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Parenting Tips: क्या रिश्तेदारों से मिलने से कतराता है बच्चा? जानिए अब नानी-दादी के घर क्यों नहीं जाना चाहता

Sun, 03 Mar 2024 08:49 AM IST
शिवानी अवस्थी लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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हैप्पी फैमिली डे - फोटो : istock
दीपिका शर्मा

कई बच्चों को रिश्तेदारों से मिलने की कोई उमंग नहीं रहती है। मिलते भी हैं तो बनावटी मुस्कान के साथ, उन्हें दिल से खुशी नहीं होती है। इस समस्या पर कभी गौर किया है आपने?

कभी गर्मियों की छुट्टियों में नानी का आंगन, दादा-दादी, नाना-नानी की कहानी और रिश्ते के भाई-बहनों के साथ खेलना ही भाता था, लेकिन आजकल बच्चों की दुनिया मोबाइल की स्क्रीन, सोशल साइट्स, दोस्त और खुद में सिमटकर रह गई है। रिश्ते-नाते जैसे उनके लिए सिर्फ एक औपचारिकता बनते जा रहे हैं। कभी आपने सोचा है कि उनके इस व्यवहार के पीछे क्या वजह हो सकती है? क्यों वे सगे-संबंधियों के आने या उनके घर जाने से कतराते हैं? इस लेख से बच्चों के रिश्तेदारों से दूरी की वजह की वजह को समझिए। 
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Parenting Tips - फोटो : pixabay
आजादी और हमउम्र

किशोर अवस्था में बच्चे अपनी आजादी को अधिक महत्व देते हैं। उन्हें माता-पिता पर निर्भर रहना नहीं भाता। रिश्तेदारों के बीच वे खुलकर नहीं रह पाते, इसलिए असहज महसूस करते हैं। इसके अलावा किशोर अवस्था में उनमें शारीरिक और जैविक बदलाव होते हैं। इस उम्र में बच्चे रिश्तेदारियों में जाने के बजाय अपनी उम्र के साथियों को अधिक तवज्जो देते हैं।
 
शर्मीला स्वभाव

कुछ बच्चे शर्मीले स्वभाव के होते हैं, जो हर किसी के साथ घुल-मिल नहीं पाते। ऐसे में वे सिर्फ परिवार के साथ ही सहजता महसूस करते हैं और रिश्तेदारों के सामने आने पर कतराते हैं।
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parenting - फोटो : istock
एकल परिवार

पुराने समय में लोग संयुक्त परिवार में रहना पसंद करते थे, जिस कारण वे अपने सुख-दुख साथ बांटा करते थे, लेकिन आजकल सब एकल परिवार को बढ़ावा दे रहे हैं और उसमें भी एक ही बच्चे को तरजीह दे रहे हैं। बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए यह गलत भी नहीं है, लेकिन हमेशा अकेला रहने के कारण बच्चे को अकेलेपन की आदत हो जाती है और ऐसे में वह रिश्तों के महत्व को नहीं समझ पाता है।

असुरक्षित महसूस करना

 कुछ रिश्तेदार ऐसे भी होते हैं, जो बच्चे के माता-पिता के सामने बच्चे के साथ अच्छा व्यवहार करते हैं और अकेले में दुर्व्यवहार। इसलिए बच्चा न सिर्फ उस रिश्तेदार, बल्कि अन्य लोगों से भी दूरियां बनाने लगता है, क्योंकि वह खुद को असुरक्षित महसूस करता है। कई बार तो बच्चा उन्हें भला-बुरा कहने से भी नहीं चूकता।

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सोशल साइट्स और मोबाइल - फोटो : pexel
नकारात्मक बातें

कभी-कभी बड़ों के बीच रिश्तों में आई खटास को लेकर माता-पिता बच्चों के सामने ही उल्टा-सीधा बोलने लगते हैं। इससे बाल मन में उस रिश्ते के प्रति घृणा का भाव आने लगता है, जो बच्चों के स्वभाव को प्रभावित करता है। इसके अलावा कई बार माता-पिता बच्चे की तुलना रिश्तेदारों के बच्चों से करने लगते हैं या कुछ रिश्तेदार भी ऐसे होते हैं, जो बच्चे को नसीहत देना ज्यादा पसंद करते हैं। ऐसे लोगों से बच्चे दूर रहना ही पसंद करते हैं।

सोशल साइट्स और मोबाइल

बच्चे आजकल परिवार के साथ बैठने के बजाय मोबाइल फोन में गेम या सोशल मीडिया साइट पर व्यस्त रहना ज्यादा पसंद करते हैं। सोशल इवेंट्स का हिस्सा न बनकर वे सोशल साइट्स पर ऑनलाइन रहना ज्यादा पसंद करते हैं।
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फैमिली फोटो - फोटो : istock
सामाजिक आयोजनों का हिस्सा बनाएं

मनोवैज्ञानिक डॉ. मेघा शर्मा बताती हैं, अपने बच्चों से बड़ों के बीच हुए मनमुटाव की बात कभी शेयर न करें। उनके साथ सहयोग से जुड़े अनुभव ही साझा करें। बचपन से उन्हें सामाजिक आयोजनों का हिस्सा बनाएं। ऐसा करने से बच्चे रिश्तेदारों से जुड़ेंगे और पारिवारिक परंपराओं को जानेंगे। कोरोना काल ने सभी को रिश्तों की अहमियत समझाई, इसलिए बच्चों को भी आपस में जोड़ने वाली संबंधों की इस डोर की अहमियत समझाएं। उन्हें बताएं कि जरूरी नहीं, माता-पिता हमेशा साथ रहें, रिश्तेदार सुख-दुख के साथी होते हैं। बच्चों की तुलना न करें, इससे वे हीनभावना के शिकार हो जाते हैं और सिर्फ हमउम्र बच्चों के साथ या अकेले रहना पसंद करते हैं। बच्चों के साथ समय गुजारें, ताकि आपके साथ उनकी बॉन्डिंग बने और वे खुलकर अपनी बातें कह सकें।
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