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वैज्ञानिकों ने बताया: इस वेरिएंट के कारण दूसरी लहर में दिखी ज्यादा तबाही, जानिए इसपर कितनी कारगर हैं वैक्सीन?

Sat, 05 Jun 2021 02:32 PM IST
Abhilash Srivastava हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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कोरोना वायरस की दूसरी लहर में बढ़ा प्रकोप (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay
भारत में कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर का असर काफी बड़े स्तर पर देखने को मिला। पहली लहर की तुलना में, दूसरी लहर के दौरान वायरस की संक्रामकता और इसके कारण होने वाली मौतों के मामले भी काफी ज्यादा देखे गए। दूसरी लहर पर अब काफी हद तक काबू पा लिया गया है, लेकिन लोगों के मन में अब भी एक सवाल बना हुआ है कि कोरोना की यह लहर इतनी संक्रामक क्यों थी? इसी सवाल का जवाब जानने कि लिए विभिन्न भारतीय संस्थानों के वैज्ञानिकों की एक टीम ने अपने हालिया अध्ययन में इससे संबंधित बड़ा खुलासा किया है। वैज्ञानिकों ने बताया कि सबसे पहले भारत में पाया गया कोरोना का डेल्टा वेरियंट (बी.1.617.2), ब्रिटेन में पाए गए अल्फा वेरियंट (बी.1.1.7)  की तुलना में अधिक संक्रामक है। इतना ही नहीं कोरोना का डेल्टा वेरियंट ही भारत में आई दूसरी लहर और इससे हुई तबाही का प्रमुख माना जा सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने भी डेल्टा वेरियंट को 'वेरियंट ऑफ कंसर्न' यानी कि चिंता का कारक बताया है।
इस लेख में हम  डेल्टा वेरियंट के बारे में विस्तार से जानेंगे, साथ ही यह भी जानने की कोशिश करेंगे कि भारत में दी जा रही वैक्सीन, कोरोना के इस वेरियंट पर कितनी कारगर हैं?
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कोरोना वायरस का डेल्टा वेरियंट (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : pixabay
डेल्टा वेरिएंट का असर
भारत के तमाम वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन के निष्कर्ष में पाया गया है कि डेल्टा वेरियंट (बी.1.617.2) अन्य वेरियंट्स की तुलना में काफी अधिक संक्रामक हैं। अल्फा वेरियंट की तुलना में इसका ट्रांसमिशन भी 50 फीसदी से अधिक होने का अनुमान है। इसके अलावा अल्फा की तुलना में डेल्टा वेरियंट का वायरल लोड भी अधिक पाया गया है। डेटा के अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने पाया कि यह वेरियंट बहुत तेजी से संक्रमण और प्रकोप फैलाने की क्षमता रखता है।

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डेल्टा वेरियंट के बारे में कई वैज्ञानिकों ने किए शोध - फोटो : social media
संक्रमण पर काबू पाने के लिए और अधिक सतर्कता की जरूरत
नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल, इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (CSIR-IGIB), इंडियन सार्स-सीओवी-2 जीनोमिक कंसोर्टिया (INSACOG) और अन्य संस्थान के वैज्ञानिकों ने इस संबंध में अध्ययन किया। वैज्ञानिकों ने अध्ययन के निष्कर्ष के आधार पर बताया- इस वेरिएंट के प्रसार को रोकने के लिए प्रयोग में लाए जा रहे उपाय (जैसे पूर्व संक्रमण से बनी एंटीबॉडीज, उच्च सेरोपोसिटिविटी और आंशिक टीकाकरण) पर्याप्त नहीं हैं। इसके रोकथाम के लिए वैश्विक स्तर पर मजबूत व्यवस्था करने की आवश्यकता है। 

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विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 'वेरियंट ऑफ कंसर्न' बताया - फोटो : Social media
डब्ल्यूएचओ ने वेरिएंट को लेकर जताई चिंता
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने महामारी पर अपने साप्ताहिक अपडेट को दौरान डेल्टा वेरियंट (बी.1.617.2) को 'वेरियंट ऑफ कंसर्न' यानी कि चिंता का कारक बताया है। डब्ल्यूएचओ की तरफ से जारी बयान में कहा गया- यह स्पष्ट हो गया है कि वर्तमान में बड़ी संख्या में सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम इसी वेरियंट से संबंधित है। कोरोना के अन्य वेरियंट्स में इसकी तुलना में संचरण की रफ्तार कम देखी गई थी।
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डेल्टा वेरियंट को लेकर डब्ल्यूएचओ की चिंता - फोटो : social media
वियतनाम वेरिएंट भी डेल्टा का एक रूप
डब्ल्यूएचओ में कोविड-19 तकनीकी टीम के नेतृत्वकर्ता मारिया वान केरखोव ने संवाददाताओं को बताया- वियतनाम के स्वास्थ्य अधिकारियों ने एक नए हाइब्रिड कोरोना वेरिएंट के बारे में सूचित किया है, माना जा सकता है कि वह वेरियंट भी कोरोना के डेल्टा वेरियंट का एक रूप हो सकता है। अब तक के अध्ययनों के आधार पर हम समझ पा रहे हैं कि कोरोना के  स्पाइक प्रोटीन के स्थान में एक अतिरिक्त विलोपन के कारण डेल्टा वेरियंट के मामले सामने आए हैं।
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डेल्टा वेरियंट पर वैक्सीनों का प्रभाव - फोटो : Social media
इस चिंता पर भी गौर करें
इस बीच लैंसेंट जर्नल में छपी एक रिपोर्ट ने स्वास्थ्य संगठनों की चिंता और बढ़ा दिया है। इस रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने बताया है कि फाइजर वैक्सीन, डेल्टा वेरियंट के खिलाफ ज्यादा प्रभावी साबित नहीं हो रही है। वैज्ञानिकों ने बताया, कोरोना के मूल वेरियंट की तुलना में, फाइजर-बायोएनटेक वैक्सीन की दोनों डोज ले चुके लोगों में डेल्टा वेरिएंट के खिलाफ पांच गुना कम एंटीबॉडी देखे जा रहे हैं। वायरस को पहचानने और इसके खिलाफ लड़ने वाला एंटीबॉडी उम्रदराज लोगों में कम पाई जा रही है। इसके चलते डेल्टा वेरियंट के कारण होने वाले गंभीर संक्रमण को लेकर चिंता बनी हुई है।
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भारतीय वैक्सीन कितने कारगर? - फोटो : PTI
भारतीय वैक्सीन कितने प्रभावी?
अमर उजाला से बातचीत के दौरान नाम न छापने की शर्त पर वरिष्ठ स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि वैज्ञानिक रूप से देखें तो कोवैक्सीन को डेल्टा वेरियंट के खिलाफ ज्यादा असरदार माना जा सकता है क्योंकि इसमें निष्क्रिय वायरस को इंजेक्ट किया जाता है। भारत बायोटेक भी इस तरह का दावा करती रही है। वहीं कोविशील्ड में वायरस के स्पाइक प्रोटीन का प्रयोग किया जा रहा है। फिलहाल देश में डेल्टा वेरियंट के खिलाफ वैक्सीन के प्रभाव आधारित कोई अध्ययन नहीं है, ऐसे में कौन सी वैक्सीन डेल्टा वेरियंट पर ज्यादा प्रभावी है, इसका दावा नहीं किया जा सकता।

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स्रोत और संदर्भ: 
SARS-CoV-2 Variants of Concern and Variants of Interest
Neutralising antibody activity against SARS-CoV-2 VOCs B.1.617.2 and B.1.351 by BNT162b2 vaccination


अस्वीकरण नोट: यह लेख भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन के आधार पर तैयार किया गया है, फिलहाल यह अध्ययन अभी प्रकाशित नहीं हुआ है। इसके अलावा द लैंसेट जर्नल में छपी रिपोर्ट को भी इस लेख का आधार बनाया गया है।  लेख में शामिल सूचना व तथ्य आपकी जागरूकता और जानकारी बढ़ाने के लिए साझा किए गए हैं। इसमें बताई गई किसी भी दवा के उपयोग को लेकर अमर उजाला कोई दावा नहीं करता है।
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