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स्मृति शेष : भाजपा की विजय, पराजय व पुनरुत्थान के सूत्रधार, कठोर प्रशासक... मगर दिल के उतने ही नरम रहे कल्याण सिंह

Sun, 22 Aug 2021 01:08 AM IST
पंकज श्रीवास्‍तव अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ

सार

कल्याण सिंह... कहते थे दिल की राजनीति करता हूं, दिमाग की नहीं। कई बार भाजपा से अलग हुए तो माफी मांगकर लौटने में भी संकोच नहीं किया। हालांकि जब-जब भाजपा से दूर हुए, पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा।
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योगी आदित्यनाथ और कल्याण सिंह - फोटो : amar ujala
तारीख 21 जनवरी 2009। लखनऊ स्थित माल एवेन्यू का 2 नंबर बंगला। कल्याण सिंह बोल रहे थे, ‘भाजपा में वापस जाना मेरी भारी भूल थी। मुझे इस पर भारी पश्चाताप है। मुझे राम मंदिर पर अपनी भूमिका के लिए अफसोस है। इस बार मैंने हमेशा-हमेशा के लिए भाजपा से नाता तोड़ दिया है। अब इस जन्म तो क्या, सात जन्मों तक भाजपा में नहीं जाऊंगा। मेरी लाश भी वहां नहीं जाएगी। मैंने जिन हाथों से भाजपा को बनाया है, उन्हीं हाथों से उसे जमीन में गहरा गड्ढा खोदकर दफन कर दूंगा।’
ये वही कल्याण सिंह थे जो भाजपा के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे... जिन्होंने प्रदेश भाजपा को बनाया ही नहीं, बल्कि बढ़ाने में पूरी ताकत लगाई... जो भाजपा व हिंदुत्व की राजनीति के पर्याय माने जाते थे... जिन्होंने 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में ढांचा ध्वंस के बाद राज्यपाल को त्यागपत्र सौंपने के बाद कहा था, उस जीर्ण-शीर्ण इमारत को बचाने के लिए मैं कारसेवकों पर गोली नहीं चलवा सकता था। मुझे ढांचा ढह जाने पर कोई अफसोस नहीं है। जहां तक सरकार का सवाल है, तो एक क्या सैकड़ों सरकारें राममंदिर पर न्योछावर हैं...।
ये वही कल्याण थे जिन्होंने ढांचा ढहने और सरकार जाने के बाद देश के कई हिस्सों में जनादेश यात्रा निकालकर रामलला की खातिर हजारों सत्ताओं को ठोकर मारने की हुंकार भरी थी। सर्वोच्च न्यायालय में दिए गए शपथ पत्र के अनुसार ढांचा न बचा पाने पर न्यायालय की अवमानना का मामला चलने व सजा मिलने के सवाल पर बोले थे, ‘रामलला के मंदिर की खातिर एक जन्म नहीं, जन्मों तक सजा भुगतने को तैयार हूं’। उन्होंने 1991 में प्रदेश में सरकार बनने के बाद पूरी कैबिनेट के साथ अयोध्या जाकर रामलला के जन्मस्थल पर भव्य राम मंदिर निर्माण की सौगंध खाई थी।
ये वही कल्याण थे जो एक बार पहले भी भाजपा छोड़ चुके थे। जिनके कारण 2002 के चुनाव में भाजपा को बड़ा राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा था, लेकिन 2004 में भाजपा में लौटने पर फिर कभी पार्टी न छोड़ने की घोषणा की थी। हालांकि 2009 में फिर ऐसा कुछ हुआ कि उन्होंने पार्टी छोड़ दी। पर, 2013 आते-आते 2009 की कसमें भूल फिर भाजपा में लौटे। जिसे दफनाने की बात करते थे, उसे दमकाने, चमकाने और सत्ता दिलाने के लिए मोदी के साथ प्रदेश भर में घूमे। जिसकी कहानी आगे। बहरहाल, भाजपा के उत्थान, पतन और पुनरुत्थान के सूत्रधार कल्याण की कहानी काफी उतार-चढ़ाव व मोड़ों से गुजरती है। वह ऐसे नेता रहे जो जब भाजपा के साथ रहे तो वह बढ़ी, लेकिन जब वह हटे तो यह पार्टी भी घट गई।
मुख्य सियासी किरदार
अलीगढ़ की अतरौली तहसील के मढ़ौली गांव के चौधरी तेजपाल और माता सीता देवी के पुत्र जो आगे चलकर शिक्षक भी हुए, उन कल्याण के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बनने से लेकर, शिक्षक, सियासी किरदार, जनसंघ व भाजपा नेता, मंत्री, मुख्यमंत्री और फिर राज्यपाल बनने की कहानी में कई पड़ाव हैं। तरह-तरह के रंग हैं और पात्रों के अलग-अलग ढंग हैं। यह कहानी सिर्फ  कल्याण पर नहीं घूमती है बल्कि राम जन्मभूमि आंदोलन और 90 की कारसेवा के बाद देश व प्रदेश की राजनीति में आए बदलावों को भी बताती हुई चलती है। यही वह वजह भी है कि प्रदेश ही नहीं देश के राजनीतिक इतिहास में कल्याण अपनी भूमिका से एक ऐसी जगह बना लेते हैं, जिनकी चर्चा किए बिना देश व प्रदेश के राजनीतिक इतिहास पर चर्चा पूरी ही नहीं हो सकती। सिलसिलेवार नजर डालते हैं कल्याण के किरदार की महत्ता की कहानी पर...
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अटल बिहारी बाजपेयी के साथ कल्याण सिंह - फोटो : अमर उजाला
ढांचा बचे न बचे गोली नहीं चलवाऊंगा
हिंदुत्व के समीकरण को कमजोर करने के लिए पिछड़ों के साथ मुसलमानों को लामबंद करने में जुटे मुलायम, अजित व वीपी सिंह की चालों को मात देते हुए भाजपा को जीत दिलाने वाले कल्याण बतौर मुख्यमंत्री पहले कार्यकाल में सत्ता के विकेंद्रीकरण से लेकर सुशासन के लिए किए गए तमाम फैसलों को लेकर चर्चित हुए। उन्होंने जोतबही के रूप में किसानों का न सिर्फ  उनकी जमीन का स्थायी मूल दस्तावेज उपलब्ध कराया, बल्कि वरासत की समयसीमा तय करने जैसे क्रांतिकारी फैसले भी लिए। पर, पहले कार्यकाल में नकल विरोधी कानून के अलावा जिस फैसले के लिए वह सर्वाधिक चर्चित हुए वह था 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या ढांचा ढहा रहे कारसेवकों पर गोली न चलाने का। उन्होंने तत्कालीन डीजीपी से लेकर अयोध्या (तत्कालीन फैजाबाद) के जिलाधिकारी व पुलिस अधीक्षक को लिखकर दे दिया कि गोली नहीं चलेगी। यह आदेश उन्होंने तब दिया जबकि सर्वोच्च न्यायालय में उन्होंने बतौर मुख्यमंत्री ढांचे की स्थिति को जस का तस रखने और उसकी सुरक्षा का शपथपत्र दिया था। ढांचा न बचा पाने के कारण उन्हें न्यायालय से एक दिन की सजा भी भुगतनी पड़ी। सरकार भी चली गई। कल्याण ने कहा, ‘राममंदिर के लिए एक नहीं सैकड़ों सत्ता कुर्बान।’ राज्यपाल को त्यागपत्र देने के बाद कल्याण ने कहा, ‘ढांचा ढहने पर उन्हें कोई अफसोस नहीं है। जो हुआ वह ईश्वर की इच्छा से हुआ। पराशक्ति ने किया।’ सरकार भले ही चली गई लेकिन कल्याण हिंदू वादी नेता की छवि और मजबूत हुई। वह हिंदू हृदय सम्राट कहे जाने लगे।
 
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कल्याण सिंह से आशीर्वाद लेत अमित शाह - फोटो : अमर उजाला
शूलों से खेला हूं, फूलों से मनुहार नहीं। टूक-टूक तन हो, लेकिन झुकना स्वीकार नहीं।।
आपातकाल के दिनों में जेल में कल्याण सिंह के द्वारा रची गई यह कविता एक तरह से उनका पूरा परिचय दे देती है। अलीगढ़ के अतरौली से विधानसभा के 12 चुनाव लड़कर दस बार विधायक, दो बार सांसद (लोकसभा सदस्य), दो बार प्रदेश के मुख्यमंत्री और फिर राजस्थान के राज्यपाल व कई प्रदेशों के राज्यपाल का समय-समय पर कार्यभार। संघ के स्वयंसेवक व पदाधिकारी, फिर जनसंघ और भाजपा में कई पदों की जिम्मेदारी। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, विधानसभा में विपक्ष के नेता। प्राइमरी स्कूल में शिक्षक से प्रदेश के बड़े सियासी किरदार तक सफर। कठोर प्रशासक और अक्खड़ राजनेता। जो तय कर लिया करके माने। देखने में जितने कड़क अंदर से उतने ही मुलायम। काम और सिद्धांत के प्रति पूरा समर्पण, लेकिन स्वाभिमान पर चोट लगी तो संघर्ष से कोई समझौता नहीं। चौधरी तेजपाल सिंह लोधी की पत्नी सीता देवी की कोख से 5 जनवरी 1932 को कल्याण के जन्म लेने के बाद शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह बालक एक दिन प्रदेश की ही नहीं बल्कि देश की सियासत में अपना नाम एक महानायक के रूप में दर्ज करा जाएगा। सांसद राजवीर के रूप में एक पुत्र और एक पुत्री के पिता कल्याण भाजपा के समर्पित व निष्ठावान कार्यकर्ता रहे, लेकिन सवाल जब नीति, नीयत, निर्णयों और संकल्पों तथा सरोकारों पर उठे तो उनके विरोध में भी खड़े होने में नहीं हिचके। टूट गए, लेकिन झुके नहीं।

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सुषमा स्वराज, अटल बिहारी बाजपेयी के साथ कल्याण सिंह - फोटो : अमर उजाला
पहला चुनाव हारे, लेकिन हारे नहीं
एक वक्त था जब अटल बिहारी वाजपेयी के बाद कल्याण सिंह ही वह शख्स थे, जिन्हें भीड़ जुटाऊ और चुनाव जिताऊ नेता माना जाता था। संघ से जुड़ाव तो बाल्यकाल से ही था। संघ के तहसील कार्यवाह से लेकर तमाम जिम्मेदारियां संभालते हुए जनसंघ में सक्रिय हो चुके थे। उसी दौरान उनकी मुलाकात अतरौली और डिबाई के बीच स्थित धर्मपुर गांव के रहने वाले जनसंघ के नेता हिम्मत सिंह से हुई। वे क्षेत्र में जनसंघ के बड़े नेता थे। एक तरह से कल्याण के राजनीतिक गुरु की भूमिका में आ गए। वर्ष 1962 में उन्होंने मढ़ौली के रहने वाले लोध समाज के 30 साल के युवा कल्याण सिंह को अतरौली से जनसंघ के टिकट पर चुनाव लड़ाया, लेकिन वह सोशलिस्ट पार्टी के बाबू सिंह यादव से चुनाव हार गए। कल्याण चुनाव हारे, लेकिन हिम्मत नहीं हारे।
जीते तो जीतते ही चले गए
वर्ष 1967 में उन्हें जनसंघ ने फिर अतरौली से उम्मीदवार बनाया। इस बार उन्होंने कांग्रेस के अमर सिंह को पराजित कर चुनाव जीत लिया और पहली बार विधायक बनकर विधानसभा पहुंचे। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। यह वह समय था जब प्रदेश में चौधरी चरण सिंह कांग्रेस छोड़कर भारतीय क्रांति दल बनाकर गैर कांग्रेसी राजनीतिक धारा को मजबूत बनाने का काम कर रहे थे। इसी समय देश में हरित क्रांति का जोर था। चौधरी चरण सिंह खुद किसानों को बड़े नेता बनकर उभर चुके थे। खासतौर से पश्चिमी यूपी के किसानों में आर्थिक के साथ राजनीतिक व सामाजिक मजबूती की चेतना जग चुकी थी। इन किसानों में ज्यादातर पिछड़ी जातियों के थे। समीकरणों के चलते कल्याण सिंह भी जनसंघ में पिछड़ी जातियों का बड़ा चेहरा बनकर उभरने लगे। बहुत जल्द उन्हें प्रदेश के संगठन में जिम्मेदारी मिल गई।
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स्वतंत्र देव सिंह के साथ कल्याण सिंह - फोटो : अमर उजाला
जब भाजपा की हार पर खुश हुए
राक्रांपा विधानसभा चुनाव 2002 में तमाम सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए। कल्याण के अलग होने के कारण भाजपा को लगभग 72 सीटों पर सीधा नुकसान उठाना पड़ा। वह 174 से 88 सीटों पर आ गई। इस चुनाव की खास बात यह थी कि जिन 72 सीटों पर भाजपा हारी थी, वहां कल्याण के उम्मीदवारों के वोट और भाजपा के वोटों का योग जीत के समीकरण बना रहे थे। कल्याण ने कहा कि भाजपा अपनी औकात देख ले।
लौटकर कल्याण भाजपा में आए
कल्याण भाजपा से ज्यादा दिन दूर नहीं रह सके। बात 2003 की है। कल्याण को पुराने संगठन में वापसी का मोह सताने लगा। लोकसभा का 2004  का चुनाव सिर पर था। भाजपा नेताओं को भी एहसास हुआ कि कल्याण को लाए बिना पिछड़ी जातियों का समर्थन पाना काफी मुश्किल है। बातचीत हुई। आखिर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन की पूर्व संध्या पर भाजपा नेता लालजी टंडन के तत्कालीन आवास 13 माल एवेन्यू पर शाम को आयोजित कार्यक्रम में कल्याण आए और उन्होंने अटल को लड्डू खिलाते हुए कहा, ‘मैंने श्रद्धेय वाजपेयी पर एक अंगुली उठाई थी, लेकिन आज पांचों अंगुली जोड़कर उन्हें लड्डू खिलाकर उस गलती की माफी मांग रहा हूं।’ कुछ दिन बाद कल्याण विधिवत भाजपा में आ गए। भाजपा ने उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया और बुलंदशहर से लोकसभा का चुनाव लड़ाया। वह चुनाव जीते। पर, भाजपा को प्रदेश से पर्याप्त सीटें नहीं दिला सके। केंद्र में भाजपा की सत्ता चली गई।
फिर अलग हुए भाजपा से
कल्याण की 2007 के विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा नेताओं से फिर ठनने लगी थी। हुआ यह था कि विधानसभा के चुनाव में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने कल्याण सिंह को भावी मुख्यमंत्री घोषित करते हुए मैदान में उतरने का एलान किया। कल्याण उस समय पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष होने के साथ प्रदेश के प्रभारी भी थे। पर, सरकार बनना तो दूर भाजपा 88 से सिमटकर 51 सीटों पर आ गई। कल्याण को लगता था कि पार्टी के भीतर गुटबाजी और खींचतान ने यह हाल किया है। उन्होंने पार्टी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह को पत्र लिखकर यूपी की स्थिति पर समीक्षा का सुझाव दिया। पर, समीक्षा तो दूर, उनका प्रभारी पद से त्यागपत्र जरूर स्वीकार कर लिया गया। उनकी जगह अरुण जेटली प्रभारी बना दिए गए। कल्याण इससे चिढ़ गए। इधर, भाजपा की तरफ  से सोची-समझी रणनीति के तहत या अनजाने में, जो भी हो उनकी अनदेखी होने लगी। भाजपा से सांसद रह चुके अशोक प्रधान को कल्याण नापसंद करने लगे थे। हालांकि प्रधान पहले कल्याण के ही खास थे, लेकिन बाद में वह उनके विरोधी हो गए थे। कल्याण नहीं चाहते थे कि प्रधान को टिकट मिले, लेकिन सबसे पहले उनका ही टिकट घोषित हो गया। इससे कल्याण और चिढ़ गए। इसी बीच, मीडिया में खबरें फैली कि कल्याण अपने पुत्र राजवीर को भाजपा से मनचाही सीट से लोकसभा का टिकट दिलाना चाहते हैं। कल्याण को लगा कि भाजपा के कुछ नेता उनके खिलाफ  साजिश रच रहे हैं। आखिर 20 जनवरी 2009 को उन्होंने भाजपा को फिर अलविदा कह दिया।
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कल्याण सिंह (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
स्वास्थ्य मंत्री की मिली जिम्मेदारी
वर्ष 1969 में कल्याण ने अतरौली से दोबारा अमर सिंह को हराया और फिर 1974 में बीकेडी के अनवार खान को हराकर विधानसभा पहुंचे। यह दौर देश में राजनीतिक उथल-पुथल का था। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगा दिया। कल्याण भी गिरफ्तार हुए और लगभग 21 महीने कठोर कारावास की सजा भुगती। वर्ष 1977 में चुनाव हुए तो कल्याण ने कांग्रेस के अमर सिंह को हराकर फिर जीत हासिल कर ली। उन्हें प्रदेश में रामनरेश यादव के नेतृत्व में बनी जनता पार्टी की सरकार में जनसंघ कोटे से स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया।
नियमों की चलेगी मन की नहीं
बतौर स्वास्थ्य मंत्री अपने कामों से उन्होंने जल्द ही सभी का ध्यान आकृष्ट कर लिया। उनकी प्रशासनिक दक्षता व दृढ़ता का पहला उदाहरण चिकित्सकों के स्थानांतरण में देखने को मिला। कल्याण ने मानक पर आने वाले सभी चिकित्सकों का स्थानांतरण कर दिया। इसकी चपेट में संघ से संबंधित कुछ ऐसे चिकित्सक भी आ गए जो संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों के प्रिय थे। कल्याण पर दबाव पड़ा तो उन्होंने दो टूक कह दिया, ‘मानक में यह तो लिखा नहीं है कि अपनों को इस नियम से छूट रहेगी। अगर स्थानांतरण रुकवाना है तो कैबिनेट में प्रस्ताव लाकर यह नियम बनवाना पड़ेगा कि ये मानक अपने संगठन से संबंद्ध लोगों पर लागू नहीं होंगे।’ बताया जाता है कि किसी से कुछ बोलते नहीं बना। संघ से जुड़े एक वरिष्ठ चिकित्सक को भी लखनऊ से बाहर जाना पड़ा।
 
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कल्याण सिंह (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
हार पर बंटवा डाले लड्डू
वर्ष 1980 में कल्याण सिंह को जिंदगी में दूसरी बार और अंतिम बार पराजय का मुंह देखना पड़ा। इस बार कांग्रेस के टिकट पर उतरे अनवार ने उन्हें हरा दिया। इस हार को कल्याण ने अलग अंदाज में स्वीकार किया। उनके पुत्र सांसद राजवीर सिंह राजू बताते हैं, ‘आमतौर पर चुनाव हारने के बाद लोग मुंह लटकाए घर लौटते हैं। पर, पिताजी पहले जैसी मस्ती और सीना ताने घर आए। हलवाई के यहां से लड्डू और बताशे मंगवाए। खुद खाए और समर्थकों को खिलाया। वह कहते थे, ‘हर हार कुछ खास सिखाती है।’ कल्याण ने भी शायद इस हार से बहुत कुछ सीखा। तभी तो 1980 के बाद उन्होंने न तो पीछे मुड़कर देखा और न कोई चुनाव हारे। वह ऐसे राजनीतिक गणितज्ञ बनकर उभरे जिनकी अंगुली पर प्रदेश की सभी विधानसभाओं के राजनीतिक व जातीय समीकरण रहते थे। उन्होंने 1985 से चुनाव दोबारा जीतने का सिलसिला शुरू किया तो लगातार जीतते रहे। सिंह ने 1985, 1989, 1991, 1993, 1996 के चुनाव में अनवार खां को पटखनी दी।
दिल की राजनीति, दिमाग की नहीं
कल्याण ने एक बार साक्षात्कार में कहा था कि वे दिल की राजनीति करते हैं, दिमाग की नहीं। कल्याण की कहानी के उतार-चढ़ाव देखकर उनकी यह बात पूरी तरह सही साबित हो जाती है कि वे दिल की राजनीति करने वाले थे। इसका पार्टी के भीतर और बाहर उनके विरोधियों ने फायदा भी उठाया। कभी चिढ़ाने वाला काम करके, कभी कुछ ऐसा करके जिससे कल्याण के अहम को सीधी चोट लगे। रामप्रकाश गुप्त के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी कल्याण विरोधी लाबी सक्रिय रही। कल्याण ने जवाबी बयानबाजी जारी रखी। नतीजतन उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया। उन्होंने राष्ट्रवादी क्रांति पार्टी (राक्रांपा) नाम से नई पार्टी बनाने का एलान करते हुए भाजपा नेताओं पर कटाक्ष और तेज कर दिए।

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कल्याण सिंह के साथ साक्षी महाराज - फोटो : अमर उजाला
जब भाजपा से नाता तोड़ा: अतरौली सीट परिवार से फिसली
आंतरिक मतभेदों के कारण भाजपा से अलग हुए और राष्ट्रीय क्रांति पार्टी बनाई। राष्ट्रीय क्रांति पार्टी के बैनर तले वे 2002 का विधानसभा चुनाव दो सीटों अतरौली और सोरों से लड़े। दोनों जगह भाजपा उम्मीदवार को ही हराकर जीते। पर, बाद में सोरों से त्यागपत्र देकर अतरौली की सीट अपने पास रखी। हालांकि 2004 में वह फिर भाजपा में लौटे तथा बुलंदशहर से लोकसभा का चुनाव लड़कर संसद पहुंचे। तब उन्होंने अतरौली सीट छोड़ी। उनके स्थान पर हुए उपचुनाव में उनकी बहू अर्थात राजवीर की पत्नी प्रेमलता चुनाव जीतकर विधानभा पहुंची। प्रेमलता ने 2007 का चुनाव भी अतरौली से जीतकर कल्याण की सीट को परिवार के पास बरकरार रखा। पर, 2012 में सपा के वीरेश यादव ने कल्याण के परिवार के हाथ से यह सीट छीन ली। हालांकि 2017 में उनके पौत्र संदीप सिंह ने भी फिर यह सीट जीतकर परिवार की विरासत बचा ली।

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कुसुम राय के साथ कल्याण सिंह - फोटो : अमर उजाला
सामाजिक समरसता का पैरोकार
कल्याण को जहां अयोध्या में राममंदिर आंदोलन पर सक्रिय व प्रखर भूमिका के लिए याद किया जाएगा तो वहीं उन्हें नकल विरोधी कानून बनाकर प्रदेश में शिक्षा की शुचिता वापस बहाल करने तथा सियासी दांवपेंच में जगदंबिका पाल जैसे शख्स को पटकनी देने तथा मंडल की राजनीति के शोर के समय कमंडल की राजनीति करते हुए भी पिछड़ों के मंदिर आंदोलन व हिंदुत्व से बिलग न जाने देने के लिए जीतोड़ मेहनत के लिए भी याद रखना होगा। उन्होंने मंडल आयोग की सिफारिशों पर बोलते हुए पिछड़ों को उनका हक देने के लिए सामाजिक समरसता का फॉर्मूला सुझाया। जिसमें किसी का अधिकार छीने बिना जरूरतमंदों को उनका अधिकार देने की बात कही। शायद इसीलिए 90 के दशक में जब पिछड़ों को आरक्षण के शोर के बीच अगड़ों व पिछड़ों के बीच शीतयुद्ध जैसा छिड़ा था, उस समय कल्याण मंदिर के साथ मंडल की पैरोकार तमाम जातियोें को, जिन्हें बाद में उन्होंने खुद अति पिछड़ी जातियां कहकर संबोधित किया, भाजपा के साथ जोड़कर रख सके। यह उन्हीं की खूबी थी, जिन्होंने घूम-घूमकर मंदिर के साथ रामराज्य की बात करते हुए पिछड़ी जातियों को यह समझाते हुए भाजपा के साथ जोड़े रखा कि रामराज्य का मतलब ही शोषितों व वंचितों का विकास है।

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पुत्र राजवीर के साथ कल्याण सिंह - फोटो : अमर उजाला
हिंदू हृदय सम्राट
वर्ष 1989 व 90 का दौर था। विश्व हिंदू परिषद और राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति मंदिर आंदोलन को तेज करती जा रही थी। मंदिर मुक्ति को लेकर 30 अक्तूबर 1990 को कारसेवा की घोषणा हो चुकी थी। मंदिर मुद्दे पर टकराव ने बोफोर्स घोटाले की बुनियाद पर साथ आए जनता दल व भाजपा के बीच खटास पैदा कर दी थी। भाजपा ने जनता दल से समर्थन वापस ले लिया था। दूसरी तरफ  तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कारसेवा रोकने की घोषणा करते हुए अयोध्या में किसी परिंदे को भी पर न मारने देने का एलान करते हुए जगह-जगह बैरीकेडिंग कराकरगिरफ्तारियां शुरू कर दी थी। कल्याण ने मंदिर के पक्ष में आरपार का शंखनाद कर दिया। सड़कों पर नारे लग रहे थे, ‘कल्याण सिंह कल्याण करो-मंदिर का निर्माण करो।’ मुलायम को ललकारते हुए कल्याण भी गिरफ्तार हो गए। यही वह दौर था जिसने कल्याण सिंह को हिंदू नेता के रूप में उभारा। अयोध्या में गोली चली। मुलायम सिंह सरकार को आखिरकार चुनाव की घोषणा करनी पड़ी। वर्ष 1991 में विधानसभा के चुनाव हुए। कल्याण सिंह के नेतृत्व में भाजपा ने 425 में 221 सीटें जीतकर पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। यह सरकार 18 महीने चली। मंदिर के नाम पर 24 जून 1991 को बनी भाजपा सरकार 6 दिसंबर 1992 को मंदिर पर ही कुर्बान हो गई।

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लालजी टंडन के साथ कल्याण सिंह - फोटो : अमर उजाला
‘नकल नहीं होगी, नतीजा जो भी हो’
कल्याण सिंह दो बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। दोनों ही बार कुछ फैसलों के लिए वह काफी चर्चित हुए। इनमें कुछ के कारण भाजपा को राजनीतिक नुकसान भी उठाना पड़ा, लेकिन ये निर्णय पार्टी की राजनीतिक यात्रा का ऐसा हिस्सा बन गए जिनका जिक्र किए बिना न कल्याण की कहानी पूरी होती है और न भाजपा की। कल्याण मूलत: शिक्षक थे। ऐसे शिक्षक जिसे न तो समय से समझौता पसंद था और न परीक्षाओं की शुचिता से। उनके साथ शिक्षक रहे राम रजपाल द्विवेदी के संस्मरणो से पता चलता है कि एक बार एक लड़का नकल करने के लिए परीक्षा में कुछ पुर्जियां लेकर आया। कल्याण सिंह को शक हो गया। उन्होंने उनसे (द्विवेदी से) कहा,‘आज हम और तुम दुद्दै रुपया जाई पर नौछावरि करिंगे।’ दरअसल, उस समय कक्ष निरीक्षक को दो रुपया मिलता था। कल्याण का कहने का अर्थ यह था कि आज पूरे समय सिर्फ  इसी लड़के पर नजर रखनी है। वह  कक्ष में लगातार टहलते रहे, जिससे वह नकल नहीं कर पाया। शायद यही वजह रही कि उनके नेतृत्व में जब 1991 में भाजपा ने पहली बार सरकार बनाई तो उन्होंने शिक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ मिलकर नकल के खिलाफ  कड़ा कानून बनाया। इसे संज्ञेय अपराध घोषित कर दिया। इसके कारण नकल करने वाले छात्र-छात्राएं गिरफ्तार भी हुए। उन्हें और भाजपा को भी काफी आलोचना झेलनी पड़ी। दबाव पड़ा। पर, कल्याण ने कानून में बदलाव से इनकार कर दिया। कहा जाता है कि कल्याण की जिद का भाजपा को राजनीतिक नुकसान भी उठाना पड़ा लेकिन वह नहीं माने।
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मुलायम सिंह यादव के साथ कल्याण सिंह - फोटो : अमर उजाला
दुश्मन मुलायम दोस्त हुए : अब बात 21 जनवरी 2009 की। यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके बाद कल्याण उस रूप में दिखे, जिस रूप में वह पहली बार भाजपा छोड़ने के दौरान 1999-2000 में भी नहीं दिखे थे। कल्याण भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से त्यागपत्र देकर सुबह ही दिल्ली से लौटे थे। पूर्वाह्न 11 बजे कल्याण के बंगले के बाहर अचानक शोर फैला कि सपा मुखिया पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव अपने दोस्त अमर सिंह के साथ आ रहे हैं। चौंकना स्वाभाविक था क्योंकि यह कुछ वैसी ही खबर थी जैसे कोई कहे कि नदी के दो किनारे मिलने जा रहे हैं। कल्याण मुलायम को हिंदुत्व व हिंदू विरोधी, हिंदुओं की कीमत पर मुसलमानों का समर्थक मानते थे। उधर, मुलायम के मुंह से भी एक बार नहीं बल्कि दसियों बार कल्याण को लेकर निकली सांप्रदायिक नेता व मुसलमानों के दुश्मन की उपाधि सार्वजनिक हो चुकी थी। पर, राजनीति में कुछ भी संभव है। वैसे भी मुलायम की 2003 से 2007 तक चली सरकार में कल्याण के पुत्र राजवीर और कुसुम राय कैबिनेट मंत्री रह चुके थे।
मुलायम गले मिले अमर ने पैर छुए : बहरहाल 11 बजे के आसपास मुलायम अमर के साथ कल्याण के बंगले पर पहुंचे। गाड़ियां अंदर गईं। फिर अमर व मुलायम अंदर गए। अमर सिंह ने कल्याण के पैर छुए। मुलायम गले मिले और बुके दिया। कल्याण ने राजवीर का हाथ मुलायम को देते हुए घोषणा की कि वह सपा को मजबूत करने के लिए लोकसभा चुनाव में उनके प्रत्याशियों का प्रचार करेंगे। पुत्र राजवीर को इसलिए दे रहे हैं कि वह मुलायम के नेतृत्व में काम करे और उनकी (कल्याण) गलतियों का सुधार करें। मुलायम व अमर अपने साथ राजवीर को लेकर सपा मुख्यालय लौटे और कल्याण के पुत्र को उसी दिन सपा में राष्ट्रीय पदाधिकारी बना दिया गया। हालांकि इस बार कुसुम राय ने कल्याण से दूरी बना ली और वह भाजपा में ही रहीं।
सपा से भी टूटा नाता : कल्याण ने घूम-घूमकर भाजपा के विरोध में वोट मांगे। वह एटा से निर्दलीय लड़कर जीते। उनके कुछ समर्थक सपा के टिकट पर चुनाव लड़े और जीते। इस बीच सपा में विवाद शुरू हो गया। फिरोजाबाद लोकसभा सीट के चुनाव में सपा हार गई। मुलायम ने बयान दिया कि कल्याण के कारण उन्हें मुस्लिम वोटों का नुकसान हुआ है। कल्याण का अक्खड़ स्वभाव फिर जागा और उन्होंने मुलायम से रिश्ते तोड़ने का एलान करते हुए ‘जन क्रांति पार्टी’ नाम से नया दल बना लिया। वह उसके संरक्षक बने। पर, धीरे-धीरे उनके दिल में हिंदुत्व, और मंदिर को लेकर भाजपा के प्रति प्रेम फिर उमड़ने लगा। 2013 में वह फिर भाजपा में आ गए।
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