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Exclusive- अमर उजाला ने किया था आगाह: हरदा में दिखने लगे PTSD के मामले, डर-सदमे में लोग, नींद की बढ़ी दिक्कतें

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हरदा हादसे के बाद बढ़ी मानसिक स्वास्थ्य की समस्या - फोटो : amarujala.com
मध्यप्रदेश के हरदा जिले में 6 फरवरी को पटाखा फैक्ट्री में हुए भीषण धमाके ने जो तबाही मचाई थी, स्थानीय लोग एक हफ्ते बाद भी उसके साइड इफेक्ट्स से नहीं उबर पाए हैं। बच्चे हों या वयस्क सभी उम्र के लोगों में कई प्रकार की समस्याएं देखी जा रही हैं।

हरदा हादसे के दो दिन बाद ही अमर उजाला ने मनोचिकित्सकों के हवाले से स्थानीय लोगों में पीटीएसडी (पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर) की समस्या को लेकर अलर्ट किया था। पीटीएसडी को चिंता विकार, गंभीर अवसाद, अनिद्रा, ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों का प्रमुख कारण माना जाता है। किसी भयानक घटना या हादसे के बाद इस तरह की मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम पहले भी देखा जाता रहा है।

(अमर उजाला ने किया था अलर्ट- पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें )

हरदा में पटाखा फैक्ट्री में हुए धमाके ने बड़ी संख्या में न सिर्फ लोगों को शारीरिक रूप से प्रभावित किया है, साथ ही इसके कारण लोगों में चिंता-विकार, सदमे जैसी मानसिक समस्याओं का खतरा भी देखा जा रहा है। फैक्ट्री के आसपास के कई घर-दुकानें बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हुईं हैं। इन प्रतिकूल परिस्थितियों के साइड-इफेक्ट्स भी अब सामने आने शुरू हो गए हैं।
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हरदा में पटाखा फैक्ट्री में ब्लास्ट के बाद लगी आग। - फोटो : amar ujala digital
सदमे में लोग-बच्चों में अब भी डर का माहौल 

स्थानीय सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स से पता चलता है कि हरदा हादसे को एक हफ्ते का समय होने वाला है, पर अब भी लोगों के कान में धमाके की आवाजें गूंज रही हैं। बच्चे हों या वयस्क, सभी में इतना डर बैठ चुका है कि थोड़ी सी आवाज से वो चौंक जा रहे हैं। अचानक रात में नींद टूट जाती है, रात को सन्नाटा होते ही डर का साया और सख्ती के साथ लोगों को अपनी आगोश में ले लेता है। रात में बच्चे अचानक से उठकर रोने लगते हैं।

जिन लोगों के सामने धमाका हुआ था, जिन लोगों ने सैकड़ों फीट ऊपर उछलती लाशों को देखा, आंखें बंद करते ही वो नजारे फिर से दिमाग मे में घूमने लग जाते हैं।
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धमाके के दिखने लगे दुष्प्रभाव - फोटो : istock
क्वालिटी ऑफ लाइफ हो सकती है प्रभावित

सूत्र बताते हैं, धमाके ने कई परिवार के लोगों को छीन लिया, बड़ी संख्या में लोग अपंग हो गए हैं, किसी के हाथ की उंगलियां कट गई हैं, किसी के पैर जख्मी हैं। ऊपर से घटना के विभत्स दृश्य चिंता-तनाव और अवसाद को बढ़ा रहे हैं। घटना का सबसे ज्यादा असर बच्चों पर देखा जा रहा है।

मनोचिकित्सक कहते हैं, ये विपरीत परिस्थितियां भविष्य के लिए भी काफी चिंताजनक हो सकती हैं। बुरी-भयानक यादों का क्वालिटी ऑफ लाइफ पर भी असर होता है। ये विकट परिस्थिति है जिसमें पीड़ितों के शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की सेहत पर गंभीरता से ध्यान देते रहने की आवश्यकता है।

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मानसिक स्वास्थ्य विकारों का जोखिम - फोटो : Pixabay
क्या कहते हैं मनोचिकित्सक?

अमर उजाला से बातचीत में भोपाल स्थित मनोचिकित्सक डॉ सत्यकांत बताते हैं, दुनियाभर में पहले की भी इस तरह की घटनाओं को उठाकर देखें तो पता चलता है कि हादसे की आग तो कुछ समय में ठंडी हो जाती है, पर धुंआ लंबे समय तक बना रहता है। मसलन घटना के बाद  पीटीएसडी जैसी समस्याओं का जोखिम काफी अधिक हो सकता है। फिलहाल हरदा में जो दिखाई दे रहा है वो 'टिप ऑफ आइसबर्ग' जैसा है, जो संकेत देता है कि बड़ी संख्या में यहां मानसिक स्वास्थ्य विकारों का खतरा हो सकता है।

लिहाजा स्थानीय लोगों में वृहत स्तर पर काउंसिलिंग की जरूरत है जिससे समय रहते इन विकारों का निदान और उपचार किया जा सके।
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अपनों के साथ और समय पर उपचार की जरूरत - फोटो : istock
अपनों के साथ मरहम जैसा

डॉ सत्यकांत कहते हैं, हरदा के लोगों को पीटीएसडी के खतरे से बचाने में मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट्स के साथ पीड़ितों के रिश्तेदार-साथियों की भी बड़ी भूमिका है। अपनों से मिलने वाले समर्थन-अपनत्व और प्रेम से विपरीत परिस्थियों से निपटने के लिए संबल मिलता है।

अमर उजाला के माध्यम से जो लोग इस रिपोर्ट के पढ़ रहे हैं वो हरदा में अपने साथियों-रिश्तेदारों के लगातार संपर्क में रहें, उनका हाल-चाल लेते रहें, अपनों का साथ घाव पर मरहम जैसा काम करता है। अगर आपको वहीं पर लोगों में किसी तरह की समस्याओं का अनुभव होता है तो उन्हें तुरंत किसी पेशेवर के पास सहायता के लिए भेजें। हरदा की इन प्रतिकूल परिस्थितियों से निपटने के लिए सभी को एक साथ आने की जरूरत है।


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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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