ये तस्वीरें हैं अवध शिल्प ग्राम की। श्रमिकों को यहां से आगे के सफर के लिए बसें मुहैया कराई जा रही हैं। खाना-पीना भी मिल रहा है। सैकड़ों मील का सफर तय कर आ रहे श्रमिकों के लिए यह एक उम्मीद का केंद्र है। हालांकि बिहार के लिए बसें नहीं थीं तो कई श्रमिक पैदल ही चल दिए।
विज्ञापन
2 of 5
- फोटो : amar ujala
जो थोड़ा सा सुकूं मिला...
ये नन्हे-मुन्ने मीलों का सफर तय कर जब अवध शिल्पग्राम पहुंचे तो यहां साफ-सुथरी जगह और सुकूं मिलते ही नींद की आगोश में खो गए।
विज्ञापन
3 of 5
- फोटो : amar ujala
लो हम दुनिया समेट लाए...
दुनिया होती होगी बहुत बड़ी, पर अपनी तो यही है। परिवार, कुछ कपड़े, कुछ बिछौने और कुछ रोटियां। किसी के लिए ये होगी महज एक गठरी, पर अपना तो सबकुछ यही है। उम्मीद भी, हौसला भी और जरूरत भी...।
4 of 5
- फोटो : amar ujala
एक बाइक पर पांच-पांच
ये हैं राम देव सिंह और ओंकार। दोनों गोरखपुर के हैं। महाराष्ट्र सोलापुर में पेंट करने का काम करते हैं। लॉकडाउन में काम ठप हो गया तो 6 दिन पहले घर के लिए निकल पड़े। लंबे सफर में थके बच्चे सोते हुए गिर न जाए इसलिए अंगौछे से उन्हें अपनी कमर से बांध लिया।