फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बेटियों के लिए रखते हैं व्रत, ये हैं वो मां-बाप जिनके लिए उनकी बेटियां ही हैं सारा संसार, तस्वीरें

Sun, 22 Sep 2019 04:45 PM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
विज्ञापन
1 of 7
- फोटो : amar ujala
बेटों से ही परिवार या वंश चलता है..., अब यह सोच समय के साथ काफी हद तक बदल चुकी है। यहां मकसद बेटों के महत्व को किसी भी तरह से कमतर करना नहीं बल्कि उस सोच का समर्थन करना है जो बेटे और बेटी में भेदभाव के खिलाफ है। आज देशभर में राष्ट्रीय बेटी दिवस मनाया जाएगा।

इस मौके पर ‘अमर उजाला’ ने बात की कुछ ऐसे अभिभावकों से जिनके यहां बेटियों का ही जन्म हुआ और वे ये मानते ही नहीं बल्कि उनका विश्वास है कि परिवार और समाज बेटियों से चलता है। एक रिपोर्ट...।
विज्ञापन

2 of 7
- फोटो : amar ujala
हमने पर्ची डाली और तय किया कि बेटियों के बाद बस...
अवध कालिजिएट के संस्थापक प्रबंधक सरबजीत और डायरेक्टर प्रिंसिपल जसवंत वालिया अपनी दो बेटियों बह्मजोत और सिमरन को ही सबकुछ मानते हैं। दोनों की शादी हो चुकी है। एक ने सिंगापुर से उच्च शिक्षा ली है और पिता के काम को संभालने लगी हैं जबकि छोटी बेटी सिमरन ने लंदन से उच्च शिक्षा ली है। दोस्त, रिश्तेदार सभी का जबरदस्त दबाव था कि बेटा होना ही चाहिए।

हमने चारों तरफ से सुन-सुन कर सिक्का उछाला और गुरु साहिब के सामने पर्ची डाली और तय किया कि हमारी बेटियां ही हमारा परिवार होंगी और हमारा नाम आगे बढ़ाएगी। बेटा होता तो इनका हक इन्हें नहीं मिल पाता। हमने अपनी बेटियों को वो सब कुछ दिया जो उन्हें चाहिए था।

आज बड़ी जिस तरह से मेरे काम को संभाल रही है, लोग कहते हैं कि बेटा होता तो भी इतने अच्छे से नहीं संभालता। वैसे भी सिख धर्म में बेटे और बेटों में कोई फर्क नहीं करता। (सरबजीत व जसवंत वालिया के साथ बेटी बह्मजोत और सिमरन।)
विज्ञापन

3 of 7
- फोटो : amar ujala
बेटियों के लिए रखते हैं व्रत
बिजनेसमैन राजीव उपाध्याय और समाजसेवी सपना अपनी दोनों बेटियों को अपना जहां मानती हैं। बड़ी बेटी साक्षी इंजीनियर है तो छोटी बेटी स्वर्णिमा मास कॉम में मास्टर्स कर रही है।

सपना कहती हैं कि एक डॉक्टर परिवार से होने के कारण हमें पहले ही आभास हो गया था कि बेटियां ही आने वाली हैं। हमारे यहां उनके स्वागत के लिए दिवाली जैसी तैयारी थी। आस पड़ोस के लोग इस बात से अचंभित थे। राजीव कहते हैं कि संतान होने से मतलब है, बेटी हो या बेटा, क्या फर्क पड़ता है।

हर कोई बेटों के लिए व्रत रखता है, लेकिन हम अपनी बेटियों के लिए निर्जल व्रत रखते हैं। हमारा संसार हमारी बेटियों में समाया है। हमारा गर्व हैं। हम उनकी तुलना बेटों से करें ही क्यों। (राजीव उपाध्याय और समाजसेवी सपना अपनी बेटी साक्षी और स्वर्णिमा के साथ।)

4 of 7
- फोटो : amar ujala
एक बच्चा वो भी बेटी, हम किस्मत वाले
भारत की हेल्थ इंश्योरेंस सेक्टर की सबसे बड़ी सर्विसिंग कंपनी में ग्रुप प्रेसीडेंट शिखा सक्सेना और विकास मिश्रा बिजनेसमैन हैं। इनकी बेटी मोहिनी शिखा मिश्रा ला-मार्टीनियर में पढ़ती है। संयुक्त परिवार है। शिखा कहती हैं कि मैं एक कॉरपोरेट लेडी हूं। हमारा परिवार बहुत ही प्रगतिशील सोच रखता है।

हमने अपने वर्किंग कल्चर को ध्यान में रखते हुए तय किया था कि हम सिंगल चाइल्ड ही करेंगे। हम बेटी चाहते थे और अपने पिता का तय किया नाम मोहिनी रखेंगे। यदि बेटा हो गया तो मोहित कर देंगे, लेकिन हमारी एक ही इच्छा थी वो पूरी हो गई। मोहिनी पढ़ाई के साथ-साथ स्वीमिंग, योगा में अव्वल रहती है।

शिखा के मुताबिक मैं कई-कई दिन बाहर रहती हूं। जब लौटती हूं तो मेरी बेटी मुझे रात को लोरी सुनाती है। रही बात बेटे या बेटी को लेकर परिवार की सोच की तो हमारे यहां माना जाता है कि जो किस्मत वाले हैं, उन्हें ही बेटी मिलती है और हम किस्मत वाले हैं। (शिखा व विकास के साथ बेटी मोहिनी।)
विज्ञापन

5 of 7
- फोटो : amar ujala
बेटियों ने रोशन किया हमारा नाम
जब बेटियों ने जन्म लिया तो वे लम्हें कितने सुखद थे। छोटी-छोटी अंगुलियां, रुई सी त्वचा और हिरण सी आंखें। उनकी खिलखिलाहट और शैतानियां सारी थकान मिटा देती थी। आज भी जब बेटियां सामने होती हैं तो वही यादें ताजा जो जाती है। कभी महसूस ही नहीं हुआ कि मैं बेटों नहीं तीन बेटियों का पिता हूं। मेरी बेटियों ने वह कर दिखाया, जो बेटे भी नहीं कर सकते थे। दुनियाभर में मेरा नाम रोशन किया।

यह कहना है पूर्वोत्तर रेलवे के पूर्व मंडल परिचालन प्रबंधक एमपी सिंह का। उन्होंने बताया कि बेटियों को लेकर समाज की सोच जैसी भी हो, पर हमारे यहां जब बेटियों ने जन्म लिया तो मैंने उसी पल निर्णय कर लिया था कि बेटियों की पढ़ाई में कोई कमी नहीं छोडूंगा जबकि मां लगातार हमेशा बेटे के लिए प्रार्थना करती थी। इसी का नतीजा है कि एक बेटी डॉ. रश्मि सिंह गोरखपुर में चिकित्सक है। वहीं, दूसरी बेटी इंजीनियर नेहा सिंह पोलैंड में पोस्टेड है और तीसरी बेटी पूजा सिंह डॉक्टर है। (एमपी सिंह बेटी डॉ. रश्मि, नेहा व पूजा के साथ।)
विज्ञापन

6 of 7
- फोटो : amar ujala
बेटियों ने फख्र से चौड़ा कर दिया सीना
बलरामपुर अस्पताल में सीनियर सीटी स्कैन टेक्नीशियन वीके रॉय व पत्नी विमला रॉय को अपनी दोनों बेटियों पर फख्र है। कहते हैं मेरी बेटियों श्वेता रॉय व पूजा रॉय ने वह कर दिया, जो बेटे भी नहीं कर सकते थे। दोनों समाज के गरीब बच्चों के लिए काम कर रही हैं और मेरा नाम रोशन कर रही हैं।

रॉय बताते हैं कि बड़ी बेटी श्वेता ने आईटी से ग्रेजुएशन किया है। लविवि से एमबीए कर बैंक ऑफ बड़ौदा नई दिल्ली में कार्यरत है। वह बैडमिंटन चैंपियन भी है। वहीं, छोटी बेटी पूजा आईआईटी खड़गपुर से ग्रेजुएट है और गरीब बच्चों के खेलकूद के लिए पार्क बनवाती है। डेढ़ सौ पार्क बनवा चुकी है। बेटों की कभी जरूरत ही महसूस नहीं हुई। इतनी खुशियां बेटियों ने दी है। (वीके रॉय व पत्नी विमला रॉय अपनी बेटियों श्वेता व पूजा के साथ।)
विज्ञापन
विज्ञापन

7 of 7
- फोटो : amar ujala
ईश्वर ने बेटियां दीं, मैं खुशनसीब हूं
21वीं सदी बेटियों की है और बेटियों पर पर नाज होना स्वाभाविक है। लखनऊ परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव व साहित्यकार पत्नी आकांक्षा यादव ने कहा कि दोनों बेटियों पर गर्व है। बेटियों ने ही हमारी दुनिया खूबसूरत बनाई है। मेरी दो बेटियां हैं अक्षिता, जिसे प्यार से पाखी कहता हूं और अपूर्वा। अक्षिता को भारत की सबसे कम उम्र में राष्ट्रीय बाल पुरस्कार मिला है।

ऐसे ही अंतरराष्ट्रीय ब्लॉगर्स सम्मेलन में नाम रोशन कर चुकी है। उन्होंने बताया कि पाखी की दुनिया ब्लॉक के जरिए अपनी क्रिएटिविटी को नए आयाम दिए हैं। वहीं छोटी बेटी अपूर्वा भी ड्राइंग, डांसिंग में मास्टर है। मैं खुद को बहुत खुशनसीब मानता हूं कि मुझे ईश्वर ने बेटियां दीं। जो मेरी जान हैं और उन्हें एक मुकाम तक पहुंचाने में मैं कोई कमी नहीं छोड़ूंगा। मेरी बेटियां भविष्य की नई इबारत लिखेंगी, इसकी मुझे उम्मीद है। (कृष्ण कुमार यादव बेटी अक्षिता व अपूर्वा के साथ।)
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें