्र निभाना पडे़गा।
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लखनवी कमाल - फोटो : amar ujala
कोई ज्वेलरी बना रहा, कोई हस्तशिल्प सीख रहा
अर्थव बताते हैं कि हर बच्चे की जरूरत अलग-अलग है। हमारे यहां एक साल से लेकर 15 साल तक के बच्चे हैं। इनमें से हमने अलग-अलग ग्रुप बना रखे हैं। किसी को हस्तशिल्प का काम सिखाया जा रहा तो किसी को ज्वेलरी मेकिंग। एक कंपनी के साथ मिलकर हमें कैफे आउटलेट शुरू किया है, जिसे ये मानसिक मंदित बच्चे ही संभाल रहे हैं। हमारी कोशिश है कि नियति के मारे इन बच्चों को किसी पर निर्भर न होना पड़े।


 

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बच्चों के साथ मस्ती करते हुए - फोटो : amar ujala
हर एक बच्चे को देते हैं ‘स्पेशल केयर’
इस वक्त यहां पर 250 बच्चे हैं और खास बात है कि हर एक बच्चे की समस्या, उनकी जरूरत, उनकी हंसी-खुशी का खयाल ये दोनों खुद रखते हैं। खास बात है कि सिर्फ आसरा ही नहीं दिया, बल्कि बेसहारा बच्चों को ‘क्वालिटी लाइफ’ मिले इसके लिए ये हफ्ते में सात दिन, 24 घंटे के फार्मूले पर काम करते हैं। समय-समय पर इन्हें आउटिंग के लिए भी लेकर जाते हैं। बीते दिनों कुछ बच्चों को लेकर एक ट्रिप नैनीताल का लगाया था।

 
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बच्चों के साथ मस्ती करते हुए - फोटो : amar ujala
मां विरासत  संरक्षक
शालू बताती हैं कि इस संस्थान की देखभाल अर्थव की मां नीता बहादुर करती थीं। कैंसर के कारण उनकी मौत हो गई। उस वक्त मैं बीटेक कर रही थी और अर्थव ने बीबीए पूरा किया था, हमें इसी में अपना कॅरिअर बनाना था। मां के निधन के बाद सारे बच्चे बिखर से गए। उनकी देखभाल प्रभावित होने लगी। मैंने बीटेक छोड़ दिया और हम दोनों ने इन बच्चों को जॉइन किया।
 
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