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ये लक्षण दिखें तो हो जाएं सावधान, कहीं इस बीमारी की गिरफ्त में आपका बच्चा भी तो नहीं

Mon, 05 Aug 2019 03:57 PM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क/अमर उजाला, लखनऊ
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प्रतीकात्मक तस्वीर
तरक्की खुशी देती है। पर, तरक्की और खुद का अच्छा परफॉर्मेंस ही डराने लगे तो? इतना कि जिस काम में माहिर हैं, उसी को लेकर डरने लगें। चौंकिए नहीं, सोशल फोबिया जिसे आसान शब्दों में सामाजिक डर भी कह सकते हैं, तेजी से किशोरों व युवाओं को गिरफ्त में ले रहा है। ये डर है दूसरे की अपेक्षाओं पर खरे उतरने का। सबसे खास बात ये है कि इसकी चपेट में किशोर व युवा आ रहे हैं। मनोचिकित्सकों के अनुसार उनके पास पहुंचने वाले इस तरह के मामलों में ज्यादातर की उम्र 15 से 25 साल की होती है।
 
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प्रतीकात्मक तस्वीर
एक तरफ जहां सोशल मीडिया खुलापन लेकर आया है, लोग पहले से कहीं ज्यादा मुखर हुए हैं, वहीं दूसरी ओर अपेक्षाओं पर खरे न उतर पाने का डर युवाओं को गिरफ्त में ले रहा है। इसका युवाओं पर कैसा असर पड़ रहा है, ये जानने के लिए केजीएमयू के मनोचिकित्सक डॉ. आदर्श त्रिपाठी से हमने बात की। डॉ. त्रिपाठी बताते हैं,मैं एक दिन की ओपीडी में कम से कम सात ऐसे मरीजों को तो देखता ही हूं। इनका औसत मान लिया जाए तो एक सप्ताह में 30-40 मरीज केजीएमयू के ही मानसिक रोग विभाग में आ जाते हैं। वहीं, मनोचिकित्सक व बीबीएयू में चीफ साइकोलॉजिकल काउंसलर डॉ. नेहा आनंद बताती हैं कि मैं हफ्ते में चार से पांच ऐसे मरीज देखती हूं। इस सबका कितना बुरा असर मरीज की जिंदगी पर पड़ता है, इस सवाल पर वे बताती हैं कि सही इलाज न होने पर उम्र के साथ बढ़ता जाता है और कई अन्य शारीरिक व मानसिक  बीमारियों का शिकार बनाता है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
इन मामलों से जानिए कैसे बढ़ रहा अपेक्षाओं पर खरे उतरने का डर
वह स्कूल में अच्छा प्रदर्शन कर रही थी, पर दो महीने से जाना ही बंद
शहर के जाने-माने स्कूल में हाईस्कूल की छात्रा (16-17 वर्ष) का इलाज केजीएमयू के मानसिक रोग विभाग में चल रहा है। उसकी परेशानी तब पता चली जब उसे अकेले प्रेजेंटेशन देने के लिए स्कूल ने कहा। वह ग्रुप में तो अच्छा करती थी, लेकिन अकेले प्रेजेंटेशन देने के नाम पर वह चिंतित रहने लगी। वह कक्षा में पीछे बैठने लगी। उसके प्रदर्शन पर भी असर पड़ा। वह स्कूल में किसी से बात करने से भी कतराने लगी। कक्षा में जाने के नाम पर भी उसे डर लगने लगा। वह सोचती कि सब उसे घूर रहे हैं, मजाक उड़ा रहे हैं। बीते दो-ढाई महीने से उसने स्कूल जाना बंद कर दिया है।

प्रमोशन के बाद ब्रिटेन जाने को कहा गया तो घबराने लगा
लखनऊ का 25 साल का युवक बीटेक करने के बाद नौकरी करने बेंगलूरू चला गया। उसका मेल-मिलाप कम था। वह ज्यादातर समय कंप्यूटर पर बिताता था। हालांकि उसका काम अच्छा था। कम समय में ही उसका प्रमोशन हुआ और उसे टीम लीडर के रूप में ब्रिटेन जाने को कहा गया। वह इसको लेकर घबराने लगा कि बाहर कैसे जाऊंगा? क्या वहां बेहतर प्रदर्शन कर पाऊंगा? मैं इस काबिल नहीं था, यह प्रमोशन मुझे यूं ही मिल गया...। उसने यह सब दोस्त से बताया। उसने मनोचिकित्सक को दिखाने की सलाह दी। काउंसलिंग व कुछ दवाओं के बाद उसकी चिंता कम हुई और वह विदेश गया।
 
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प्रमोशन के बाद ब्रिटेन जाने को कहा गया तो घबराने लगा
लखनऊ का 25 साल का युवक बीटेक करने के बाद नौकरी करने बेंगलूरू चला गया। उसका मेल-मिलाप कम था। वह ज्यादातर समय कंप्यूटर पर बिताता था। हालांकि उसका काम अच्छा था। कम समय में ही उसका प्रमोशन हुआ और उसे टीम लीडर के रूप में ब्रिटेन जाने को कहा गया। वह इसको लेकर घबराने लगा कि बाहर कैसे जाऊंगा? क्या वहां बेहतर प्रदर्शन कर पाऊंगा? मैं इस काबिल नहीं था, यह प्रमोशन मुझे यूं ही मिल गया...। उसने यह सब दोस्त से बताया। उसने मनोचिकित्सक को दिखाने की सलाह दी। काउंसलिंग व कुछ दवाओं के बाद उसकी चिंता कम हुई और वह विदेश गया।
 
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Tension Student
ये लक्षण दिखें तो हो जाएं सावधान
हमेशा यही लगे कि लोग मेरे बारे में बात कर रहे हैं।
कोई भी काम करने से पहले कहना कि लोग क्या कहेंगे।
दूसरे लोगों की उपस्थिति में घबराहट होना।
लोगों के बीच जाने पर दिल की धड़कन बढ़ जाना।
पसीने आना, जोर-जोर से पैर हिलाने लगना।
चेहरा लाल हो जाना, उल्टी आना, कंपकंपी होना।

 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
इसलिए सताता है डर...
- इंसान के दिमाग का वह हिस्सा जो डर और भावनाओं से जुड़ा होता है जिनमें ज्यादा सेंसेटिव होता है, उन्हें सोशल फोबिया होता है।
- कुछ बच्चे या युवा हर बात को नकारात्मक तरीके से लेने के आदी होते हैं। वे खुद को लेकर हमेशा सशंकित होते हैं।
- कई लोगों के अतीत में ऐसी कोई घटना होती है, जिससे वह वर्तमान में डर पाल लेते हैं।
व्यायाम और ध्यान करें

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डॉ आदर्श - फोटो : अमर उजाला
व्यायाम और ध्यान करें
डॉ. आदर्श बताते हैं कि आमतौर पर ऐसे मामलों में मरीज दवाइयों और साइकोलॉजिकल थेरेपी का सहारा लेते हैं। उनकी चिंता कम करने के लिए एंटी एंग्जायटी दवाएं दी जाती हैं। समस्या जड़ से खत्म करने के लिए कॉगनिटिव बिहेवियर थेरेपी (सीबीटी) का सहारा लिया जाता है। इसमें रोगी के नकारात्मक विचारों को सामने रखा जाता है। रोगी को हालात का सामना करने के लिए तैयार किया जाता है। साथ ही उसे एक्सरसाइज व मेडिटेशन की सलाह दी जाती है।
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डॉ नेहा आनंद - फोटो : अमर उजाला
बंद न करें मरीज से संवाद
डॉ. नेहा आनंद का कहना है कि डॉक्टरी सलाह के साथ मरीज के अभिभावकों, दोस्तों और रिश्तेदारों की भी काउंसलिंग जरूरी होती है। इन्हें समझना होगा कि यदि आपका कोई अपना सोशल फोबिया का शिकार है तो उससे संवाद बंद न करें।
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