किसी जमाने में घर के बुजुर्ग या फिर पाठ्य पुस्तकें और कुछ पत्रिकाएं ही बच्चों के साहित्य का जरिए हुआ करती थीं। ...लेकिन तेजी से बदलते परिवेश ने जबकि पूरे परिदृश्य को ही बदल दिया है और हर हाथ में मोबाइल पर सब कुछ उपलब्ध है तो ऐसे समय में बच्चों केलिए हिंदी साहित्य में भी बदलाव की जरूरत है। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए सोशल मीडिया से लेकर स्कूलों तक में डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार किया जा रहा है। बाल साहित्यकार मानते हैं कि आज के डिजिटल युग में बाल साहित्य को भी बदलाव की जरूरत है। आइये आज हम आपकी मुलाकात करवाते हैं राजधानी के कुछ ऐसे ही बाल साहित्यकारों से जिन्होंने लंबे समय तक बच्चों के लिए हिंदी में रोचक कहानियां और कविताएं लिखीं।
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जाकिर अली
- फोटो : amar ujala
कम समय में जाकिर ने किया बाल साहित्य में बड़ा काम
महज 47 साल के जाकिर अली ‘रजनीश’ ने बाल साहित्य में बड़ा काम किया है। उनकी अब तक 72 से ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिसमें ज्यादातर बच्चों के लिए ही हैं। उत्तर प्रदेश संस्थान से उन्हें छह बार सम्मानित किया जा चुका है। 2001 में प्रतिष्ठित रतनलाल शर्मा सम्मान मिलने के साथ ही जर्मनी के सरकारी रेडियो की ओर से सम्मानित किया जा चुका है। उनके लेखन का मुख्य विषय है मनोवैज्ञानिक कहानियां और विज्ञान कथाएं। वे सहज और सरल हिंदी भाषा में बच्चों के लिए विज्ञान के विषयों को रोचक अंदाज में उठाते हैं। बच्चों के लिए हिंदी की कार्यशालाओं केअलावा वे विज्ञान के चार ब्लॉग भी संचालित करते हैं जिसके ढाई करोड़ से ज्यादा पाठक हैं।
माह में एक बाल पत्रिका बच्चों को जरूर दिलाएं
जाकिर अली ‘रजनीश’ कहते हैं कि बच्चों में हिंदी के प्रति शुरू से ही रुचि जगाने के लिए माह में कम से कम एक बाल पत्रिका अगर अभिभावक उपलब्ध कराते रहें तो उनमें काफी सुधार आएगा। एक चॉकलेट की कीमत के बराबर हम बच्चों को एक अच्छी बाल पत्रिका पढ़ने को दें।
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सूर्य कुमार पांडेय
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पांच दशक से बाल साहित्य गढ़ रहे सूर्य कुमार पांडेय
बाल गीतों में नव प्रतीक और बिम्ब के प्रयोगधर्मी कवि सूर्य कुमार पांडेय विगत पांच दशक से बाल साहित्य लेखन का कार्य कर रहे हैं। उनकी अब तक 23 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी एक हजार से अधिक बाल कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं। साथ ही उनकी बाल कविताएं उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात समेत कई राज्यों के सरकारी पाठ्यक्रमों में शामिल हैं। वहीं उनकी एक बाल कविता संयुक्त अरब अमीरात के न्यू मॉडल इंडियन स्कूल के पाठ्यक्रम में भी पढ़ाई जा रही है। एनसीईआरटी, उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान और राज्य शिक्षा संस्थान से भी इनकी बाल कविता की पुस्तकें प्रकाशित हैं और कई विश्वविद्यालयों में शोध कार्य भी हुए हैं। वर्ष 2019 में सूर्य कुमार पांडेय को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का सर्वोच्च बाल पुरस्कार बाल साहित्य भारती प्रदान किया गया। 66 वर्षीय सूर्य कुमार पांडेय को देश-विदेश में दर्जनों प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।
डिजिटल युग के बच्चों की कल्पना के अनुसार हो लेखन
सूर्य कुमार पांडेय कहते हैं कि बाल मन और उनके परिवेश से कटा बाल साहित्य न तो बच्चों को पसंद आता है और न ही उनमें अपनी मातृभाषा के लिए रुचि जगाने वाला होता है। उन्होंने कहा कि डिजिटल काल के बच्चों के लिए उनकी नई कल्पना के अनुरूप रोचक भाषा में साहित्य उपलब्ध कराना ही आज की जरूरत है। सरकार अगर बच्चों को उनकी पाठ्य पुस्तकों से इतर हिंदी की बाल पुस्तकें भी दे सके तो यह बच्चों में हिंदी प्रेम की ललक जगाने में सार्थक पहल हो सकती है।
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हेमंत श्रीवास्तव
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हेमंत श्रीवास्तव ने बाल साहित्य को समर्पित किया जीवन
बच्चों के लिए कहानियां और नाटक लिखने वाले हेमंत श्रीवास्तव ने अपना पूरा जीवन बाल साहित्य लेखन को समर्पित कर दिया। 62 वर्षीय हेमंत श्रीवास्तव ने अब तक आधा सैकड़ा से ज्यादा पुस्तकें लिखी हैं। आकाशवाणी से लेकर शैक्षिक टेलीविजन से जुड़े रहे हेमंत का एक नाटक ‘पानी पानी कितना पानी’ प्रकाशित होने वाला है। 2012 में उन्हें राजीव गांधी एक्सीलेंस से सम्मानित किया गया तो वहीं उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से उन्हें डॉ. रामकुमार वर्मा बाल नाटक सम्मान से नवाजा जा चुका है। घर पर बनाना होगा हिंदी का माहौल
हेमंत मानते हैं कि बच्चों को चाहे जिस माध्यम के स्कूल में पढ़ाया जाए लेकिन घर पर माहौल हिंदी का ही रखना होगा। बच्चों को किस्से, कहानियां सुनाने का दौर खत्म होता जा रहा है जो काफी घातक है।
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अखिलेश श्रीवास्तव
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अखिलेश ‘चमन’ की रचनाएं रहीं हर पत्रिका की पसंद
अखिलेश श्रीवास्तव ‘चमन’ की रचनाएं देश की लगभग सभी हिंदी पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। फिर चाहे बात कविताओं की हो या कहानियों की, उनका बाल साहित्य में लेखन कई दशक से गतिमान है। 29 पुस्तकें लिख चुके अखिलेश ‘चमन’ स्टाम्प एवं रजिस्ट्रेशन विभाग से अतिरिक्त आईजी के पद से दो वर्ष पूर्व रिटायर हुए थे। उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की ओर से भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से अमृतलाल नागर कथा सम्मान से नवाजा जा चुका है। 2013 में उन्हें कमलेश्वर कहानी पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।
अभिभावकों को बदलनी होगी अंग्रेजी मानसिकता
अखिलेश श्रीवास्तव ‘चमन’ कहते हैं कि हिंदी के उत्थान और बच्चों में रुचि बढ़ाने के लिए अभिभावकों को अपनी अंग्रेजी मानसिकता में बदलवा करना होगा। अब ज्यादातर घरों से हिंदी की पत्रिकाएं गायब हो चुकी हैं और इसीलिए कई प्रतिष्ठित बाल पत्रिकाएं बंद हो चुकी हैं। अभिभावक अपने बच्चों को अंग्रेजियत में ढालने के चक्कर में खिचड़ी बना रहे हैं। बच्चों को न तो अंग्रेजी ही ठीक से आती है और न ही हिंदी में ही वे निपुण हो पाते हैं। स्कूलों से वाचनालय, वाद-विवाद प्रतियोगिताएं, निबंध लेखन या कविता लेखन प्रतियोगिताएं विलुप्त होती जा रही हैं। हमें समझना होगा कि मातृभाषा में ही हमारा विकास बेहतर हो सकता है।