कोरोना की दूसरी लहर में संक्रमितों की जान बचाते हमारे फ्रंटलाइन वर्कर डॉक्टर, स्वास्थ्यकर्मी खुद संक्रमित हो गए। इतना ही नहीं चारों तरफ सांस बचाने के लिए मची चीत्कार, गंभीर होते मरीज, लगातार होती मौतों ने इन्हें भी झकझोर कर रख दिया। रातों की नींद इन्होंने भी खोई और घबराहट, बेचैनी, तनाव ने भी इन्हें घेरा, इसके बावजूद ये बहादुर योद्धा की तरह डटे रहे और मरीजों की सांस बचाने के लिए लड़ते रहे।
कोरोना से जारी जंग के दौरान धीमी पड़ती संक्रमण की रफ्तार के बीच इन्होंने अनिद्रा, तनाव और अपराधबोध का इलाज करवाना शुरू कर दिया है। कुछ को तो ड्यूटी के दौरान काउंसलिंग व दवा की जरूरत पड़ गई थी। इन हालात को देखते हुए केजीएमयू के मानसिक रोग विभाग ने साथी डॉक्टरों व अन्य स्वास्थ्यकर्मियों के लिए मानसिक स्वास्थ्य संरक्षण कार्यक्रम शुरू किया है। विभागाध्यक्ष डॉ. विवेक अग्रवाल ने बताया कि हर शनिवार वर्कशाप होगी।
कानों में गूंज रहा आईसीयू का अलार्म
बलरामपुर कोविड अस्पताल में ड्यूटी करने वाले एक चिकित्सक कहते हैं कि हमारा काम ही वहां से शुरू होता है, जब मरीज वेंटिलेटर पर आता है। मौतों का सिलसिला जारी था। शुरुआती 14 दिनों की ड्यूटी में नींद आंखों से दूर रही, कभी आंख लग भी गई तो वेंटिलेटर यूनिट की बीप और अलार्म कानों में गूंजते रहते थे। नींद की दवाई भी ली और दिक्कत बढ़ने पर अपने अस्पताल के ही मनोचिकित्सक से परामर्श लिया।