मेजर रीतेश शर्मा
- फोटो : amar ujala
जीत के बाद सुनाई कारगिल सूरमाओं की शौर्य गाथा
- मेजर रीतेश शर्मा
रेजीमेंट : 17 जाट रेजीमेंट
कारगिल युद्ध में शामिल होने वाले मेजर रीतेश शर्मा का नाम उन जांबाजों में शामिल है, जिन्होंने कारगिल की जीत देखी। फतह के बाद वापस लौटकर उन्होंने वीर सूरमाओं के शौर्य की कहानियां सुनाईं। उन्होंने खुद भी अदम्य साहस का परिचय देते हुए कारगिल में दुश्मनों को खदेड़ा। इंदिरानगर में रहने वाले उनके पिता सत्यप्रकाश शर्मा बताते हैं कि मेजर रीतेश शर्मा लामार्टीनियर कॉलेज के छात्र रहे और 9 दिसम्बर, 1995 को सेना में भर्ती हुए। मई, 1999 में 15 दिनों की छुट्टी लेकर लखनऊ घर आए थे। इसी दौरान कारगिल युद्ध की सूचना मिली। इससे पहले कि रेजीमेंट उन्हें बुलाती, वह बगैर बुलाए ही ड्यूटी पर पहुंच गए। चूंकि, जाट रेजीमेंट पहले ही कारगिल की ओर कूच कर चुकी थी, इसलिए मेजर रीतेश ने यूनिट के साथ दुश्मनों से मोर्चा लेते हुए चोटी पर तिरंगा फहरा दिया था। इसी क्रम में दो और चोटियों पर भी फतह हासिल की। पर, मश्कोह घाटी जीतते हुए वह घायल हो गए। उन्हें बेस कैंप लाया गया और कमान कैप्टन अनुज नैयर को सौंप दी गई, जो कारगिल में शहीद हो गए। मश्कोह घाटी में तिरंगा फहराने के कारण ही 17 जाट रेजीमेंट को मश्कोह सेवियर का खिताब भी दिया गया। कारगिल के बाद 25 सितम्बर, 1999 को कुपवाड़ा में आतंकी ऑपरेशन के दौरान मेजर शर्मा खाई में गिर गए थे, जिसके बाद अस्पताल में इलाज के दौरान उनका निधन हो गया था। पिता ने बताया कि शहीद की याद में इंदिरानगर स्थित जनकल्याण आंख अस्पताल में टॉपर्स को गोल्ड मेडल दिया जाता है, जबकि रानी लक्ष्मीबाई स्कूल में एक हजार रुपये की छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है।