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Psychotic Breakdown: सेलिब्रेटी भी हो चुके हैं साइकोटिक ब्रेकडाउन का शिकार, जानें इसके लक्षण और कारण

Sun, 29 Oct 2023 03:23 PM IST
शिवानी अवस्थी लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला

सार

कभी-कभी जब आप खुद को जरूरत से ज्यादा भावुक पाती हैं तो छोटी-छोटी बात पर भी रोना आ जाता है। बेवजह जरूरत से ज्यादा थकान लगने लगती है। दिमाग शून्य की स्थिति में चला जाता है। ऐसे में आपको सावधान होने की जरूरत है।
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Psychotic Breakdown - फोटो : istock
सोनम लववंशी

साइकोटिक ब्रेकडाउन एक तरह का नर्वस ब्रेकडाउन है। इस स्थिति में पीड़ित व्यक्ति का वास्तविकता के साथ संपर्क पूरी तरह टूट जाता है। अमेरिकी गायिका लेडी गागा ने एक डॉक्यूमेंट्री ‘द मी यू कांट सी’ में यह साझा किया कि एक संगीत निर्माता ने उनके साथ उस समय दुष्कर्म किया, जब वह 19 साल की थीं। उस दुष्कर्मी ने धमकाया और कहा था कि उन्होंने अगर मुंह खोला तो वह संगीत से हमेशा के लिए बेदखल कर देगा। बस, उसके बाद उन्हें कुछ भी याद नहीं। यह ऐसी मुश्किल घड़ी थी, जब वह पूरी तरह से साइकोटिक ब्रेक का शिकार हो गई थीं। वह कहती हैं कि यह पीटीएसडी यानी पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर था, जिससे वह जूझीं। दरअसल, यह एक मानसिक सेहत से जुड़ी समस्या है, जो किसी ऐसी भयानक घटना से उत्पन्न होती है, जिसको व्यक्ति ने खुद अनुभव किया हो।

पीटीएसडी के लक्षण

कुछ बीमारियों के लक्षण दिखाई देते हैं और महसूस भी होते हैं, लेकिन कुछ बीमारियां ऐसी होती हैं, जिनका कोई लक्षण नहीं होता और न ही कोई लक्षण किसी को दिखाई देता है। यहां तक कि ऐसी बीमारी से पीड़ित व्यक्ति खुद भी लंबे समय तक इससे अनभिज्ञ रहता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि वास्तव में वह बीमारी नहीं, बल्कि एक मानसिक स्थिति होती है। जब कोई व्यक्ति किसी दुखद घटना से गुजरता है तो इसका असर उसकी मनःस्थिति पर अलग तरह से पड़ता है और वह खुद को ही समझने में अक्षम रहता है।
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Psychotic Breakdown - फोटो : istock
दिमाग के सुप्त होने जैसी स्थिति

36 साल की अमेरिकी पॉप स्टार केशा भी उन लोगों में से हैं, जिन्होंने मानसिक विक्षोभ (साइकोटिक ब्रेक) का सामना किया। अपनी मानसिक सेहत और संघर्षों के बारे में खुलकर बात करते हुए उन्होंने स्वीकार भी किया कि वह खुद को पागल जैसा महसूस करती थीं। वह कहती हैं कि यह दिमाग के सुप्त होने जैसी स्थिति थी। वह रोज अकेले लगभग दो घंटे तक रोतीं और उसके बाद सामान्य हो जाती थीं।

भावनात्मक थकान की स्थिति

कभी-कभी जब आप खुद को जरूरत से ज्यादा भावुक पाती हैं तो छोटी-छोटी बात पर भी रोना आ जाता है। बेवजह जरूरत से ज्यादा थकान लगने लगती है। दिमाग शून्य की स्थिति में चला जाता है। ऐसे में आपको सावधान होने की जरूरत है। दरअसल, ऐसे समय में आप भावनात्मक थकान वाली स्थिति से गुजर रही होती हैं। इसका मतलब आपके दिमाग के लिए यह ब्रेक टाइम है। इसमें आप तनाव की स्थिति से गुजरती हैं और परिस्थितियों को सही तरह से संभाल नहीं पाती हैं। इसका असर करियर के साथ निजी जीवन पर भी पड़ता है।
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Psychotic Breakdown - फोटो : istock
चिंता और तनाव

पीड़ित व्यक्ति को अकारण ही छोटी-छोटी बात पर चिंता और तनाव होने लगता है, जो कि भावनात्मक थकान का सीधा संकेत है। साइकोटिक ब्रेक से प्रभावित व्यक्ति भावनात्मक रूप से थका होता है। वह कहीं मौजूद होकर भी आस-पास की चीजों पर ध्यान नहीं देता और अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं कर पाता है। अगर किसी भी व्यक्ति को लगातार ऐसा महसूस हो रहा है, तो समझ लेना चाहिए कि वह इस बीमारी की जकड़ में है। इससे बाहर निकलना है तो ब्रेक जरूरी है, तभी वह सही दिशा में सोच पाएगा और फैसला ले पाएगा। अगर इस स्थिति में ब्रेक नहीं लिया तो यह हानिकारक साबित हो सकता है। इसलिए इसमें मानसिक इलाज की भी जरूरत होती है।

यहां सवाल यह भी उठता है कि आखिर हम मानसिक परेशानियों को नकारने की कोशिश क्यों करते हैं? क्या दिमाग हमारे शरीर का हिस्सा नहीं है? सवाल सीधा है, लेकिन जवाब उलझे हुए!

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Psychotic Breakdown - फोटो : istock
ब्रेकडाउन के कारणों का ईमानदारी से विश्लेषण करें

अमेरिका के स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिकों ने भावनात्मक रूप से टूटने और मनोवैज्ञानिक संकट को समायोजित करने की क्षमता के बारे में निजी जिंदगी की घटनाओं के प्रभावों का विश्लेषण किया। उन्होंने पाया कि प्यार में न कामयाब होने की स्थिति में अधिकांश लोग यह समझने की कोशिश करते हैं कि जो हुआ, वह क्यों हुआ! अगर यह उनकी गलती थी तो क्या भविष्य में नया प्यार पाने की कोई संभावना है? इन सवालों के जवाब कैसे हमें इस स्थिति से निपटने में मदद कर सकते हैं या मनोवैज्ञानिक नुकसान के प्रति अधिक संवेदनशील कैसे हो सकते हैं? वैज्ञानिकों का निष्कर्ष था कि ब्रेकडाउन के कारणों का ईमानदारी से विश्लेषण किया जाए और प्यार के रिश्तों में ऐसा ही होता है, इसे अपने अपराधबोध का हिस्सा मानें और पीड़ित होने से बच जाएं।

मनोवैज्ञानिक ‘ब्रेक’ को मनोविकृति की घटना के रूप में वर्णित किया जाता है। इसमें मतिभ्रम और अचानक व्यवहार में बदलाव जैसे लक्षण शामिल होते हैं। ‘नेशनल एलायंस ऑन मेंटल इलनेस’ के अनुसार, इस स्थिति में यह फर्क करना भी मुश्किल हो जाता है कि सच्चाई क्या है और क्या नहीं! मनोविकृति वास्तव में इलाज योग्य स्थिति नहीं है, लेकिन यह एक गंभीर मानसिक स्थिति का लक्षण जरूर हो सकती है जैसे कि सिजोफ्रेनिया, बाइपोलर डिसऑर्डर या सीवियर डिप्रेशन। ऐसे मनोवैज्ञानिक मामलों में अक्सर भ्रम, मतिभ्रम और असंगत संवाद जैसे लक्षण शामिल होते हैं, लेकिन इससे प्रभावित व्यक्ति 24 से 72 घंटे में ठीक भी हो जाता है।

इस समस्या के कारण 

इस मनोविकृति के पीछे कई कारक शामिल हो सकते हैं, जैसे कि सेहत, आनुवांशिकी, शारीरिक बीमारी, नींद की कमी और मादक पदार्थ या गलत दवाइयों का सेवन। इसके अलावा अधिक उम्र में अल्जाइमर या मानसिक भ्रम जैसे तंत्रिका विकार भी इसके कारण हो सकते हैं। लेकिन हमेशा ही यह बड़ी या गंभीर चिकित्सा समस्या नहीं होती, जो मनोविकृति का कारण बने।
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Psychotic Breakdown - फोटो : iStock
मनोविकार से बचाव के उपाय

ऐसे में हमें अपनी व्यस्त दिनचर्या से कुछ पल की छुट्टी जरूर लेनी चाहिए। ऐसा करने से हम न सिर्फ आराम कर सकते है, बल्कि तनावपूर्ण परिस्थितियों के लिए बेहतर तरीके से तैयार भी हो सकते हैं। खासकर तब, जब आप फोकस और एकाग्रता खो रही हों। वैसे तो आजकल सोशल मीडिया भी तनाव का कारण बन रहा है, जिससे भी मानसिक थकान और अवसाद बढ़ रहा है। इसलिए दिन में कुछ समय इससे भी दूरी बनाकर रखना हितकर रहेगा।

बीमारी को समझ पाना आसान नहीं

मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. वी.एस. पाल कहते हैं, साइकोटिक ब्रेक का कोई एक कारण नहीं होता। मानसिक रोगी भी एक जैसे नहीं होते और न उनका इलाज समान होता है। कुछ लोग काउंसलिंग से ठीक हो जाते हैं तो कुछ लोगों को इलाज की जरूरत पड़ती है। मनोरोगी खुद नहीं जानता कि वह अवसादग्रस्त है। उसके आस-पास के लोग ही जान सकते हैं कि वह अवसादग्रस्त है। इसलिए जब भी ऐसा महसूस हो, पीड़ित को तुरंत डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए। अवसाद की स्थिति से उसे चिकित्सक और परिवार वाले ही बाहर निकाल सकते हैं। इसके लिए सबसे पहले वे असल कारण समझने की कोशिश करें। वे उसे समझाएं और उसे उन हालात से बाहर निकालें। आजकल की दिनचर्या और आर्थिक, पारिवारिक और ऑफिस में काम को प्रोत्साहन नहीं मिलने के कारण भी युवा इस स्थिति का सामना कर रहे हैं। इसलिए आपको ऐसे लोगों से हमेशा बात करते रहना चाहिए और खुद के साथ उसे सहज महसूस कराना चाहिए, ताकि वे अपने मन की बात खुलकर आपसे साझा कर सकें।

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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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