अपनी बात समझाने के लिए डॉक्टर शारदा अपने स्कूल के दिनों का एक क़िस्सा साझा करती हैं। उन्होंने बताया, "मैं केरल से हूं जो भारत के सबसे शिक्षित राज्यों में से है। वहां भी हमें रिप्रोडक्टिव सिस्टम (प्रजनन तंत्र) के बारे में विस्तार से नहीं पढ़ाया गया। इतना ही नहीं, जब प्रेगनेंसी के बारे में पढ़ाए जाने की बारी आई तो लड़कों और लड़कियों को अलग-अलग कमरों में ले जाया गया।"यानी सेक्स और प्रेगनेंसी ऐसे विषय माने गए जिसके बारे में लड़कों और लड़कियों से एक साथ बात नहीं की जा सकती। डॉ। शारदा कहती हैं, "ये कितनी बड़ी विडंबना है कि जो दो समूह सेक्स की प्रक्रिया का अहम हिस्सा होते हैं, उन्हें अलग-अलग ले जा कर इसकी दी जा रही है।"
दूसरी वजह पर आते हुए डॉ। शारदा कहती हैं, "मेरी उम्र 30 साल से ज़्यादा है और मेरी मां आज भी मेरी सेक्स लाइफ़ को कंट्रोल करने की कोशिश करती हैं क्योंकि मेरी शादी नहीं हुई है और इसकी वजह भी सेक्स को नैतिकता से जोड़कर देखा जाना है।" यानी सेक्स के बारे में बात न होने की दूसरी वजह ये माना जाना है कि शादी के बाद, बंद कमरों में बत्तियां बुझाने के बाद ही इस बारे में सोचा जा सकता है। यही कारण है कि स्कूलों में अधिकतर शिक्षक बच्चों को सही और विस्तृत जानकारी देने से हिचकिचाते हैं। शिक्षकों को न तो ऐसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषयों को पढ़ाने की ट्रेनिंग मिली है और न ही वो इस समाज के बाहर से आते हैं। ज़ाहिर है, वो भी चीज़ों को उसी चश्मे से देखते हैं जैसे बाक़ी लोग।