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विजय दिवस 2021: खून से लथपथ होने पर भी सिग्नलिंग के तार बिछाते रहे कैप्टन आदित्य, फिर वीरगति को प्राप्त हुए

Mon, 26 Jul 2021 04:29 PM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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कारगिल शहीद स्मृति वाटिका। - फोटो : amar ujala
कारगिल में सेना के जांबाजों ने जिस अदम्य शौर्य व साहस का परिचय दिया था। इसका दुनिया आज भी लोहा मानती है। पाकिस्तानियों को हिंदुस्तान की सरजमीं से खदेड़कर मातृभूमि की रक्षा करने वाले इन जांबाजों में राजधानी के वीर भी शामिल हैं। परमवीर चक्र विजेता कैप्टन मनोज पांडेय, कैप्टन आदित्य मिश्र, मेजर रीतेश शर्मा, लांसनायक केवलानंद द्विवेदी, राइफलमैन सुनील जंग ऐसे ही जांबाज थे, जिनकी वीरता देशप्रेम की इबारत लिखती है। दरअसल, सियाचिन से जब गोरखा राइफल्स की टुकड़ी वापस लौट रही थी तो पाकिस्तानी घुसपैठियों ने खाली पड़ी भारतीय पोस्टों पर कब्जा कर लिया था। सीमित संसाधनों में जवानों ने अदम्य शौर्य व साहस का परिचय देकर जीत हासिल की और 26 जुलाई, 1999 को कारगिल को पूरी तरह मुक्त करा लिया था। इसे विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। ‘ऑपरेशन विजय’ को सफल बनाने में कई मांओं की गोदें सूनी हुईं तो कईयों की मांग का सिंदूर मिट गया। आज (26 जुलाई) को 22वां कारगिल विजय दिवस है। ऐसे में राजधानी के जांबाजों पर केंद्रित रिपोर्ट...।
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कैप्टन आदित्य मिश्र - फोटो : amar ujala
कैप्टन आदित्य मिश्र
रेजीमेंट : सिग्नल कोर
कैप्टन आदित्य मिश्र 8 जून, 1996 को सेना के सिग्नल कोर में सेकेंड लेफ्टिनेंट के रूप में भर्ती हुए। सितम्बर, 1999 में उन्हें लद्दाख स्काउट में तैनाती मिली। इसके बाद कारगिल युद्ध छिड़ने के बाद वह बटालिक पहुंचे, जहां 17 हजार फुट ऊंची चोटी पर भारतीय पोस्ट को छुड़ाने के लिए उन्होंने दुश्मनों पर हमला कर दिया। पोस्ट पर कम्युनिकेशन के लिए तार बिछाने बेहद जरूरी थे, इसलिए वह पोस्ट से नीचे उतर आए। पर, जब वह दोबारा पोस्ट पर गए तो वहां दुश्मन काबिज हो चुके थे। दुश्मनों की गोलीबारी में वह घायल हो गए। वह खून से लथपथ थे, इसके बावजूद सिग्नलिंग के तार बिछाते रहे, ताकि दुश्मनों को खदेड़ने में सेना को मदद मिलती रहे। हिम्मत दिखाते हुए पोस्ट को दुश्मनों से खाली करवाया और वीरगति को प्राप्त हुए। पिता जीएस मिश्र सीनियर आर्मी ऑफिसर रहे हैं। उन्होंने बताया कि कैथेड्रल व चिल्ड्रेन अकादमी में पढ़ाई के दौरान से ही उसमें सेना में भर्ती होने का जज्बा पैदा हो गया था।
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कैप्टन मनोज की तस्वीर दिखाते माता-पिता। - फोटो : amar ujala
कारगिल विजय के नायक
परमवीर चक्र विजेता कैप्टन मनोज पांडेय
रेजीमेंट : 11 गोरखा राइफल्स
कैप्टन मनोज पांडेय कारगिल युद्ध के मुख्य नायक थे। उनकी वीरता ने दुश्मनों के रोंगटे खड़े कर दिए थे। गोमतीनगर में रहने वाले उनके पिता गोपीचंद पांडेय ने बताया कि 4 मई, 1999 को उन्हें कारगिल में भारतीय चौकियों को खाली करवाने की जिम्मेदारी सौंपी गई। वे पांच नम्बर प्लाटून का नेतृत्व कर रहे थे। बटालिक सेक्टर में दुश्मनों को परास्त कर आगे बढ़ रहे थे और खालूबार तक हर पोस्ट से दुश्मनों को खदेड़ने के उन्हें निर्देश मिले थे। आदेश का पालन करते हुए वह आगे बढ़ रहे थे कि उन्हें भयंकर गोलीबारी का सामना करना पड़ा, पर वह आगे बढ़ते गए। उन्होंने दुश्मनों के चार बंकरों को नेस्तनाबूद कर दिया। इसी बीच खुद दुश्मन की गोली का शिकार हो गए। पिता आगे बताते हैं कि वह राजधानी के पहले सैन्य अधिकारी रहे, जिन्हें परमवीर चक्र से अलंकृत किया गया। सेना में भर्ती होने के महज दो साल बाद ही उन्हें अपने शौर्य व पराक्रम का परिचय देने का मौका मिल गया। 3 जुलाई, 1999 को वह शहीद हो गए।

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लांसनायक केवलानंद द्विवेदी - फोटो : amar ujala
बीमार पत्नी को छोड़ दुश्मनों को सबक सिखाने पहुंचे कारगिल
लांसनायक केवलानंद द्विवेदी
रेजीमेंट : कुमाऊं
लांसनायक केवलानंद द्विवेदी पत्नी की बीमारी पर दो साल बाद घर लौट थे। उनकी देखभाल में लगे ही थे कि इसी दौरान कारगिल युद्ध के लिए बुलावा आ गया। उन्होंने पत्नी को बताया तो पत्नी ने उन्हें तुरंत ड्यूटी पर लौटने को कहा। वह जल्द ही विजय हासिल कर लौटने की बात कह रवाना हो गए। कारगिल सेक्टर में वह दुश्मनों को धूल चटाते हुए आगे बढ़ रहे थे कि ऊंचाई पर बैठे दुश्मनों की एक गोली उनके सीने में धंस गई। अंतिम सांस तक दुश्मनों का सामना करते हुए 6 जून, 1999 को कारगिल सेक्टर में शहीद हो गए।
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राइफल मैन सुनील जंग अपने परिवार के साथ। - फोटो : amar ujala
विरासत में मिली थी देशभक्ति
राइफलमैन सुनील जंग
रेजीमेंट : 11 गोरखा राइफल्स
राइफलमैन सुनील जंग लखनऊ के पहले शहीद थे। उन्होंने कारगिल में दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए। जब युद्ध शुरू हुआ तो 10 मई, 1999 को उन्हें कारगिल सेक्टर पहुंचने के आदेश मिले। वह एक टुकड़ी के साथ आगे बढ़ रहे थे। उन्हें जानकारी थी कि पांच सौ घुसपैठिए हिंदुस्तान की सीमा में घुस आए हैं। तीन दिनों तक भीषण गोलाबारी का वह सामना करते रहे। दुश्मनों को खेत करते रहे, लेकिन इसी बीच दुश्मन की एक गोली उनके सिर को चीरती हुई निकल गई। छावनी के तोपखाना में रहने वाली उनकी मां बीना महत बताती हैं कि सुनील को देशभक्ति विरासत में मिली थी। उनके दादा मेजर नकुल जंग व पिता नर नारायण जंग महत भी सेना में थे। सुनील जब आठ साल के थे और स्कूल के एक फैंसी ड्रेस प्रोग्राम में हिस्सा ले रहे थे तो उन्हें वर्दी का इतना शौक था कि जिद करने पर मैंने उनके पिता की पुरानी वर्दी काटकर उनके लिए ड्रेस तैयार की थी। उन्होंने मंच से यह घोषणा की थी कि देश की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने से पीछे नहीं हटेंगे और जब मौका पड़ा तो उन्होंने ऐसा करके भी दिखाया। 15 मई, 1999 को वह शहीद हो गए।
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मेजर रीतेश शर्मा - फोटो : amar ujala
जीत के बाद सुनाई कारगिल सूरमाओं की शौर्य गाथा
- मेजर रीतेश शर्मा
रेजीमेंट : 17 जाट रेजीमेंट
कारगिल युद्ध में शामिल होने वाले मेजर रीतेश शर्मा का नाम उन जांबाजों में शामिल है, जिन्होंने कारगिल की जीत देखी। फतह के बाद वापस लौटकर उन्होंने वीर सूरमाओं के शौर्य की कहानियां सुनाईं। उन्होंने खुद भी अदम्य साहस का परिचय देते हुए कारगिल में दुश्मनों को खदेड़ा। इंदिरानगर में रहने वाले उनके पिता सत्यप्रकाश शर्मा बताते हैं कि मेजर रीतेश शर्मा लामार्टीनियर कॉलेज के छात्र रहे और 9 दिसम्बर, 1995 को सेना में भर्ती हुए। मई, 1999 में 15 दिनों की छुट्टी लेकर लखनऊ घर आए थे। इसी दौरान कारगिल युद्ध की सूचना मिली। इससे पहले कि रेजीमेंट उन्हें बुलाती, वह बगैर बुलाए ही ड्यूटी पर पहुंच गए। चूंकि, जाट रेजीमेंट पहले ही कारगिल की ओर कूच कर चुकी थी, इसलिए मेजर रीतेश ने यूनिट के साथ दुश्मनों से मोर्चा लेते हुए चोटी पर तिरंगा फहरा दिया था। इसी क्रम में दो और चोटियों पर भी फतह हासिल की। पर, मश्कोह घाटी जीतते हुए वह घायल हो गए। उन्हें बेस कैंप लाया गया और कमान कैप्टन अनुज नैयर को सौंप दी गई, जो कारगिल में शहीद हो गए। मश्कोह घाटी में तिरंगा फहराने के कारण ही 17 जाट रेजीमेंट को मश्कोह सेवियर का खिताब भी दिया गया। कारगिल के बाद 25 सितम्बर, 1999 को कुपवाड़ा में आतंकी ऑपरेशन के दौरान मेजर शर्मा खाई में गिर गए थे, जिसके बाद अस्पताल में इलाज के दौरान उनका निधन हो गया था। पिता ने बताया कि शहीद की याद में इंदिरानगर स्थित जनकल्याण आंख अस्पताल में टॉपर्स को गोल्ड मेडल दिया जाता है, जबकि रानी लक्ष्मीबाई स्कूल में एक हजार रुपये की छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है।
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मेजर विवेक गुप्ता - फोटो : amar ujala
इन्होंने भी दिखाई कारगिल में वीरता
राष्ट्रीय राइफल रेजीमेंट के मेजर विवेक गुप्ता ने भी कारगिल के युद्ध में अपनी वीरता का परिचय दिया था और रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए थे। उन्होंने 11 जून, 1999 को तोलोलिंग चोटी पर हमलों के दौरान दुश्मनों के कई ठिकानों पर कब्जा कर लिया था। उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से नवाजा गया था। ऐसे ही कारगिल युद्ध के नायक थे बिग्रेडियर देवेंद्र सिंह। उन्होंने कारगिल में सैन्य टुकड़ियों का नेतृत्व किया, पर रक्षा मंत्रालय ने उनकी उपलब्धियों को हाशिए पर ही रखा और इसी बीच वह रिटायर भी हो गए।
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