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Rajasthan: जयपुरवासियों को विरासत में मिला है पतंगबाजी का शौक, देखें 'गुलाबी नगरी' के पतंग की खूबसूरत तस्वीरें

Thu, 12 Jan 2023 02:07 PM IST
अरविंद कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर

सार

राजस्थान में पतंगबाजी का पुराना इतिहास है। 150 साल पहले यहां पतंगबाजी शुरू हुई थी। महाराजा राम सिंह द्वितीय को पतंगबाजी का ज्यादा शौक था। 
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पतंग बनाने वाले व्यापारी - फोटो : अमर उजाला
राजस्थान में पतंगबाजी का पुराना इतिहास है। 150 साल पहले यहां पतंगबाजी शुरू हुई थी। महाराजा राम सिंह द्वितीय को पतंगबाजी का ज्यादा शौक था। वह लखनऊ से पतंग लाए थे। वो ही बड़ी चर्खियों से जयपुर में आदमकद के तुक्कल उड़ाया करते थे। आजादी के पहले जयपुर में जलमहल और लालडूंगरी के मैदान में पतंगबाजी की प्रतियोगिता भी होती थी। जयपुर में मकर संक्रांति के मौके पर होने वाली पतंगबाजी पूरी दुनिया में फेमस है। यहां होने वाली पतंगबाजी की देश-दुनिया में खास पहचान है। जयपुर के बाजार रंग-बिरंगी पतंगों से दुल्हन की तरह सज गए हैं। पतंग बाजार में लोगों की भीड़ दिखाई दे रही है। जयपुर की मकर संक्रांति की सुबह से यहां की छतों पर पतंग कटने की आवाज गूंजने लगती हैं। जयपुर में पतंगबाजी का संबंध नवाबों के नगरी लखनऊ से जुड़ा है। पतंगबाजी का इतिहास करीब 150 साल पुराना बताया जाता है।
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पतंग पर बनाई गई कलाकृति - फोटो : अमर उजाला
इतिहासकारों के मुताबिक, जयपुर राजघराने के महाराजा सवाई जय सिंह के बेटे महाराजा राम सिंह द्वितीय (1835-1880 ई.) सबसे पहले यूपी की राजधानी लखनऊ से पतंग लेकर आए थे। लखनऊ से आई यह पतंग 'तुक्कल' थी, ये कपड़े से विशेष तरीके से बनती थी। तत्कालीन महाराजा राम सिंह द्वितीय पतंगबाजी के इतने शौकीन थे कि उन्होंने जयपुर रियासत में 36 कारखाने खोल लिए थे। इनमें पहला कारखाना पतंग का था, इस कारखाने को पतंगखाना नाम दिया गया था। महाराजा राम सिंह ने पतंगबाजों और पतंगकारों को अपने राज में जगह दी थी। तभी से गुलाबी नगरी के कई मोहल्लों में पतंग बनाने का कार्य शुरू हुआ। तितली के आकार की विशाल पतंगें 'तुक्कल' यहां बनाई जाने लगीं। महाराजा राम सिंह के जमाने से लखनऊ से पतंग बनाने वाले कारीगर और डोर सूतने वाले यहां आते थे।
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पतंग पर सिद्धू मूसेवाला की तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
पतंगों के लिए दीवानगी पूरे देश में देखी जाती है, परंतु जो दीवानापन जयपुर में पतंग उड़ाने को लेकर होता है, वो पूरी दुनिया में कहीं और नहीं हो सकता है। देश और विदेश से सैलानियों का जयपुर के काइट फेस्टिवल में पहुंचना और अपनी पतंगों की नुमाइश करना और उनको उड़ाना एक अलग ही सुखद अनुभव करवाता है। जयपुर के आराध्या देव श्री गोविंद देव जी को पतंग भेंटकर मकर संक्रांति के सात दिन पहेले से ही भजन और कीर्तन के साथ इस अलौकिक कार्यक्रम की विधिवत शुरूवात होती है।

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पतंग पर कलाकृति - फोटो : अमर उजाला
जयपुर के मूल निवासी गोविंद देव जी से ही अपने सभी कामों की शुरूआत करते हैं। गोविंद देव जी मंदिर के परिसर में गोविंद देव जी को पतंग उड़ाने के लिए लोक गीत गाकर मनुहार करते हैं। जयपुर में पतंग की दीवानगी महिलाओं और पुरुषों में एक जैसे ही नजर आती है और इस उत्सव में अपनी उम्र को भूलकर गोविंद देव के साथ पतंग उड़ाने के कमाना में जमकर नाच गाना होता है।
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पतंग पर पीएम मोदी की तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
रामजानकी नामक 80 साल की भक्त गोविंद देव को पतंग उड़ाने के लिए बुलाने में इतनी बेसुध हो गई कि अपनी उम्र भूलकर खुलकर नाची और उनका वीडियो वायरल हो गया। आसपास के लोग गा रहे है 'में पकड़ुगा चरखी, थे तो पतंग उड़ाओ जी।' जयपुर के भक्त अपने आराध्या को स्पेशल पतंग और चरखा अर्पित करते हैं। पतंग सूरत और अहमदाबाद से आती है। पतंग होल सेल के व्यापारी बताते हैं कि पतंग दो तरीके की चलन में है। एक कागज की और दूसरी प्लास्टिक की। कागज की पतंग की पूर्ति के किए जयपुर के कारीगर छह महीने पहले से ही पतंग बनाने के काम में जुट जाते हैं, जबकि प्लास्टिक की पतंग सूरत और अहमदाबाद से आती है। पतंग व्यापारी बताते हैं कि पतंग की कीमत 80 पैसे से शुरू होकर 50 रुपये तक जाती है। जो कि 20 पतंगों के सेट जिसको कोड़ी कहा जाता है।
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रामजानकी - फोटो : अमर उजाला
पतंग एसोसिएशन और इंडिया के फरमान अहमद पिछले कई दशकों से पतंग का कारोबार कर रहे हैं। अहमद बताते हैं कि पतंग उड़ाने के लिए जयपुरवासी किसी धर्म के मोहताज नहीं हैं। पूरा जयपुर 14 जनवरी का इंतजार करता है, जब सब अपनी छत से पतंग को आसमान की ऊचाइयां छूते देखते हैं और लालायित रहते हैं पतंग उड़ाने के लिए। फरमान अहमद कहते हैं कि जब पूरा जयपुर छत पर होता है तो हमारी भी इच्छा होती है कि छत पर पहुंचे और अपने जवानी के दिनों मैं लौट आएं। वहीं, व्यापारी संघ के मुकेश बताते हैं कि पतंगबाजी राजा महाराजा के जमाने से सभी मिलकर एक साथ बनाते आए हैं। इसमे कभी भी किसी ने भी कोई धर्म या जाति नहीं देखी, बस एक ही चीज जो सबसे जरूरी होती है वो है पतंग की ऊचाइयां और शाम होते हुए कितनी पतंग किसने काटी। 
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जयपुर के बाजार में उपलब्ध - फोटो : अमर उजाला
पतंगबाजी के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है, बढ़िया क्वालिटी का मांझा, जिसको बरेली और कानपुर से मंगवाया जाता है। यह भी राजाओं के समय से वहीं से आता रहा है। फरमान अहमद के अनुसार, मांझा कॉटन का बना होता है, जिस पर चावल का माठ चढ़ाया जाता है, अहमद बताते हैं कि एक गट्टा मांझा बनाने में चार से पांच कारीगरों को एक पूरा दिन लग जाता है। मांझा बनाने वालों के हाथ छील जाते हैं, इसको बनाते हुए। एक गट्टा मांझा 600 रुपये से 1000 रुपये तक मिलता है।

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रंग-बिरंगी पतंग - फोटो : अमर उजाला
जयपुर के सबसे बड़े पतंग विक्रेता फरमान अहमद का कहना है, चाइना ने सभी आइटम की कॉपी कर ली और सस्ता बना भी दिया। परंतु पतंग और मांझा हमारे देश से सस्ता नहीं बना पाया और न ही हमको इसमें टक्कर दे पाया है। चाइना मांझा पर भी फरमान अहमद ने अपना दर्द बयान किया और बताया कि यह कोई चाइना का मांझा नहीं है, यह अपने ही देश में बनता है। यह प्लास्टिक की महीन तार है, जिस पर लोहा चढ़ाया जाता है, जिसके कारण यह बहुत ही खतरनाक हो जाता है। कॉटन मांझा हाथ से टूट जाता है, जबकि प्लास्टिक या चाइना की डोर को काटना पड़ता है। यह जानलेवा है, यह पतंग उड़ाने वाले के भी लिए जान लेवा है। अगर कोई बिजली के तार से छू जाता है तो पतंगबाज की करंट से मौत भी हो सकती है।

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रंग-बिरंगी पतंग - फोटो : अमर उजाला
फरमान अहमद बताते हैं कि हम लोग एनजीटी तक जाकर इसको बैन करवाकर आए, लेकिन आज भी कुछ लोग थोड़ी कमाई के लालच में इसको बेचते हैं, जिसके कारण हजारों लोगों की जान खतरे में पड़ जाती है। फरमान अहमद ने सरकार से भी अनुरोध किया है कि राजस्थान में कानून बनाए कि जो भी इस प्रकार की हरकत करे, उसके घर पर बुलडोजर चलाया जाए। क्योंकि यह खुशियों का पर्व है मातम का नहीं।

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फरमान अहमद - फोटो : अमर उजाला
पतंगों के रंग, आकार और चित्र सभी पतंगबाजों के अनुसार और डिमांड के अनुरूप ही बनाई जाती है। बच्चों के लिए उनके प्रसिद्ध कार्टून पतंग पर उनको लुभाती है। कोई तिरंगा पसंद करता है, कोई मोदी की पतंग का दीवाना है। इस बार सिद्धू मूसेवाला के तस्वीर वाली पतंग की भी खूब धूम रही है। मकर संक्रांति पर अमूमन एक बड़ा व्यापारी सात से 10 लाख के बीच पतंगों को बेचता है। पतंग सिर्फ सुकून ही नहीं, ब्लकि रोजगार का भी एक बडा संसाधन बना हुआ है। करोड़ों रुपये की पतंग और मांझा एक दिन के उत्सव के लिए बिकता है।
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पतंग पर कलाकृति - फोटो : अमर उजाला
मकर संक्रांति पर जयपुर के हर घर की छत पर म्यूजिक सिस्टम और पूरा परिवार एक साथ छत पर मौजूद होता है। पूरे शहर में सिर्फ एक ही आवाज गूंज रही होती है 'वो काटा-वो काटा' हर साल पतंग लूटने और चाइना डोरी से पक्षी और लोगों ज़ख्मी भी होते हैं। सरकारी सख्ती से इनकी संख्या में कमी आई है। पतंगों के महाउत्सव को अंतरराष्ट्रीय दर्जा दिलवाने में जयपुर के गौरी शंकर सोनी का भी बड़ा योगदान है। गौरी शंकर सोनी के चरखे और उनकी डोरी पर की गई पेंटिंग पूरी दुनिया को आकर्षित करती है। इनकी नुमाइश को निहारने के लिए देश विदेश से सैलानियों का तांता लगता है।
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