अगर रेल की बोगी में कोई खराबी है। कोई पुर्जा गिर गया है या टूट चुका है तो बेल्जियम की ‘कोसामीरा’ मशीन तत्काल रेलवे को सूचित कर देगी जिससे लोको पायलट ट्रेन रोक देगा और हादसे से बचा जा सकेगा। इसकी जानकारी इनो रेल के आयोजन के पहले दिन एक स्टाल पर मिली। आरडीएसओ स्टेडियम में बृहस्पतिवार को इनो रेल की शुरुआत हो गई। इस तीन दिवसीय प्रदर्शनी में दुनियाभर के 120 उद्यमी शामिल हो रहे हैं। प्रदर्शनी का उद्घाटन महानिदेशक वीरेंद्र कुमार ने किया।
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इनोरेल प्रदर्शनी
- फोटो : amar ujala
इनो रेल में लगे स्टॉल पर कोसामीरा के बारे में बताया गया कि इसे बोगियों के नीचे लगाया जाता है। यह एक कॉम्पैक्ट डिवाइस है। जो कंपन के आधार पर खराबी को पकड़ती है। मसलन, एक्सेल, गियर बॉक्स वगैरह टूटने व खराबी आने पर वाइब्रेशन चेंज होगा, जिससे जानकारी मिल जाएगी। यह डिवाइस, कंट्रोल रूम को वायरलेस सिस्टम से जानकारी देगा, जहां से लोको पायलट को सूचना मिलेगी। जल्द ही इसका इस्तेमाल भारतीय रेल में होने के आसार हैं।
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देश-विदेश की बेहतरीन टेक्नोलॉजी से सजी इस प्रदर्शनी में जर्मनी मुख्य भूमिका में है, जबकि जापान, चीन, चेक रिपब्लिक, ऑस्ट्रिया सहित कुल 14 देशों की रेलवे से जुड़ी तकनीकियों का प्रदर्शन हो रहा है। इसमें इलेक्ट्रॉनिक सिग्नलिंग, ट्रैक, हाईस्पीड ट्रांसपोर्ट, मॉडर्न बोगियां और रेलवे को अत्याधुनिक बनाने वाली तकनीकियों से रूबरू होने का मौका मिलेगा। प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य नॉलेज शेयरिंग, अत्याधुनिक तकनीकी का प्रदर्शन, मैनुफैक्चरिंग को बढ़ावा देना आदि है। वहीं शुक्रवार को इनो रेल के तहत उत्कृष्ट तकनीकी व बिजनेस अपॉरच्युनिटी इन रेलवे जैसे विषयों पर सेमिनार होंगे।
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फिंगरप्रिंट से खुलेगा रिवॉल्वर का होल्स्टर
आरपीएफ, जीआरपी व पुलिस की रिवॉल्वर व पिस्टल छीने जाने की कई खबरें आ चुकी हैं। ऐसे में डिफेंस फील्ड गन फैक्टरी के साथ मिलकर जर्मनी की कंपनी ने स्मार्ट होल्स्टर बनाए हैं। दरअसल, इस होल्स्टर में रिवॉल्वर फिट होने के बाद जब उसे निकालना होगा तो फिंगर प्रिंट यानी बायोमीट्रिक सिस्टम से ही होल्स्टर खुलेगा। यह स्मार्ट होल्स्टर आरपीएफ को भी मिलेगा।
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एलएचबी बोगियों की जांच होगी आसान
हेल्को की ओर से इनो रेल में लगाए गए स्टॉल पर वह तकनीक उपलब्ध है, जिससे लिंक हॉफमैन बुश (एलएचबी) बोगियों की टेस्टिंग देश में ही हो सकेगी। हेल्को के अधिकारियों ने बताया कि सालाना चार हजार से अधिक एलएचबी बोगियां बनाई जा रही हैं। उनकी रबड़ पैड टेस्टिंग, बोगी टेस्टिंग वगैरह की मशीनें हेल्को बना रही है, जिससे आसानी से इन बोगियों की टेस्टिंग देश में ही हो सकेगी।
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जापान की ये ट्रेनें करती हैं हवा से बातें
इनो रेल में ईस्ट जापान रेलवे कंपनी की ओर से हाईस्पीड ट्रेनें दर्शकों के लिए खासी आकर्षण का विषय बनी रहीं। मसलन, ई-7 ट्रेन की स्पीड जहां 260 किमी. प्रति घंटा है। इसमें 12 बोगियां लगती हैं और 934 सीटें होती हैं। वहीं ई-6 की रफ्तार 320 किमी प्रति घंटा है। इसमें सात बोगियां और 338 सीटें होती हैं। जबकि ई-5 की रफ्तार भी 320 किमी प्रति घंटा है। दस बोगियां हैं और 731 सीटें हैं। इन ट्रेनों में ऐराडायनेमिक नोज है और कम आवाज करती हैं।
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बढ़ने वाले ट्रैफिक से निपटने की तैयारी
सेफ्टी, सिक्योरिटी, यात्रियों की सुविधाएं और पंक्चुएलिटी...ये रेलवे के कोर इश्यू हैं। जिस पर भारतीय रेल बेहतर काम कर रही है। आने वाले 12 वर्षों में 40 करोड़ आबादी शहरों में होगी। ऐसे में यातायात के सबसे बड़े साधन रेलवे पर लोड बढ़ेगा। इससे पहले रेलवे को भी तैयार होना पड़ेगा। यह कहना है आरडीएसओ के महानिदेशक वीरेंद्र कुमार का। उन्होंने कहा कि नई तकनीकियों को जोड़ने और बिजनेस को बढ़ाने में इनो रेल बहुत ही सहायक साबित होगी। रेलवे में बिजनेस की अपार संभावनाएं हैं। 120 से अधिक 14 देशों की निजी कंपनियां तकनीकी को लेकर सामने आई हैं, जो एक-दूसरे से साझा की जा रही हैं। इनो रेल प्रदर्शनी का यह तीसरा आयोजन है। जिससे निवेशकों को भी खासा फायदा मिलेगा। सुरक्षा, संरक्षा, आधारभूत ढांचे, ट्रेन संचालन आदि में निवेश होने से रेलवे की तरक्की होगी। जर्मनी और ऑस्ट्रिया की तरह ही ट्रेनों की ऑनलाइन मॉनिटरिंग हो सके। ट्रैक, इंजन और बोगियों पर खड़ी रेल को मजबूती मिलेगी।
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ऑटोमेटिक ट्रेन प्रोटेक्शन सिस्टम रोकेगा हादसे
क्योसन कंपनी ने रेल हादसे रोकने के लिए ऑटोमेटिक ट्रेन प्रोटेक्शन सिस्टम बनाया है। जो सिग्नल की वजह से होने वाले हादसों को रोकेगा। यह डिवाइस पटरियों पर सिग्नल से पंद्रह मीटर व सात सौ मीटर की दूरी पर लगती है। रेल फ्रैक्चर सहित ट्रैक पर कोई जानवर या अन्य समस्या होने पर तत्काल कंट्रोल रूम व लोको पायलट को जानकारी मिल जाएगी।। प्रति किलोमीटर डिवाइस लगाने का खर्च 11.88 लाक रुपये आएगा जबकि करीब साढ़े पांच करोड़ रुपये से 45 किलोमीटर सेक्शन पर लगाकर जांच की जा रही है।
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मेट्रो ‘ओएचई’ के लिए अब नहीं काटने होंगे पेड़
पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने व लागत को कम करने के उद्देश्य से रेहल कंपनी की ओर से ऐसी तकनीक विकसित की गई है, जिससे मेट्रो को बिजली सप्लाई वाली हाईटेंशन लाइन यानी ओएचई को ट्रैक के समानांतर बिछाया जा सकेगा। यह तकनीक बंगलूरू व कोच्चि मेट्रो में इस्तेमाल भी हो रही है। इसे थर्ड रेल सिस्टम कहा जाता है। इसकी लागत कम आती है, पेड़ों की कटाई नहीं करनी पड़ती और मेंटेनेंस कॉस्ट भी बहुत कम है। आगरा व कानपुर मेट्रो में इसका इस्तेमाल हो रहा है।
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हथौड़े से नहीं खुलेंगी ये पेंड्रोल क्लिपें
पिछले वर्ष डालीगंज से बादशाहनगर रेलखंड पर शातिरों ने पेंड्रोल क्लिपों को खोल दिया था, जिससे ट्रेन हादसा हो सकता था। लेकिन अब ऐसी पेंड्रोल क्लिपें विकसित कर ली गई हैं, जिन्हें हथौड़े से नहीं खोला जा सकेगा। आरडीएसओ ने इन्हें अप्रूव कर दिया है।
ट्रैक की रखवाली करेगा ये ड्रोन
करीब दस किलो वजन का ड्रोन इनो रेल प्रदर्शनी में मौजूद है, जो ट्रैक की रखवाली करता है। इस ड्रोन की रेंज चार किलोमीटर है। जो ट्रेन केसंचालन से पहले ट्रैक की पड़ताल करेगा। मसलन, ट्रैक के फ्रैक्चर होने या अन्य दिक्कतों की स्थिति में यह ड्रोन तत्काल कंट्रोल रूम को सूचित करेगा।