किसी लेखक या साहित्यकार को अगर ऐसा जीवनसाथी मिल जाए जो खुद भी उसी क्षेत्र से जुड़ा हो तो यह सोने पर सुहागा जैसी बात होती है। एक तरीके से देखा जाए तो ऐसे लेखकों या लेखिकाओं को उनके घर में ही पहला श्रोता, प्रशंसक या आलोचक मिल जाता है।
आज की कड़ी में हम आपको कुछ ऐसे ही विशेष दंपतियों से मिलवाने जा रहे हैं जो बराबर से एक-दूसरे के कंधे से कंधा मिलाकर अपने लेखन से हिंदी को समृद्ध करने में लगे हैं। साथ ही सभी ने मुक्तकंठ से ‘अमर उजाला’ के ‘हिंदी हैं हम’ अभियान की प्रशंसा करते हुए इसे हिंदी के उत्थान में मील का पत्थर बताया।
डॉ. नरेश कात्यायन के साहित्य पथ की सहधर्मिणी हैं पुष्पा मिश्रा
विश्व स्तर पर हिंदी कविता की वाचिक परंपरा को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कवि डॉ. नरेश कात्यायन खुद तो देश के प्रमुख साहित्यकारों में शामिल हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय हिंदी कविता समारोहों के आयोजनों से सैकड़ों रचनाकारों को मंच के साथ पहचान दी। उनकी कृति महात्मा जटायु का लोकार्पण पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था, जिसे उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने पुरस्कृत भी किया। वे अब तक आठ पुस्तकें लिख चुके हैं और आठ प्रकाशन के इंतजार में हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा से सेवानिवृत्त अंडर सेक्रेटरी डॉ. कात्यायन को जयशंकर प्रसाद सम्मान के अलावा राज्य कर्मचारी साहित्य परिषद, उत्तर प्रदेश शासन और साक्षरता मिशन समेत एक सैकड़ा से ज्यादा सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। वहीं, उनकी पत्नी पुष्पा मिश्रा भी लेखन में उनका बराबर साथ देती रही हैं। उनका काव्य संग्रह ‘साथ-साथ चलने दो’ प्रकाशित हो चुका है जबकि दो अन्य संग्रह प्रकाशित होने को हैं। कात्यायन दंपती का मानना है कि देश में एक भाषा न होने व उसे राष्ट्र भाषा का दर्जा न मिलने से ही लोगों के मस्तिष्क पर अंग्रेजी हावी है। कहा, बच्चों में अंग्रेजी को रोजगार की भाषा बता कर हिंदी का तिरस्कार जब तक बंद नहीं होगा, तब तक हिंदी का उत्थान संभव नहीं है।
विज्ञापन
3 of 5
आत्मप्रकाश व शोभा
- फोटो : amar ujala
युवा पीढ़ी में हिंदी के प्रति अनुराग जगा रहे आत्मप्रकाश व शोभा
यश भारती और संगीत नाटक अकादमी जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजे जा चुके दूरदर्शन लखनऊ के सहायक निदेशक आत्मप्रकाश मिश्र प्रसारण की दुनिया में 32 वर्षों से सक्रिय हैं। इस दौरान वंस मोर जैसे लोकप्रिय कार्यक्रमों के जरिये जहां उन्होंने देशभर से करीब 500 हिंदी रचनाकारों को मौका दिया तो वहीं शुद्ध हिंदी के उच्चारण से संचालन में आकर्षण पैदा करने के लिए भी जाने जाते हैं। वे सबसे कम आयु में प्रसार भारती के हिंदी के राष्ट्रीय कमेंटेटर बने और देश के चारों स्थानों पर होने वाले कुंभ, दिल्ली से गणतंत्र दिवस समेत गत बीस वर्षों से मथुरा से श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की कमेंट्री दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल पर कर रहे हैं। हिंदी पत्रकारिता के जनक बाबूराव विष्णु पराड़कर पर इनके द्वारा निर्देशित डॉक्यूमेंटरी मील का पत्थर साबित हुई। दूरदर्शन पर हिंदी कविता को लोकप्रिय बनाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। वहीं, उनकी पत्नी डॉ. शोभा मिश्र नवयुग कन्या महाविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर होने के साथ इतिहास की विभागाध्यक्ष भी हैं। साहित्य अनुरागी शोभा मिश्र अपने विद्यालय में हिंदी को प्रोत्साहित करने और हिंदी माध्यम में विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए जानी जाती हैं। शोभा अपनी छात्राओं में हिंदी साहित्य के प्रति अनुराग पैदा करने के लिए उन्हें समय-समय पर प्रतियोगिताओं के माध्यम से ना सिर्फ प्रोत्साहित करती है बल्कि अपने व्यक्तिगत संग्रह से पुस्तकें भी भेंट करती रहती हैं।
4 of 5
आलोक व सुधा
- फोटो : amar ujala
लेखन में आलोक को मिला सुधा का साथ
लखनऊ दूरदर्शन से कार्यक्रम अधिशासी के पद से सेवानिवृत्त आलोक शुक्ल गद्य और पद्य लेखन में भी सक्रिय रहे। उनका कविता संग्रह ‘सामान्य सा मैं’ प्रकाशित हो चुका है। उन्होंने अपने सेवाकाल के दौरान हिंदी को प्रोत्साहित करने के लिए सरस्वती जैसे लोकप्रिय कार्यक्रमों और कवि सम्मेलनों के प्रसारण में बतौर प्रोड्यूसर भूमिका निभाई। वहीं, दूसरी ओर उनकी पत्नी सुधा पहले पत्रकारिता और फिर साहित्य लेखन में सक्रिय रहीं। उनका काव्य संग्रह ‘सदियों से बैठी’ प्रकाशित हो चुका है। इसके अलावा ‘स्वतंत्रता के बाद हिंदी में महिला पत्रकारिता’ का भी प्रकाशन हुआ। दोनों ही हिंदी की सेवा में आज भी सक्रिय हैं।
विजय पंडित फिल्म व टीवी के क्षेत्र में सक्रिय तो मृदुला ने पुस्तकालयों को बनाया हिंदी का घर
हिंदी साहित्य और रंगकर्म के रास्ते मुंबई में फिल्म और टीवी धारावाहिकों के लेखन तक का सफर तय करने वाले विजय पंडित अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी खूब ख्याति अर्जित कर रहे हैं। उन्होंने कई हिंदी फिल्मों में लेखन किया, जिसमें से एक फिल्म की ऑस्कर व एक फिल्म की कांस फिल्म फेस्टिवल में प्रतिभागिता हमें हिंदी की वैश्विक उपस्थिति के प्रति आश्वस्त करती है। यह संयोग ही रहा कि करीब एक दर्जन से अधिक जिन धारावाहिकों का लेखन विजय पंडित ने किया, वे अधिकांश पौराणिक व ऐतिहासिक कथाओं पर आधारित थे, जिससे करोड़ों दर्शक शुद्ध हिंदी के प्रति आकर्षित हुए। रामायण, रावण, पृथ्वीराज चौहान, जय श्री कृष्ण, मीराबाई, संकटमोचन हनुमान, गणेश लीला, भारत के संत जैसे धारावाहिकों में उनका लेखन खूब सराहा गया। वहीं, उनकी पत्नी मृदुला पंडित लंबे समय से पुस्तकालय विभाग से जुड़ी रही हैं। हिंदी में पीएचडी मृदुला पंडित इस समय उन्नाव जिला पुस्तकालय की प्रभारी होने के साथ खुद भी लेखन में सक्रिय हैं। उनकी पुस्तक ‘बचे रहेंगे शब्द’ प्रकाशित हो चुकी है। वे बताती हैं कि पुस्तकालय एक ऐसी जगह होती है, जहां से ऐसे हिंदी प्रेमी भी ज्ञान अर्जित करते हैं जो ज्यादा पुस्तकें खरीद नहीं सकते। उन्होंने हिंदी के विकास के लिए पुस्तकालयों के विकास को आवश्यक बताया।