बच्चों को मोबाइल के गंभीर खतरे से बचाइए
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मोबाइल-गेम्स की लत, बच्चों में बढ़ती आक्रामकता से बचें कैसे?
अब तक के बिंदुओं से यह तो स्पष्ट हो गया है कि बच्चों के हाथ में मोबाइल थमा देना जरा भी 'कूल सिंबल' नहीं है, इसके सिर्फ नुकसान ही हैं, फायदे शायद 10 में से 1 या दो।
भारत के शीर्ष व्यापार संगठनों में से एक, भारतीय वाणिज्य एंव उद्योग मंडल (एसोचेम) के प्रवक्ता कहते हैं-
बच्चों के भविष्य को सुखद बनाने की जिम्मेदारी, माता-पिता से लेकर, परिवार, पड़ोसी, राज्य, सरकार सबकी है। भारत में गेमिंग के फिल्टरेशन को लेकर सख्त कदम उठाने की आवश्यकता है। कंपनियों को कलेक्टिव सिक्योरिटी (समान सर्वोत्तम वैश्विक सुरक्षा मानकों) का पालन करना चाहिए।
सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग के दिग्गज टीवी. मोहनदास पई कहते हैं-
मोबाइल में गेम्स की प्रकृति को निर्धारित करने को लेकर सख्त रवैया बनाने की जरूरत है। गेम डेवलपर्स और इसकी लोगों तक पहुंच के लिए जिम्मेदार साधनों को भी अपनी मौलिक जिम्मेदारी समझनी होगी।
बच्चों में पबजी जैसे गेम्स के कारण बढ़ती आक्रामता को लेकर मनोरोग विशेषज्ञों का कहना है-
हिंसक गेम्स के कारण बच्चों में जिस तरह से व्यवहारिक समस्याएं बढ़ रही हैं, यह किसी शहर या राज्य का ही नहीं, बल्कि वैश्विक चिंतन का विषय है। इसमें सिर्फ मानसिक स्वास्थ्य का ही विषय नहीं है, बल्कि उससे ऊपर उठकर इसके सभी पहलुओं की गंभीरता को लेकर वैश्विक स्तर पर चर्चा की जानी चाहिए। पहली कड़ी माता-पिता से लेकर वैश्विक स्वास्थ्य संगठन तक को इस गंभीरता को समझते हुए अपने-अपने दायित्व की निर्वहन करना होगा।
सार यह है कि बच्चों को बच्चा ही रहने दें। समय से पहले न तो उन्हें बड़ा बनाने की असहज कोशिश करें, न ही मोबाइल थमा कर अपनी जिम्मेदारी से बचें। बचपन अमूल्य और जीवन का आधार है, जैसा आधार होगा, भविष्य की बिल्डिंग वैसी ही खड़ी होगी।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेख स्वास्थ्य विशेषज्ञों के सुझाव और साझा की गई जानकारियों के साथ मेडिकल रिपोर्ट्स/अध्ययनों के आधार पर तैयार किया गया है। संबंधित अध्ययनों की कॉपी और विशेषज्ञों का परिचय साथ में संलग्न है। लेख का उद्देश्य पर्यावरण को हो रही हानि के प्रति लोगों को जागरूक करना है।