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तस्वीरेंः कमजोर मानसून का जम्मू-कश्मीर पर असर, सर्दियों में हो सकती है यह बड़ी समस्या

Tue, 10 Sep 2019 04:39 PM IST
प्रशांत कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू/श्रीनगर
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कश्मीर का मौसम - फोटो : अमर उजाला
देश के विभिन्न हिस्सों में मानसून के कमजोर पड़ने का असर जम्मू-कश्मीर पर भी पड़ा है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार पर्याप्त बारिश न होने से कई क्षेत्रों पर इसकी मार पड़ सकती है। इसमें कृषि, भूजल आदि प्रभावित होंगे।

जम्मू-कश्मीर में जून के अंत या जुलाई के शुरू होने वाला मानसून सितंबर के मध्य तक सक्रिय रहता है। मौसम विज्ञान केंद्र श्रीनगर के अनुसार अगले एक हफ्ते तक मौसम में अधिक बदलाव नहीं आएगा। कुछ क्षेत्रों में ही हल्की बारिश का पूर्वानुमान है।
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कश्मीर का मौसम - फोटो : अमर उजाला
इस साल जम्मू और कश्मीर संभाग में सामान्य से कम बारिश हुई है। मौसम विशेषज्ञ यशपाल के अनुसार पर्याप्त बारिश न होने से सीजनल फसलों पर असर पड़ेगा। इसमें बीजाई के लिए पर्याप्त पानी जुटाना चुनौती होगा। इसके अलावा भूजल का स्तर गिरेगा, जिससे सर्दियों में पानी की किल्लत होगी।

 
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कश्मीर का मौसम - फोटो : अमर उजाला
बारिश न होने के कारण जल को संरक्षित नहीं किया गया है। इसी के चलते जम्मू में दिन का तापमान 34-35 डिग्री के बीच चल रहा है। दिन में आर्द्रता का प्रतिशत 60-80 के बीच रहने से उमस भी परेशान कर रही है। जम्मू-कश्मीर में मानसून आखिरी पड़ाव की ओर बढ़ रहा है। इस बार जम्मू-कश्मीर में मानसून गत 5 जुलाई को पहुंचा था।

 

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कश्मीर का मौसम - फोटो : अमर उजाला
जम्मू-कश्मीर में मानसून की दक्षिण पश्चिमी हवाएं बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से आती हैं। यह देश में केरल से दाखिल होकर धीरे-धीरे जम्मू-कश्मीर तक पहुंचती हैं। लेकिन यहां पहुंचकर इसे ईस्टर्ली विंड कहा जाता है। जे एंड के में पहुंचकर यह हवाएं आगे पाकिस्तान के साथ लगते इलाकों से होती हुई हिमालय में जाकर रुक जाती हैं।
 
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कश्मीर का मौसम - फोटो : अमर उजाला
मानसून के कमजोर पड़ने के तीन मुख्य कारण रहते हैं। इसमें मानसून की ईस्टर्ली विंड की सक्रियता को वेस्टर्न डिस्टर्बेंस कमजोर कर देते हैं। इसके साथ अगर मानसून की हवाएं कमजोर हैं तो वह जम्मू-कश्मीर के पहाड़ी क्षेत्र के ऊंचाई तक नहीं पहुंच पाती हैं। स्थानीय कारक से भी मानसून की हवाएं कई बार कमजोर हो जाती हैं।
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कश्मीर का मौसम - फोटो : File Photo
मानसून की हवाएं अपने साथ नमी लेकर चलती हैं। इसी तरह 15 सितंबर से केसपियन सी (समुद्र, सभी ईरान-इराक के पास), मेडिटेरेनियन सी और ब्लैक सी से वेस्टर्न डिस्टर्बेंस की हवाएं चलती हैं जो जे एंड के में वेस्टर्न डिस्टर्बेंस का काम करने के साथ मानसून की हवाओं से टकरा कर उन्हें वापस भेजती हैं।
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