डॉ. नितिन जोशी, एसोसिएट प्रोफेसर, आईआईटी, जम्मू
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सामान्य रूप से इसे जलवायु परिवर्तन से ही जोड़ा जा सकता है
डॉ. नितिन जोशी, एसोसिएट प्रोफेसर, आईआईटी, जम्मू
बादल फटने या अत्यधिक वर्षा की बढ़ती घटनाओं को सामान्य रूप से जलवायु परिवर्तन से जोड़ा जा सकता है। हिमालयी भू-भाग बेहद संवेदनशील है। जरूरी नहीं कि बादल फटना ही विनाशकारी साबित हो। कुछ दिन लगातार होने वाली बारिश भी मिट्टी की ढीली सतह और मलबे के साथ मिलकर फ्लैश फ्लड की वजह बन सकती है और कहर बरपा सकती है। बादल फटने के लिए एक मानक है। एक घंटे में एक निश्चित जगह अगर सौ मिलीमीटर से अधिक बारिश दर्ज की जाए तो उसे बादल फटना माना जाता है। करीब पांच वर्ष पूर्व डोडा जिले के ठाठरी में बादल फटने की घटना सामने आ चुकी है, लेकिन हां, इसके बाद बादल फटने की घटनाएं देखने में नहीं आई हैं। हाल-फिलहाल इनमें बढ़ोतरी दर्ज हुई है। लेकिन इसकी वजह क्या है या ऐसी घटनाओं का ट्रेंड क्यों बढ़ रहा है, इसके लिए मौसम विभाग के आंकड़ों का विश्लेषण करना होगा।