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1885 में कोर्ट पहुंचा था अयोध्या मामला, देखें- तब से लेकर किन हालातों से गुजर चुकी है राम की नगरी

Tue, 05 Dec 2017 08:14 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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अयोध्या मामला 1885 में अदालत में पहुंचा। तब से लेकर इस मुद्दे को सुलझाने के लिए कई तरह की कोशिशें हो चुकी हैं। अब जब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हो चुकी है। ऐसे में देखें, अब तक किन हालातों से गुजर चुकी है अयोध्या-

1885 से अब तक 132 साल हो चुके हैं। लगातार अदालती प्रक्रिया की बात करें तो भी लगभग 67 साल हो गए हैं। इस दौरान कई बार सुलह-समझौते की कोशिश हुई। कभी सरकार आगे आई तो कभी किसी और ने यह प्रयत्न किया। हर बार कोई न कोई बाधा इस राह में खड़ी हो जाती है। कभी कोई ऐन मौके पर कन्नी काट गया तो कभी किसी संगठन ने इन कोशिशों में लंगड़ी मार दी। अब देखने वाली बात यही है कि सर्वोच्च न्यायालय का फैसला क्या आता है।
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132 साल बाद भी अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि स्‍थल बनाम बाबरी मस्जिद विवाद का सर्वमान्य हल नहीं निकल पाया। कभी सुलह की बात हुई तो कभी न्यायालय के निर्णय मानने की बात सामने आई। किसी ने कहा कि आस्‍था का सवाल अदालत से नहीं तय हो सकता। कोई बोला कि अदालत यह तय नहीं कर सकती कि भगवान राम का जन्म अमुक स्‍थल पर हुआ था या नहीं। इतने सालों में तमाम मोड़ आए।

सौ साल का ही कालखंड कोई कम नहीं होता पर, यहां तो 132 साल हो चुके हैं। इतने वक्त में भी अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि स्थल बनाम बाबरी मस्जिद विवाद का सर्वमान्य हल नहीं निकल पाया।

देश की शीर्ष अदालत मंगलवार से इस संवेदनशील मामले की प्रतिदिन सुनवाई शुरू करने जा रही है। देखना होगा कि सर्वोच्च अदालत के फैसले के बाद विवाद के समाधान की प्रतीक्षा खत्म होती है या और परीक्षा देनी पड़ेगी।
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संघर्ष, समझौता और संसद से कानून बनाकर इस विवाद के हल की बातें उठी। सात साल पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने इस मामले में एक फैसला दिया। उम्मीद थी कि पक्षकार इसे मान लेंगे और विवाद का समाधान हो जाएगा। पर, कुछ लोगों ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी।

अब यहां यह भी बता दें कि देश की सर्वोच्च अदालत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जेएस खेहर ने इसी वर्ष मार्च में पक्षकारों को सुझाव दिया था कि वे इस मामले को बातचीत से इस मामले को सुलझाने का प्रयास करें। वह अदालत से बाहर खुद भी मध्यस्थता को तैयार हैं। तब से अब तक कई बार सुलह और समझौते की बातें आगे की गईं। कुछ लोगों ने प्रयास भी किए।

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श्रीश्री रविशंकर ने भी पिछले दिनों पक्षकारों में से कई लोगों से मिलकर इसे आगे बढ़ाने की कोशिश की। पर, इस मामले में शामिल कई पक्षकारों ने रुचि नहीं दिखाई। पक्षकारों ने यह भी कहा कि विवाद को सवा सौ साल से ऊपर हो गए। इस दौरान कई बार सुलह-समझौते से मामले को हल करने की कोशिश हुई। पर बात नहीं बनी। जब अब तक सर्वमान्य समाधान नहीं तलाशा जा सका तो अब कैसे संभव है। उधर, विश्व हिंदू परिषद की तरफ से लगातार कहा गया कि इस विवाद का एकमात्र समाधान संबंधित स्थल पर भव्य राम मंदिर का निर्माण ही है। (अयोध्या में श्री श्री रविशंकर)
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तब सन्नाटे में डूब गई थी अयोध्या
पहले विवादित स्‍थल का ताला खुलवाने के लिए रथ यात्राएं निकलीं। आस्‍था बनाम कानून की रक्षा के नाम पर कई टकराव हुए। वर्ष 90 के अक्टूबर में एक वक्त ऐसा भी आया जब प्रदेश ही नहीं देश के कई अन्य राज्यों में भी अयोध्या के चलते कफर्यू लगा। जगह-जगह आस्‍था के नाम पर अयोध्या जाने पर अड़े कार सेवकों और कानून की रक्षा के नाम पर तैनात सुरक्षा कर्मियों के बीच संघर्ष हुए। अयोध्या तो कई दिन सन्नाटे में डूबी रही। कई जगह लाठी-गोली भी चली। अयोध्या के मंदिरों में कई दिनों तक सन्नाटा छाया रहा। कई लोग मारे गए। किसी घर में उसी की जिंदगी चली गई जिसके कमाने से बाकी की जिंदगी चल रही थी। जिले की अदालतों से लेकर उच्च न्यायालय और देश की सुप्रीम कोर्ट तक को कई बार अलग-अलग तरह से हस्तक्षेत्र करना पड़ा। एक पक्ष ने कोर्ट से निर्णय की बात मानने की घोषणा की तो दूसरा बोला आस्‍था का फैसला न्यायालय से नहीं हो सकता। फिर भी यह मामला न्यायालय में चलता रहा। कई तरह के फैसले हुए राज्य की सरकार ने विवादित ढांचे की सुरक्षा का कोर्ट को वचन दिया, पर ढाचा नहीं बचा।
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हाईकोर्ट ने इस तरह किया था बंटवारा
रामलला विराजमान: रामलला जहां विराजमान हैं, वहीं रहेंगे। जहां रामलला की पूजा-अर्चना हो रही है, वह स्थल जन्मभूमि है। रामलला को एक तिहाई भूमि मिलेगी।

निर्मोही अखाड़ा: राम चबूतरा और सीता रसोई निर्मोही अखाड़ा की होगी। इस अखाड़े को भी जमीन का एक तिहाई हिस्सा दिया जाएगा।

सुन्नी वक्फ बोर्ड: सुन्नी वक्फ बोर्ड को भी एक तिहाई जमीन मिलेगी। कोर्ट ने यह मत देते हुए बोर्ड को पूरी भूमि पर मालिकाना हक देने की अपील खारिज कर दी कि जब मूर्तियां 1949 में रखी गईं तो उन्होंने वाद दायर नहीं किया था।
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पहला मुकदमा और निर्णय
वर्ष 1985 में अयोध्या के संत महंत रघुबर दास ने संबंधित स्थल को श्री राम का जन्मस्थान और खुद को वहां का महंत बताते हुए अदालत में मुकदमा दायर किया। मुकदमे में सुन्नी वक्फ बोर्ड के सेक्रेटरी और मुतवल्ली मोहम्मद असगर को पार्टी बनाया। उन्होंने कहा कि चबूतरे पर कोई इमारत नहीं है। वहां रहने वालों को सर्दी, गर्मी और बरसात में परेशानी का सामना करना पड़ता है। इसीलिए मंदिर बनाने की इजाजत दे दी जाए। फैजाबाद के तत्कालीन सब जज पं. हरिकिशन ने मुकदमा खारिज कर दिया। कहा कि पूजा हो रही है। विवादित स्थल पर बाबरी मस्जिद और चबूतरे के बीच दीवार है। यह दीवार हिंदू और मुसलमानों के झगड़े में बनवाई गई है ताकि टकराव न हो। हालांकि, चबूतरे से बाहर और चहारदीवारी के बाहर जमीन हिंदुओं की है लेकिन मंदिर बनाने की इजाजत नहीं दी जा सकती क्योंकि मंदिर में घंटे और शंख की आवाज गूंजेगी और दोनों समुदाय के लोग एक रास्ते से आएंगे-जाएंगे, जिससे झगड़ा बढ़ेगा।
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