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सावधान: पुरुषों की तुलना में महिलाओं में न्यूरोलॉजिकल रोगों का खतरा अधिक, क्या है इसकी वजह और कैसे करें बचाव

Thu, 23 Jan 2025 06:29 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

न्यूरोलॉजिकल समस्याएं मस्तिष्क, रीढ़ की हड्डी और तंत्रिकाओं को प्रभावित करती हैं। इसके कारण आपको कमजोरी, लकवा मारने और संवेदना कम होने सहित कई तरह की दिक्कतें हो सकती हैं। महिलाओं में इसका जोखिम क्यों अधिक होता है, आइए इस बारे में जानते हैं।
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महिलाओं में न्यूरोलॉजिकल रोगों का खतरा - फोटो : Freepik.com
लाइफस्टाइल और खान-पान में गड़बड़ी ने कई प्रकार की बीमारियों के खतरे को बढ़ा दिया है। नतीजतन 20 से कम उम्र के लोग भी हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज जैसी कई प्रकार की बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। यही कारण कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ सभी लोगों को अपनी सेहत का निरंतर ध्यान रखने की सलाह देते हैं।

पर क्या आप जानते हैं कि पुरुषों की तुलना में कुछ बीमारियों का खतरा महिलाओं में अधिक हो सकता है? अध्ययनों से पता चलता है कि महिलाओं में जिन स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम पुरुषों से अधिक देखा जाता रहा है उनमें न्यूरोलॉजिकल समस्याएं प्रमुख हैं। 

न्यूरोलॉजिकल समस्याएं यानी तंत्रिका तंत्र से संबंधी बीमारियां जो मस्तिष्क, रीढ़ की हड्डी और तंत्रिकाओं को प्रभावित करती हैं। इसके कारण आपको कमजोरी, लकवा मारने और संवेदना कम होने सहित कई तरह की दिक्कतें हो सकती हैं।

महिलाओं में इसका जोखिम क्यों अधिक होता है, आइए इस बारे में जानते हैं।
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कई बीमारियों का खतरा पुरुषों और महिलाओं में अलग-अलग हो सकता है। - फोटो : Freepik.com
महिलाओं में न्यूरोलॉजिकल विकारों का जोखिम 

मेडिकल रिपोर्ट्स पर नजर डालें तो पता चलता है कि क्लीनिकल ट्रायल और चिकित्सा अनुसंधान मुख्यरूप से पुरुषों से संबंधित विषयों पर अधिक केंद्रित रहे हैं। हालांकि, पिछले कुछ दशकों में, चिकित्सा विशेषज्ञों ने यह देखना शुरू किया है कि कई बीमारियों का खतरा पुरुषों और महिलाओं में अलग-अलग हो सकती है। न्यूरोलॉजिकल समस्याएं भी उनमें से एक हैं।

अमर उजाला से बातचीत में वरिष्ठ चिकित्सक डॉ रमन सिंह बताते हैं, महिलाओं में उनकी प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया, हार्मोनल चक्र और कई अन्य कारकों में अंतर के कारण कुछ न्यूरोलॉजिकल विकारों का का जोखिम अधिक हो सकता है।

अल्जाइमर रोग, मिर्गी, माइग्रेन, मल्टीपल स्केलेरोसिस (एमएस), पार्किंसंस रोग और स्ट्रोक जैसी समस्याएं उनमें प्रमुख हैं।
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शरीर में होने वाले हार्मोनल परिवर्तन - फोटो : Freepik.com
हार्मोनल बदलाव एक प्रमुख कारण

डॉ रमन कहते हैं, पुरुषों की तुलना में महिलाओं में हार्मोनल बदलाव होने का जोखिम अधिक होता है। हार्मोनल उतार-चढ़ाव न्यूरोलॉजिकल स्थितियों को बढ़ाने वाले माने जाते हैं। जैसे मासिक धर्म, गर्भावस्था या रजोनिवृत्ति के दौरान महिलाओं में एस्ट्रोजन हार्मोन के स्तर में कई बार बदलाव आता है। 

एस्ट्रोजेन हार्मोन महिला के यौन और प्रजनन विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मस्तिष्क, हड्डियों, त्वचा, बाल और अन्य अंगों पर भी इसका असर होता है। मासिक धर्म और गर्भावस्था के दौरान एस्ट्रोजन असंतुलन के कारण महिलाओं में माइग्रेन होने का खतरा अधिक होता है।

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याददाश्त की समस्या - फोटो : Freepik.com
महिलाओं में अल्जाइमर रोग का खतरा

अध्ययनों से पता चलता है कि अल्जाइमर रोग का खतरा भी महिलाओं को अधिक होता है। अल्जाइमर रोग से दुनियाभर में पीड़ित दो-तिहाई मरीज महिलाएं हैं। इसके लिए भी हार्मोनल बदलाव एक कारण है। शोध में पाया गया है कि एस्ट्रोजन हार्मोन शरीर को अल्जाइमर रोग के प्रभावों से बचाता है, हालांकि रजोनिवृत्ति के बाद एस्ट्रोजन का स्तर कम होने के कारण महिलाओं में इस विकार का खतरा पुरुषों की तुलना में बढ़ जाता है। 
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तंत्रिका को स्वस्थ रखने के लिए योग-व्यायाम करें। - फोटो : Adobe stock
न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से कैसे बचें?

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि चूंकि अब ये स्पष्ट हो चुका है कि महिलाओं को 50-55 की आयु (रजोनिवृत्ति) के बाद न्यूरोलॉजिकल समस्याएं अधिक हो सकती हैं इसलिए कम उम्र से ही कुछ बातों का ध्यान रखकर भविष्य में आप अपने जोखिमों को कम करने का प्रयास कर सकती हैं।

इसके लिए संतुलित आहार का सेवन सबसे महत्वपूर्ण है। पत्तेदार सब्जियां, वसायुक्त मछली, मेवे और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर चीजों का सेवन अधिक करें। इसके अलावा शारीरिक गतिविधियां और नियमित योग की आदत मस्तिष्क में रक्त परिसंचरण को सुधारने और तंत्रिका संबंधी विकारों के जोखिम को कम करने में सहायक है, इसलिए रोजाना व्यायाम जरूर करें। स्ट्रेस मैनेजमेंट, अच्छी नींद लेना भी भविष्य में इन समस्याओं से बचाव के लिए आवश्यक है।


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स्रोत और संदर्भ

Sex influences in neurological disorders: case studies and perspectives

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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