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महिला दिवस पर स्पेशल स्टोरी: आगे बढ़ना चाहती थी... पर पीटी जाती रही... अब करनी है कानून की पढ़ाई

Sun, 07 Mar 2021 04:34 PM IST
ishwar ashish रोली खन्ना, अमर उजाला, लखनऊ
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महिला दिवस - फोटो : amar ujala
रोज-रोज गिरकर भी मुकम्मल खड़ी हूं, ऐ मुश्किलों, देखो तुमसे कितनी बड़ी हूं मैं...। हर शब्द उनके साहस की कहानी कहता है। दर्द देकर उन्हें हराने की कोशिशें उन्होंने अपने धैर्य से नाकाम कर दी। अपने आंसुओं को अपनी ताकत बनाया। हार न मानने का इरादा लेकर वे आगे बढ़ीं, नतीजा वे अपने बेहतर भविष्य को लेकर आगे बढ़ रही हैं। इतना ही नहीं इनमें से कुछ ने तो घरेलू हिंसा को खत्म करने की मुहिम छेड़ दी है। महिला दिवस पर बाधाओं को हराने वाली ऐसी अपराजिताओं को ‘अमर उजाला’ सलाम करता है। आज की इस कड़ी में हम बात करेंगे घरेलू हिंसा के खिलाफ खड़ी हुईं उन महिलाओं की जो अपने साथ दूसरों के लिए एक ताकत बनी हुई हैं। रोली खन्ना की रिपोर्ट...।
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ज्योति सिंह - फोटो : amar ujala
आगे बढ़ना चाहती थी... पर पीटी जाती रही... अब करनी है कानून की पढ़ाई
मेरा नाम ज्योति सिंह है। करीब आठ साल पहले मेरी शादी हुई थी, उस वक्त में 20 साल की थी। आम लड़की की तरह शादी को लेकर मेरे अपने सपने थे, सोच थी। ससुराल जाने के साथ ही लगा कि बुरा सपना देख रही जो सच हो गया। गाली-गलौज, मारपीट, तानों से मुझे तोड़ने की कोशिश की जाने लगी। मेरी गलती बस इतनी थी कि मैं चुप रहती थी और मुझे आगे बढ़ना था। देखते ही देखते मेरा घर से निकलना, मुझे मां के घर भेजना बंद कर दिया गया। भाई की शादी में मुझे जबरदस्ती लेकर गए मेरे भाई। आठ साल की शादी में बस डेढ़ महीने तक ससुराल में रही। हर बात में मुझे धमकी दी जाने लगी। एसिड अटैक तक की धमकी दे डाली, उन धमकियों से मैं इस कदर सहमी कि आज भी कोर्ट में उसकी शक्ल देखकर डर जाती हूं।

चार साल तक इंतजार किया... पर अब और नहीं
मायके चली तो आई, लेकिन माता-पिता ने कहा कि इंतजार करो। चार साल तक सब ठीक होने का इंतजार किया। इसके बाद धैर्य जवाब दे दिया। अपने केस के सिलसिले में आली संगठन के संपर्क में आई, तो हौसला मिला। मैं अपना केस लड़ रही हूं। एलएलबी करना चाहती हूं, खुद को आत्मनिर्भर बनाना चाहती हूं। कानून की पढ़ाई मेरा लक्ष्य है, थोड़ा पैसा जुटा लूं फिर आगे की पढ़ाई करूंगी।
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महिला दिवस - फोटो : amar ujala
हक की लड़ाई को धार दे रही नई टीम
एडवा, आली, 181 वन स्टाफ सेंटर जैसे मजबूत संगठन नई टीम के साथ और ज्यादा मजबूत हो रहे है। नई ऊर्जा, नए उत्साह के साथ महिला हिंसा के खिलाफ इनकी कोशिशें और तेज हो गई हैं। नई टीम की नई कोशिशों को शुभकामनाओं के साथ आइए जानते हैं उनके बारे में।

सोशल मीडिया से लेकर जमीनी लड़ाई के लिए तैयार
महिला अधिकारों की बुलंद आवाज अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति (एडवा) की युवा टीम भी पुरानी टीम के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने को तैयार हो गई है। इनमें दीप्ति मिश्रा जहां एडवा का सोशल मीडिया संभाल रही हैं, वहीं नंदिनी, सुशीला, मीरा व अन्य कामगार व घरेलू हिंसा पीड़ित महिलाओं की समस्याओं का समाधान तलाशने में जुटी हैं। दीप्ति कहती हैं कि हम चाहते हैं कि लोग इतने जागरूक हो जाएं कि वे खुद अपनी मुश्किलों का हल तलाश लें। नागरिक सुविधाओं का हक दिलाने का जिम्मा भी इन्होंने ले रखा है।

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एडवा की संयुक्त सचिव मधु गर्ग - फोटो : amar ujala
वक्त नए नेतृत्व का: एडवा की संयुक्त सचिव मधु गर्ग का कहना है कि मैं एडवा से 1984 से जुड़ी हूं। हम लोगों ने एक बड़ा रास्ता तय किया है। समस्याएं आज भी गंभीर बनी हुई हैं, ऐसे में आने वाले कल के लिए नया नेतृत्व तैयार करना जरूरी हो गया है। नए बच्चे कहीं ज्यादा संवेदनशीलता के साथ महिलाओं के हक में आगे कदम बढ़ा चुके हैं। एडवा की युवा टीम इसका एक उदाहरण है।
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- फोटो : amar ujala
बेहतर कल की खातिर नौकरी के घंटों में नहीं बांधा
सोनल श्रीवास्तव, गरिमा, नेहा और नीलम, वन स्टाप सेंटर/आशा ज्योति केन्द्र में बतौर काउंसलर व स्टाफ नर्स साल भर पहले जुड़ीं थीं। तब से आज तक 600 से अधिक मामलों में काउंसिलिंग कर चुकी हैं और चिकित्सकीय सुविधाएं प्रदान कर चुकी हैं। यूं तो इनकी नौकरी आठ घंटे की है, पर साल में शायद ही कोई समय ऐसा रहा होगा, जब इन्होंने इन बंधे-बंधाए घंटों से खुद को बांधा हो। रात-दिन में कभी फर्क नहीं किया। कभी-कभी तो ड्यूटी से घर पहुंचने के तुरंत बाद दोबारा मोबाइल पर आई एक कॉल के साथ रेस्क्यू ऑपरेशन के लिए निकल जाती हैं। सोनल कहती हैं कि एक महिला होने की पीड़ा को महसूस करना होगा, तभी हम एक  बेहतर समाज बना सकेंगे। इसके लिए हमें नौकरी को घंटों में बांधना नहीं होगा।
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अर्चना सिंह - फोटो : amar ujala
नौकरी नहीं जिम्मेदारी समझ कर काम
आशा ज्योति केंद्र प्रशासिका अर्चना सिंह केन्द्र से जुड़ने वाली नई टीम को लेकर कहती हैं कि कई बार हम युवाओं को मस्तमौला समझ कर लापरवाह मान लेते हैं। जिस तरह से नई लड़कियां काम कर रही हैं, वो महिला अपराध का ग्राफ नीचे गिराने में मददगार होगा।
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- फोटो : amar ujala
निशुल्क लड़ती हैं कानूनी लड़ाई
आली की युवा टीम की सदस्य अपूर्वा, श्वेता, शिवांगी, शुभि, नीतू, अभ्यालिका अक्सर कानून की मोटी-मोटी किताबों के बीच मिल जाएंगी। महिला हिंसा से संबंधित मामलों में हस्तक्षेप करना, एक रणनीति बनाकर उसे न्याय दिलाना इनका मिशन है। इसके अलावा ये जितनी भी एनफोर्समेंट एजेंसियां हैं, उनके प्रशिक्षण व नए कानूनों पर एडवोकेसी का काम भी करती हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हिंदी में अनुवाद करना, ताकि आम आदमी को समझ में आ सके जैसे काम भी इनकी जिम्मेदारी का हिस्सा है। अपूर्वा कहती हैं कि हम निशुल्क लड़ रहे हैं महिला अपराध के खिलाफ। 365 दिन काम करते हैं, क्योंकि हमें अच्छा लगता है।

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रेनू मिश्रा - फोटो : amar ujala
365 दिन काम करती है ये टीम, थकती नहीं, रुकती नहीं
रेनू मिश्रा, कार्यकारी निदेशक आली कहती हैं कि नई टीम को सिखाने की नहीं महज मार्गदर्शन की जरूरत है। इनमें कहीं ज्यादा हिम्मत, समझ और साहस है।
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पीयूष एंटोनी। - फोटो : amar ujala
शिक्षा व्यवस्था की विफलता घरेलू हिंसा का बड़ा कारण
यूनीसेफ की सोशल पॉलिसी स्पेशलिस्ट पीयूष एंटोनी का कहना है कि हम बच्चों को न तो प्रजातंत्र का सही मतलब बताते हैं न ही रिश्तों की अहमियत समझाते हैं। हमें सामाजिकरण का तरीका बदलना होगा, ताकि भेदभाव, गैर बराबरी बच्चों के मन से दूर कर सकें। साथ ही दूसरों को दबाने और अपना प्रभुत्व साबित करने के खिलाफ आवाज उठाना सिखाना होगा। प्रजातंत्र महज एक व्यवस्था नहीं बल्कि हमारे जीने का तरीका होना चाहिए, जहां सबको अपनी बात रखने का हक हो और यह बात स्कूली शिक्षा का हिस्सा होनी चाहिए।
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