इसे कुदरत का करिश्मा कहे या प्रदूषण की मार या फिर रसायनों का प्रभाव, लेकिन जो कुछ भी है आश्चर्यचकित करने वाला है। बीकेटी के मवई कलां व कई गांवों में जनवरी की पहले सप्ताह में ही आम के पेड़ बौर से लद गए है। जबकि आम के पेड़ों में बौर लगने का समय फरवरी के अंतिम सप्ताह या मार्च का पहला सप्ताह होता है।
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आम के पेड़ों पर आए बौर
- फोटो : amar ujala
ऐसे में ग्रामीण आश्चर्य चकित है जबकि वन विभाग व उद्यान विभाग के अधिकारी इसे अजूबा मान रहे है। राजधानी के बीकेटी क्षेत्र के गांव मवई कलां में स्थित कई आम की बागों में दो दर्जन से अधिक आम के पेड़ जनवरी के पहले सप्ताह में ही बौर से लद गए है। इन पेड़ों का बौर कई दिनों पुराना हो चुका है। कई पेड़ों में तो छोटी-छोटी फलवार भी शुरू हो गई है। यही स्थित बीकेटी के गांव कठवारा, पहाडपुर, संसारपुर, अस्ती, भैसामउ, भौली, देवरी रूखारा और इटौंजा के अरंबा, करौदी, बगहा, अटेसुआ सहित कई गांवों में स्थित आम के पेड़ों की भी है।
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आम के पेड़ों पर आए बौर
- फोटो : amar ujala
जनवरी के पहले सप्ताह में आम के पेड़ों में बौर आने से किसान आश्चर्यचकित है। किसानों ने बताया कि आम के पेड़ों में बीकेटी व इटौंजा में अब तक फरवरी के अंतिम व मार्च के पहले सप्ताह में बौर आता है, लेकिन इस बार जनवरी के पहले सप्ताह में आम के पेड़ों में पहली बार बौर देखने को मिल रहा है। आम के जिन पेड़ों में बौर आया है उनमें कई पेड़ कलमी व कई पेड़ देशी है।किसानों ने बताया कि आम के पेड़ों में जनवरी के पहले सप्ताह में बौर आने का कारण आम के पेड़ों पर विभिन्न प्रकार के रसायनों के छिडकाव का प्रभाव, लगातार क्षेत्र में बढ़ता प्रदूषण हो सकता है।
कई किसान तो इसे कुदरत का करिश्मा भी बता रहे है। इस मामले में बीकेटी वन विभाग के रेंजर एसपी सिंह का कहना है कि जनवरी की पहले सप्ताह में आम के पेड़ों में बौर आना आश्चर्यजनक है। वह टीम को ले जाकर सोमवार को स्थलीय निरीक्षण करेगें। उनका कहना है कि आम के पेड़ों में अब तक बीकेटी व इटौंजा में फरवरी माह के अंत व मार्च की शुरुआत में बौर आता रहा है। वहीं, इस मामले में बीकेटी उद्यान विभाग के प्रभारी जय करन सिंह का कहना है कि जनवरी के पहले सप्ताह में आम के पेड़ों में बौर आने का मामला प्रदूषण का प्रभाव हो सकता है। इसकी विशेषज्ञाें से जांच कराने की जरूरत है।