कहा जाता है कि, एक बार सिखों के पहले गुरु नानक देव जी को उनके पिता ने व्यापार करने के लिए कुछ पैसे दिए, जिसे देकर उन्होंने कहा कि वो बाजार से सौदा करके कुछ कमा कर लाए। नानक देव जी इन पैसों को लेकर जा रहे थे कि उन्होंने कुछ भिखारियों को देखा, उन्होंने वो पैसे भूखों को खिलाने में खर्च कर दिए और खाली हाथ घर लौट आए। नानक जी की इस हरकत से उनके पिता बहुत गुस्सा हुए, जिसके बाद नानक देव जी ने कहा कि सच्चा लाभ तो सेवा करने में है।
कहा जाता है कि लंगर नानक जी के घर पर ही शुरू हो गया था, जिसे आने वाले गुरुओं ने भी जारी रखा। वे कहते थे कि चाहे अमीर हो या गरीब, ऊंची जाति का हो या नीची जाति, अगर वह भूखा है तो उसे खाना जरूर खिलाओ। इसलिए स्वर्ण मंदिर में चार दरवाजे हैं। जो यही संदेश देते हैं कि व्यक्ति कोई भी हो, उनके लिए चारों दरवाजे खुले हैं।