क्या सूर्य की किरणें हमारे लिए किसी प्रकार का खतरा हैं? सामान्य तौर पर नहीं, लेकिन हमारे फैलाए जा रहे वाहनों के प्रदूषण, शरीर पर उकेरे जा रहे टैटू, सिगरेट के धुएं की मौजूदगी में यह खतरनाक बन रही है। इन परिस्थितियों में सूर्य की किरणों में मौजूद पराबैगनी रेडिएशन त्वचा का कैंसर भी दे सकती हैं।
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लखनऊ के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टॉक्सिकोलॉजी रिसर्च के अध्ययनकर्ताओं ने ‘फोटो-टॉक्सिसिटी’ पर अपना शोध जारी करते हुए इन खतरों का खुलासा किया है।
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रिपोर्ट में अध्ययनकर्ताओं ने बताया है कि इन हालात में पराबैगनी किरणों से त्वचा कोशिकाओं का स्वरूप ही बदलने लगता है। पराबैगनी किरणों के लंबे समय तक संपर्क में रहने से त्वचा के कैंसर का दावा मेडिकल साइंस में किया जाता रहा है।
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दूसरी ओर वातावरण में वाहनों में उपयोग किए जा रहे जीवाश्म ईंधन, कोयले व लकड़ी जलने, सिगरेट के धुएं से वातावरण में कार्बोजोल तत्व पैदा हो रहा है। त्वचा पर टैटू में उपयोग होने वाली काली स्याही, काजल से भी यह पैदा हो सकता है।
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आईआईटीआर के अध्ययनकर्ताओं की टीम अजीत श्रीवास्तव, ज्योति सिंह, दिव्या दूबे, दीप्ति चोपड़ा, मोहम्मद अनस, शिखा, रतन सिंह, सैयद फैज ने कार्बोजोल के पराबैगनी किरणों में त्वचा पर हो रहे असर को अलग-अलग अध्ययन में शामिल किया।
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सामने आया कि कार्बोजोल प्रतिक्रिया करते हुए रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज (आरओएस) पैदा कर रहा है। यह अपोप्टोसिस (कोशिकाओं को खुद नष्ट करने की प्रक्रिया) शुरू कर देता है। इसे फोटो-टॉक्सिसिटी नाम दिया गया है और यह यह त्वचा के कैंसर की शुरुआत के आसार पैदा करने वाली स्थितियां हैं।
अध्ययनकर्ताओं के अनुसार रिसर्च में सामने आए तथ्य इशारा कर रहे हैं कि हमारे वातावरण में कार्बोजोल और पराबैगनी किरणों की मौजूदगी को ज्यादा गहराई से समझने की जरूरत है। हमारे स्वास्थ्य पर यह खतरे इशारा हैं कि जैसा वातावरण हम बना रहे हैं, वह हमें घर से निकलना भी मुश्किल बना रहा है।