तारीख 21 जनवरी 2009। लखनऊ स्थित माल एवेन्यू का 2 नंबर बंगला। कल्याण सिंह बोल रहे थे, ‘भाजपा में वापस जाना मेरी भारी भूल थी। मुझे इस पर भारी पश्चाताप है। मुझे राम मंदिर पर अपनी भूमिका के लिए अफसोस है। इस बार मैंने हमेशा-हमेशा के लिए भाजपा से नाता तोड़ दिया है। अब इस जन्म तो क्या, सात जन्मों तक भाजपा में नहीं जाऊंगा। मेरी लाश भी वहां नहीं जाएगी। मैंने जिन हाथों से भाजपा को बनाया है, उन्हीं हाथों से उसे जमीन में गहरा गड्ढा खोदकर दफन कर दूंगा।’
ये वही कल्याण सिंह थे जो भाजपा के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे... जिन्होंने प्रदेश भाजपा को बनाया ही नहीं, बल्कि बढ़ाने में पूरी ताकत लगाई... जो भाजपा व हिंदुत्व की राजनीति के पर्याय माने जाते थे... जिन्होंने 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में ढांचा ध्वंस के बाद राज्यपाल को त्यागपत्र सौंपने के बाद कहा था, उस जीर्ण-शीर्ण इमारत को बचाने के लिए मैं कारसेवकों पर गोली नहीं चलवा सकता था। मुझे ढांचा ढह जाने पर कोई अफसोस नहीं है। जहां तक सरकार का सवाल है, तो एक क्या सैकड़ों सरकारें राममंदिर पर न्योछावर हैं...।
ये वही कल्याण थे जिन्होंने ढांचा ढहने और सरकार जाने के बाद देश के कई हिस्सों में जनादेश यात्रा निकालकर रामलला की खातिर हजारों सत्ताओं को ठोकर मारने की हुंकार भरी थी। सर्वोच्च न्यायालय में दिए गए शपथ पत्र के अनुसार ढांचा न बचा पाने पर न्यायालय की अवमानना का मामला चलने व सजा मिलने के सवाल पर बोले थे, ‘रामलला के मंदिर की खातिर एक जन्म नहीं, जन्मों तक सजा भुगतने को तैयार हूं’। उन्होंने 1991 में प्रदेश में सरकार बनने के बाद पूरी कैबिनेट के साथ अयोध्या जाकर रामलला के जन्मस्थल पर भव्य राम मंदिर निर्माण की सौगंध खाई थी।
ये वही कल्याण थे जो एक बार पहले भी भाजपा छोड़ चुके थे। जिनके कारण 2002 के चुनाव में भाजपा को बड़ा राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा था, लेकिन 2004 में भाजपा में लौटने पर फिर कभी पार्टी न छोड़ने की घोषणा की थी। हालांकि 2009 में फिर ऐसा कुछ हुआ कि उन्होंने पार्टी छोड़ दी। पर, 2013 आते-आते 2009 की कसमें भूल फिर भाजपा में लौटे। जिसे दफनाने की बात करते थे, उसे दमकाने, चमकाने और सत्ता दिलाने के लिए मोदी के साथ प्रदेश भर में घूमे। जिसकी कहानी आगे। बहरहाल, भाजपा के उत्थान, पतन और पुनरुत्थान के सूत्रधार कल्याण की कहानी काफी उतार-चढ़ाव व मोड़ों से गुजरती है। वह ऐसे नेता रहे जो जब भाजपा के साथ रहे तो वह बढ़ी, लेकिन जब वह हटे तो यह पार्टी भी घट गई।
मुख्य सियासी किरदार
अलीगढ़ की अतरौली तहसील के मढ़ौली गांव के चौधरी तेजपाल और माता सीता देवी के पुत्र जो आगे चलकर शिक्षक भी हुए, उन कल्याण के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बनने से लेकर, शिक्षक, सियासी किरदार, जनसंघ व भाजपा नेता, मंत्री, मुख्यमंत्री और फिर राज्यपाल बनने की कहानी में कई पड़ाव हैं। तरह-तरह के रंग हैं और पात्रों के अलग-अलग ढंग हैं। यह कहानी सिर्फ कल्याण पर नहीं घूमती है बल्कि राम जन्मभूमि आंदोलन और 90 की कारसेवा के बाद देश व प्रदेश की राजनीति में आए बदलावों को भी बताती हुई चलती है। यही वह वजह भी है कि प्रदेश ही नहीं देश के राजनीतिक इतिहास में कल्याण अपनी भूमिका से एक ऐसी जगह बना लेते हैं, जिनकी चर्चा किए बिना देश व प्रदेश के राजनीतिक इतिहास पर चर्चा पूरी ही नहीं हो सकती। सिलसिलेवार नजर डालते हैं कल्याण के किरदार की महत्ता की कहानी पर...