नवाबों के शहर लखनऊ में इस साल बकरीद ऐतिहासिक तरीके से मनाई गई। पहली बार यहां शिया और सुन्नी समुदाय ने एक साथ मिलकर नमाज पढ़ी।
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ऐतिहासिक रही लखनऊ की बकरीद, यहां देखें तस्वीरें
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सिब्तैनाबाद इमामबाड़े में सुबह शिया और सुन्नी कंधे से कंधा मिलाकर ईद-उल-अजहा की नमाज पढ़ी।
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ग्रुप के कन्वीनर हैदर बताते हैं कि ख्याल आया कि आज जब पूरी दुनिया एकता की बात कर रही है तो मुसलमान अलग-अलग फिरके के नाम पर क्यों एक-दूसरे के दुश्मन बने हैं।
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अपने दोस्त और ग्रुप कन्वीनर आतिफ से बात की तो उन्हें भी इस लड़ाई पर ऐतराज था।
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सिब्तैनाबाद इमामबाड़े के मुतवल्ली और ग्रुप कन्वीनर हैदर बताते हैं कि नमाज की जगह को लेकर शुरुआत में लोगों की राय जुदा थी, पर तय हुआ कि नवाब वाजिद अली शाह के वालिद अमजद अली शाह द्वारा बनवाया इमामबाड़ा इसके लिए सबसे मुनासिब जगह है।
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अमजद अली शाह की धर्म निरपेक्ष छवि के कारण लोग उन्हें ‘हजरत’ कह कर संबोधित करते थे। वहीं शहर के बीचोंबीच होने से लोगों को यहां आने में सहूलियत होगी।
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इसी वजह से इस ऐतिहासिक नमाज के लिए सिब्तेनाबाद इमामबाड़े को चुना गया।
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जज्बा-ए-कुर्बानी के साथ शुक्रवार को ईद-ए-कुर्बां पर लाखों नमाजियों के सिर सजदे में झुके।
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सजदे में हर नमाजी उस अजीम कुरबानी को याद किया, जो हजरत इब्राहिम ने अपने रब के लिए पेश की थी।
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बकरीद-उल-अजहा की नमाज के बाद मुसलमान कुर्बानी पेश की। नमाज को लेकर मस्जिदों में व्यवस्थाएं पुख्ता कर ली गई थी।
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नमाज के बाद कुर्बानी का दौर शुरू हुआ। ऐशबाग ईदगाह में शहर की सबसे बड़ी सुन्नी जमात ईद-उल-अजहा की नमाज अदा की।
इसी क्रम में शिया समुदाय की सबसे बड़ी जमात आसिफी मस्जिद में मौलाना डॉ. कल्बे सादिक की इमामत में ईद-उल-अजहा की नमाज अदा किया।
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टीले वाली मस्जिद में सुबह 9 बजे मस्जिद के इमाम मौलाना फजलुर्रहमान वायजी नदवी ईद-ए-कुर्बां की नमाज अदा कराई गई।
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नमाज को लेकर मस्जिदों में तैयारियां पूरी थी। नमाज तय समयानुसार अदा कराई गई।
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इसको लेकर जिला प्रशासन ने मस्जिदों के आस-पास सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए गए थे।
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ईद-उल-अजहा उस अजीम कुरबानी की याद दिलाती है जो ईश्वर प्रेम और आज्ञा का प्रतीक है।
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हजरत इब्राहिम जो मुस्लिम समाज में अल्लाह के पैगंबर (संदेश वाहक) हैं, अपने बेटे हजरत इस्माइल को अल्लाह का संदेश सुनाते हैं कि अल्लाह फरमाते हैं, हमारी राह में अपना सबसे करीबी और प्रिय चीज कुरबान कर दो।
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इस पर हजरत इस्माइल ने सहमति दे दी। हजरत इब्राहिम अपने सबसे प्रिय बेटे हजरत इस्माइल की कुर्बानी देने मिना की पहाड़ी पर पहुंच ग
एक चट्टान पर लिटाया और अपनी आंख पर पट्टी बांध ली। उन्होंने कुरबानी का प्रयास किया, लेकिन परवरदिगार ने उनकी इस बंदगी कुबूल कर उनके बेटे को महफूज करते हुए हजरत इस्माइल की जगह एक दुम्बे की कुरबानी कुबूल की। इसी जज्बे की याद में आज भी मुसलमान कुरबानी कर इस अजीम कुर्बानी को याद करते हैं।