आपके घर में बुजुर्ग माता-पिता, दादी-दादा या नाना-नानी हैं....। अक्सर वो बीमार रहते हैं, स्वभाव से चिड़चिड़े होते जा रहे हैं, बात-बात में गुस्साना उनकी आदत सी बन गई है और यह बदलाव आपको भी उत्तेजित करने लगा है, तो जरा देर ठहरिए। खुद के दिमाग को शांत कीजिए और उनकी उम्र के तकाजे के बारे में सोचिए...। आपको जवाब खुद-ब-खुद मिल जाएगा।
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दरअसल हमारे बुजुर्ग कहीं न कहीं उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं। दरअसल उनकी उपेक्षा बढ़ती जा रही है और इसी का नतीजा है कि राजधानी में 40 फीसदी बुर्जुग मानसिक बीमारी की गिरफ्त में हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि अपने बुजुर्गों की उपेक्षा बंद कर दीजिए, उनसे बात कीजिए, वह सेहतमंद नजर आने लगेंगे। 15 जून को विश्व वृद्ध दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस मनाया जा रहा है। पेश है एक रिपोर्ट...।
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खुलकर बोल भी नहीं पाते, डरते हैं
केजीएमयू के वृद्ध मानसिक चिकित्सा विभाग के विशेषज्ञों का दावा है कि परिवार के साथ इलाज कराने आने वाले बुजुर्ग खुल कर नहीं बोलते हैं। उन्हें डर रहता है कि यहां कुछ बोले तो घर में उपेक्षा होगी। यदि उनकी काउंसलिंग की जाए तो पता चलता है कि 40 फीसदी से ज्यादा उपेक्षा की वजह से मानिसक बीमारी से ग्रसित हो जाते हैं।
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44 फीसदी लोगों ने तो बात करने से ही कर दिया इन्कार
केजीएमयू के वृद्ध मानसिक चिकित्सा विभाग के सेंटर फार एडवांस रिसर्च, ट्रेनिंग एंड सर्विस (कार्ट्स) और लखनऊ एल्डर्स स्टडी (लेस) की ओर से ग्रामीण इलाके के बुजुर्गो का विभिन्न स्तरों पर सर्वे किया गया। सर्वे में खुद की स्थिति के बारे में 66 फीसदी लोग ही बात करने के लिए तैयार हुए।
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इसमें यह बात सामने आई कि करीब 8.3 फीसदी बुजुर्ग को पोषक भोजन नहीं मिल पाता है। इसमें महिलाओं की संख्या करीब नौ फीसदी है, जबकि पुरुषों की 7.5 फीसदी। इसमें 80 साल से अधिक उम्र वाले बुजुर्गों के कुपोषित होने का आंकड़ा 39.2 फीसदी है।
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डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट
विश्व स्वस्थ्य संगठन के मुताबिक बुजुर्ग दुर्व्यवहार में शारीरिक, यौन, मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक दुर्व्यवहार, वित्तीय दुर्व्यवहार, उपेक्षा, अस्मिता और सम्मान को क्षति पहुंचाना, मानव अधिकारों का हनन शामिल है।
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जिन के पास प्रॉपर्टी या पैसा नहीं, वे ज्यादा उपेक्षित
स्वयंसेवी संस्था सोशल कलेक्टिव एक्शन फार रिसर्च एंड डेवलपमेंट (स्कार्ड) और ईशान सनसाइन ने भी बुजुर्गो पर सर्वे किया है। गोमती नगर, आलमबाग और चौक इलाके में करीब एक हजार बुजुर्र्गों पर सर्वे किया गया। इसमें पाया गया कि संपति नहीं होने की वजह से 59 प्रतिशत उत्पीड़न के शिकार होते हैं। सर्वेक्षण में 13 प्रतिशत ने शारीरिक उत्पीड़न, 21 प्रतिशत ने बुनियादी जरूरतों से वंचित करने और 11 प्रतिशत ने मानसिक उत्पीड़न और 18 प्रतिशत ने सामाजिक गतिविधयों पर अंकुश लगाने की बात कही। जबकि 7 प्रतिशत ने अन्य तरह के उत्पीड़न होने की बात कही। सर्वे में तमाम बुजुर्र्गों ने परिवारीजनों द्वारा भोजन और दवा न देने, ब्लैकमेलिंग, धमकी, पीटने की बात कही। लेकिन इन बुजुर्गो ने परिवार के सामने कुछ भी कहने से मना कर दिया।
उत्पीड़न तोड़ देता है उन्हें
बुजुर्ग बीमारी से ज्यादा उत्पीड़न से पीड़ित होते हैं। शारीरिक, आर्थिक और सामाजिक उत्पीड़न से बुजुर्ग की खुशहाली खत्म हो जाती है। इसमें आर्थिक उत्पीड़न सबसे खतरनाक है। पैसा है तो परिवारीजन उन्हें लूटने की कोशिश करते हैं। नहीं है तो उपेक्षा करते हैं। यह बुजुर्र्गों को ज्यादा कष्ट देता है और वे धीरे-धीरे मानसिक बीमारी की ओर बढ़ने लगते हैं। बात करने, आदर देने, फैसले में शामिल करने से उनकी बीमारी अपने आप कम हो जाती है। - प्रोफेसर एससी तिवारी, विभागाध्यक्ष वृद्ध मानसिक चिकित्सा विभाग