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Delhi Pollution: प्रदूषित हवा डायबिटीज रोगियों के लिए है दुश्मन, दिल्ली-एनसीआर वाले हो जाएं सतर्क

Sat, 15 Nov 2025 05:36 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • अध्ययनों से पता चलता है कि पीए2.5 जैसे सूक्ष्म कण शरीर में सूजन इंफ्लेमेशन को बढ़ाते हैं जिसके कारण इंसुलिन रेजिस्टेंस की दिक्कत बढ़ जाती है। इससे ब्लड शुगर को नियंत्रित करना कठिन हो जाता है। 
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एयर पॉल्यूशन से डायबिटीज का खतरा - फोटो : Freepik.com
दिल्ली-एनसीआर में पिछले एक महीने से वायु प्रदूषण का प्रकोप देखा जा रहा है। यहां हवा की गुणवत्ता लगातार 'गंभीर' श्रेणी में बनी हुई है। एयर क्वालिटी अर्ली वार्निंग सिस्टम (ईडब्ल्यूएस) के मुताबिक शनिवार (15 नवंबर) को दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) 386 दर्ज किया गया, जबकि निजी वायु गुणवत्ता निगरानी ने इसे लगभग 470 बताया है। डॉक्टर्स के मुताबिक इस स्तर का प्रदूषण हमारे फेफड़ों पर एक दिन में 10-12 सिगरेट पीने के प्रभाव के बराबर है। 

अमर उजाला में प्रकाशित रिपोर्ट्स में हमने बताया कि हवा में पीएम2.5 और पीएम 10 जैसे सूक्ष्म कणों का स्तर तेजी से बढ़ा है, जो फेफड़ों के अंदरूनी हिस्सों में पहुंचकर सांस लेने की क्षमता को कमजोर करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार लगातार प्रदूषित हवा में रहने से फेफड़ों की सूजन, दमा, ब्रोंकाइटिस, खांसी-बुखार और सांस फूलने जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं। छोटे बच्चे, बुजुर्ग और पहले से बीमार लोग ज्यादा प्रभावित होते हैं।

ऐसे में सवाल है कि क्या बढ़ा हुआ प्रदूषण शुगर के मरीजों के लिए भी खतरनाक है?
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दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण - फोटो : ANI
वायु प्रदूषण के कारण होने वाली दिक्कतें

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, प्रदूषण के दुष्प्रभाव सिर्फ फेफड़ों तक सीमित नहीं हैं। खून में जाकर ये जहरीले कण हृदय पर दबाव बढ़ाते हैं, ब्लड प्रेशर को प्रभावित करते हैं और दिल की धमनियों में सूजन पैदा कर सकते हैं। इसके अलावा, प्रदूषण लिवर और किडनी की कार्यक्षमता को भी धीमा कर देता है। लंबे समय तक प्रदूषित वातावरण के संपर्क में रहने के कारण इम्यून सिस्टम कमजोर होता है जिससे शरीर संक्रमणों के प्रति अधिक संवेदनशील बन जाता है।

डायबिटीज के मरीजों के लिए प्रदूषण सामान्य लोगों की तुलना में ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है।
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वायु प्रदूषण के दुष्प्रभाव - फोटो : Freepik.com
पीए 2.5 का डायबिटीज पर असर

अध्ययनों से पता चलता है कि पीए 2.5 जैसे सूक्ष्म कण शरीर में सूजन इंफ्लेमेशन बढ़ाते हैं जिसके कारण इंसुलिन रेजिस्टेंस की दिक्कत बढ़ जाती है। इससे ब्लड शुगर को नियंत्रित करना कठिन हो जाता है। इसके अलावा प्रदूषण में मौजूद जहरीले तत्व ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को बढ़ाते हैं, जिससे कोशिकाओं की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। इसका सीधा असर शुगर के उतार-चढ़ाव पर पड़ता है।

डॉक्टर बताते हैं, वायु प्रदूषण फेफड़ों और हृदय को भी कमजोर करता है और डायबिटीज मरीजों में इन बीमारियों का खतरा पहले से ही ज्यादा होता है, इसलिए प्रदूषण के कारण दुष्प्रभाव लगभग दोगुना हो जाता है। 

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डायबिटीज का बढ़ता खतरा - फोटो : Freepik.com
डायबिटीज की बढ़ सकती है दिक्कतें

एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि पीएम2.5 जैसे सूक्ष्म कणों के संपर्क में एक महीने रहने से रक्त शर्करा का स्तर बढ़ सकता है और एक वर्ष या उससे अधिक समय तक इसके संपर्क में रहने से नए लोगों में डायबिटीज होने का खतरा बढ़ जाता है। जिन शहरों में पीएम2.5 के वार्षिक औसत स्तर में प्रत्येक 10μg/m3 की वृद्धि से मधुमेह का खतरा 22% बढ़ जाता है।

दिल्ली स्थित क्रॉनिक डिजीज कंट्रोल सेंटर के शोधकर्ता सिद्धार्थ मंडल कहते हैं, भारतीय लोग पर्यावरणीय और लाइफस्टाइल से संबंधित गड़बड़ियों के चलते मधुमेह के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। उन्होंने कहा कि पिछले 20 से 30 वर्षों में जीवनशैली में गड़बड़ी के साथ वायु प्रदूषण का जुड़ना, मधुमेह के बोझ को बढ़ा रहा है।
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डायबिटीज को कंट्रोल में रखना जरूरी - फोटो : Freepik.com
ब्लड शुगर को कंट्रोल रखने वाले उपाय करें

डॉक्टर कहते हैं, प्रदूषण के कारण होने वाले दुष्प्रभावों से बचने के लिए डायबिटीज के मरीजों को अपनी दिनचर्या में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव करने चाहिए। सुबह या शाम के समय बाहर वॉक करने से बचें क्योंकि इन समयों में प्रदूषण का स्तर सबसे अधिक होता है। अगर बाहर जाना जरूरी हो तोमास्क पहनें।

हवा में प्रदूषण बढ़ने पर शरीर को अधिक पानी की आवश्यकता होती है, इसलिए नियमित रूप से हाइड्रेशन का ध्यान रहें। खाने में एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर चीजें जैसे विटामिन सी, विटामिन ई, हल्दी, ग्रीन टी, फल और सब्जियां शामिल करें, क्योंकि ये प्रदूषण से होने वाले ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने में सहायक हैं। इन सबके साथ ब्लड शुगर की मॉनिटरिंग करते हैं ताकि शुगर की स्थिति का सही से अंदाजा हो सके।



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नोट: 
यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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