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ना शाकाहार ना मांसाहार, इस डाइट का बढ़ा चलन, पुरुषों की तुलना में क्यों तेजी से अपना रही महिलाएं?

Fri, 28 Feb 2020 01:13 PM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
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Vegun Diet - फोटो : Social Media
खाने की आदतों की बुनियाद पर लोग दो तरह के होते हैं, शाकाहारी और मांसाहारी, लेकिन आजकल एक नया शब्द काफी चलन में है 'वीगन'। वेगन आहार में पूर्ण रूप से केवल फल और सब्जियां ही शामिल हैं। वीगन डाइट फॉलो करने वाले लोग दूध और दूध से बने उत्पादों का भी सेवन नहीं करते। आज दुनिया भर में वेगन लोगों की अच्छी ख़ासी संख्या है। सेलिब्रिटी के बीच तो वीगन डाइट का चलन कुछ ज्यादा ही है। कहा जाए कि फिल्मी सितारों और दीगर मशहूर हस्तियों ने ही इस आहार को ज्यादा लोकप्रिय बनाया है, तो गलत नहीं होगा।

अमेरिका के बड़े सेलेब्रिटी जैसे, माइली साइरस, वीनस विलियम्स, अरियाना ग्रांड, बियोन्से आदि वीगन आहार की ब्रांड एम्बेसडर कहलाती हैं। इन्हीं की देखा-देखी बॉलीवुड में भी बहुत सी अभिनेत्रियों ने वीगन होने का एलान कर दिया है। इसमें सोनम कपूर, करीना कपूर, मल्लिका शेरावत जैसे नाम शामिल हैं। इसके अलावा शाहिद कपूर, आमिर खान, अक्षय कुमार जैसे बड़े अभिनेताओं ने भी ख़ुद के वेगन होने का एलान कर दिया है।
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लेकिन हैरत की बात है कि वीगन लोगों में मर्दों के मुकाबले औरतों की संख्या कहीं ज्यादा है। अमेरिका में वीगन लोगों की संख्या जानने के लिए एक सर्वे किया गया। सर्वे में सैम्पल साइज 11 हजार का था। नतीजे में पाया गया कि वेगन आहार लेने वालों में सिर्फ 24 फीसदी ही पुरुष हैं। वीगन आहार सेहत के लिए काफी फायदेमंद है फिर भी मर्द इसकी तरफ आसानी से आकर्षित क्यों नहीं होते?


मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि मर्दों को शायद लगता है कि मांस खाना मर्दानगी की निशानी है। जबकि सिर्फ फल-सब्जियां खाने से उनकी मर्दानगी को चोट लगती है। समाज में उन्हें नीची नजर से देखा जाने लगता है। ये बिल्कुल ऐसा ही है जैसे अगर कोई लड़का बचपन में गुड़िया की चोटी गूंथने लगे तो कहा जाता है, उसमें लड़कियों वाली अदाएं हैं। यानी उसे मर्द की श्रेणी में रख दिया जाता है।
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ये सोच आखिर पनपी कैसे?
अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कोलम्बिया के मनोवैज्ञानिक प्रोफ़ेसर स्टीवन हाइन का कहना है कि शुरुआत में इंसान पेट भरने के लिए शिकार करता था और मांस खाता था। शिकार करना, मर्दों के हिस्से का काम था। जब समाज जैसी किसी चीज की कल्पना भी इंसान के दिमाग नहीं थी, तब भी वो अप्रत्यक्ष रूप से पितृसत्तातमक समाज में ही जी रहा था। चूंकि मर्द शिकार करते थे, इसीलिए मांस खाना अपनी शान समझते थे।

आगे चलकर बाजार ने भी मर्दों की इस सोच और आदत को और पुख़्ता किया। 19वीं सदी में जब महिलाओं ने अलग पार्टियों में खाना शुरु कर दिया, तो रेस्टोरेंट और विज्ञापन पेश करने वाली कंपनियों ने खानों को दो वर्गों में बांट दिया। दाल, सब्ज़ी, सलाद और दही को महिलाओं का खाना कहा जाने लगा। जबकि, मांस, मछली, अंडे आदि मर्दों का खाना कहलाए जाने लगे। यही सोच हम आज भी अपनी अगली पीढ़ियों तक पहुंचा रहे हैं।

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Vegan Diet - फोटो : pixa
'सॉय बॉय' एक खास तरह का शब्द है, जो उन लड़कों या मर्दों के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जो सोयाबीन का सेवन ज्यादा करते हैं। माना जाता है कि सोयाबीन का ज्यादा सेवन करने से मर्दों की शारीरिक संरचना बिगड़ जाती है। सेक्स की ख्वाहिश में कमी आ जाती है। हालांकि इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। लेकिन ये सोच बड़े पैमाने पर पाई जाती है। 'सॉय बॉय' शब्द शब्दकोश तक में मौजूद है। प्रोफेसर हाइन का कहना है कि बहुत से मर्द रेस्टोरेंट आदि में खाना खाते समय सलाद या सब्जियां ऑर्डर करने से शरमाते हैं। कहीं भीतर डर रहता है कि उनकी मर्दानगी पर शक तो नहीं किया जाएगा।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
औरतें ज्यादा रहमदिल?
रिसर्च में ये भी पाया गया है कि औरतें, मर्दों के मुकाबले ज्यादा दयालु और रहमदिल होती हैं। जानवरों से उन्हें खास लगाव होता है। शायद इसलिए भी महिलाएं पुरुषों के मुक़ाबले ज्यादा संख्या में वीगन हैं। जानवरों के अधिकारों के लिए काम करने वालों में भी महिलाओं की ही संख्या ज्यादा है। लगभग 75 फीसदी। 1940 में अमेरिका में जानवरों के अधिकार की मांग उठाने वाली दो महिलाएं ही थीं। ऐसा भी जरूरी नहीं कि जानवरों से प्यार करने वाली महिलाएं मांस बिल्कुल ही ना खाएं। कई स्टडी से पता चलता है कि ऐसे बहुत से लोग हैं जो जानवरों से हमदर्दी तो करते हैं, लेकिन मांस खाना भी पसंद करते हैं।
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दरअसल बाजार में मांस इतने सलीके से बेचा जाता है कि खरीदने वाला ये भूल ही जाता है कि ये मांस किसी की जान लेकर उसके शरीर से नोंच कर निकाला गया है। मसलन दुकानों में जानवरों की आंखें, उनकी खाल, पैर, जबान इत्यादि दुकान में नहीं रखे जाते। अगर ये सब दुकान में रख दिया जाए, तो, हो सकता है खरीदने वाले का मन बदल जाए। वो मांस खाना ही छोड़ दे। वहीं रेस्टोरेंट में भी मांस के पकवानों के तरह-तरह के नाम होते हैं। जैसे अगर किसी को सुअर का गोश्त खाना है, तो, वो ये शब्द इस्तेमाल नहीं करेगा। वो कहेगा उसे पोर्क चाहिए। बकरे का गोश्त खाना है तो कहेगा मटन चाहिए। ऐसे नाम शायद एहसास-ए-गुनाह से बचने के लिए रखे जाते हैं।
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मांस खाने वालों के पास अपनी आदत को सही साबित करने के लिए दलील भी मौजूद होती हैं। वो इसे कुदरती खाद्य श्रृंखला का हिस्सा बताते हैं। कहते हैं कि अगर जानवरों को खाया नहीं गया, तो क़ुदरत का निजाम बिगड़ जाएगा। गोश्त को खुदा की नेमत समझ कर खा लेना चाहिए। कुछ विद्वान कहते हैं कि मांस, इंसान की प्रोटीन की जरूरत पूरा करने के लिए जरूरी है। लिहाजा इसे खाना कोई बुरी बात नहीं।

1980 की एक रिसर्च बताती है कि आदिम समाज में मर्द ही शिकार करने का काम करता था। जाहिर है उसके पास ताकत ज्यादा थी। लिहाजा ऐसे समाज जहां मांस खाने का चलन ज्यादा होता है वह पुरुष प्रधान समाज होते हैं। जबकि खेती पर निर्भर समाज समानता के सिद्धांत पर विश्वास रखते हैं। क्योंकि ऐसे समाज में महिलाओं की भागीदारी भरपूर होती है।
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Vegetables
बहरहाल, मर्दों के मुक़ाबले वीगन औरतों की संख्या ज्यादा क्यों है, इस पर रिसर्च अभी जारी है। लेकिन एक बड़ा सच यही है कि, महिलाएं ही वीगन डायट ज्यादा अपनाती हैं। इसकी एक बड़ी वजह शायद सहानुभूति है, जो पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में ज्यादा होती है।
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