कोरोना वार्ड में ड्यूटी के दौरान डॉक्टरों को अपनी सांस रोक कर मरीजों की सांस पर नजर रखनी होती है। कई बार ऑक्सीजन कम मिलने से कुछ डॉक्टर बेचैन हो जाते हैं तो कुछ गश खाकर गिर भी पड़ते हैं। यदि किट की गुणवत्ता में कमी हुई तो डॉक्टर के साथ उनके संपर्क में आने वाले दूसरे लोगों में भी खतरा बढ़ जाता है। ड्यूटी खत्म करने के बाद किसी के चेहरे पर सूजन दिखती है तो किसी की नाक कटी नजर आती है। यह लगातार मास्क लगाए रहने से होता है। इसके बाद भी डॉक्टरों का जज्बा बरकरार है। पेश हैं कोरोना वार्ड में ड्यूटी करने वाले डॉक्टरों से बातचीत के प्रमुख अंश...।
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- फोटो : amar ujala
मरीज की नब्ज टटोलने में भी होती है मुश्किल, वेंटिलेटर के मरीजों पर रखनी पड़ती है हमेशा नजर
केजीएमयू के डॉ. दर्शन बजाज कोरोना वार्ड में ड्यूटी कर चुके हैं। वह कहते हैं कि वार्ड ड्यूटी के दौरान अपनी टीम को उत्साहित रखना और मरीजों की सांस पर नजर रखना सबसे बड़ी चुनौती होती है। किट पहनने के बाद मरीज की नब्ज टटोलने में मुश्किल होती है तो कई बार यह भी नहीं पता चलता कि वेंटिलेटर पर पड़े मरीज की सांसें चल रही हैं या नहीं। ऐसे में वेंटिलेटर वाले मरीजों पर खासतौर से पल-पल की नजर रखनी पड़ती है।
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चेहरा हो जाता है लाल... घाव से होता है दर्द
पीजीआई के कोरोना वार्ड में ड्यूटी कर चुके डॉ. आकाश माथुर बताते हैं कि पीपीई को पहनने में करीब 40 मिनट लगते हैं और इतना ही उसे उतारने में। चेहरे का अन्य कोई हिस्सा यदि बिना ढके छूट जाए तो उसे भी एक तरह की पट्टी टुकड़ा लगा चेहरे पर माइक्रोपोर (टेप) के माध्यम से चिपका दिया जाता है। सबसे अंत में पीपीई का हुड (टोपी) पहन अंत में पूर्ण सुरक्षा के लिए पूरे चेहरे को टेप से ढका जाता है ताकि कोई भी हिस्सा खुला ना रहे। आठ घंटे की ड्यूटी खत्म होने के बाद पूरा चेहरा लाल हो जाता है। साथ ही बने यह घाव काफी जलन का अनुभव कराते हैं। चश्मा लगाने से कुछ ही देर में फॉग के कारण देखने में दिक्कत होने लगती है।
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हर मरीज का रखना पड़ता है ब्योरा
केजीएमयू के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के डॉ. आनंद श्रीवास्तव बताते हैं कोरोना वार्ड में ड्यूटी करने के दौरान कई तरह की चुनौतियां होती हैं। यहां हर मरीज की स्थिति अलग-अलग होती है। कोई डायबिटीज का पेशेंट होता है तो कोई कैंसर का मरीज। ऐसे में उनकी दवाओं का विशेष तौर पर ख्याल रखना पड़ता है। नर्सिंग स्टाफ से लेकर रेजिडेंट डॉक्टर कब-कब मरीज के पास पहुंचे और प्रोटोकॉल का कितना पालन किया गया, टीम लीडर के नाते इस पर फोकस करना जरूरी होता है।
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चिड़िया की आंख पर निशाना लगाने जैसी स्थिति
गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी के डॉ. अनिल गंगवार बताते हैं कि ड्रेस पहनने के बाद सांस चेहरे व आंख पर लगे मास्क में फॉग बनाती रहती है। ऐसे में मरीज की फाइल में नोट्स डालना, जांच के लिए खून के नमूने निकालना, बेहोश मरीजों में नाक एवं पेशाब की नली डालना, डायलिसिस के लिए लाइन डालना तथा जरूरत पड़ने पर सांस में तकलीफ हो तो सांस की नली डालना चिड़िया की आंख पर निशाना लगाने जैसा होता है। ड्यूटी के दौरान एक गंभीर मरीज को सांस की नली लगाते वक्त खुद असहज जैसी स्थिति हो गई, क्योंकि ऑक्सीजन मिल नहीं पाती। सांस छोड़ते समय जो कार्बन डाईऑक्साइड निकालते हैं उसे फिर से वापस लेना पड़ता है।
हर कदम पर दिखती है चुनौती
कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. उमेश त्रिपाठी कहते हैं कि कोरोना वार्ड में ड्यूटी करने में हर कदम पर चुनौती है। बताया कि जिस वक्त ड्यूटी पर जाने का आदेश मिला उस समय वह अपने पिता की सेवा में लगे थे। दो माह पहले बाईपास सर्जरी कराने वाले पिता को जब ड्यूटी कॉल की जानकारी मिली तो उन्होंने तत्काल जाने का आदेश दिया। न चाहते हुए भी ड्यूटी करने लगा। ड्यूटी के दौरान कई बार तो चश्मे पर इतना फॉग हो जाता है कि सामने कुछ नहीं दिखता। ऐसे में टॉर्च लेकर बहुत करीब जाकर देखना पड़ता है।