रोशनी में न दिखने वाले चित्र
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प्रशांत ने बताया, आकृतियों के साकार रूप को निराकार करके उन्हें फिर से साकार करने की इस तकनीक की खोज की कहानी बड़ी रोचक रही। दरअसल, वो कुद बरसों पहले व्यक्ति के गले में थॉयरॉड ग्रंथी के पास मौजूद उसकी सहायक ग्रंथी पैराथॉयरॉड को आसानी से देख सकने में सक्षम मशीन बनाने की कोशिश में लगे हुए थे। ये ऐसी सूक्ष्म ग्रंथी है, जिसको देख पाना बड़ी मुश्किल काम होता है और अनुभवी चिकित्सक ही इस प्रक्रिया में सक्षम हो पाते हैं। थॉयरॉड ग्रंथी में प्रॉब्लम की शुरुआत इसी पैराथॉयरॉड ग्रंथी से होती है।
इस मशीन में काम में आने वाले कुछ लैंस काफी खोज के बाद भी नहीं मिले, इसी दौरान एक खबर आई कि इटली के चित्रकार सल्वेटोर ने केवल हवा में बनाए एक काल्पनिक मूर्ति शिल्प को लाखों में बेच दिया। सल्वेटोर का ये मूर्तिशिल्प अनूठी फंतासी मात्र था, जिसमें उन्होंने केवल हवा में बनाए एक काल्पनिक मूर्ति शिल्प को लाखों में बेच दिया। इस खबर से उन्हें भी ऐसी ही फंतासी करने की प्रेरणा मिली, क्योंकि चिकित्सा के क्षेत्र में उनके द्वारा की जा रही खोज इसके काफी करीब थी। इटली के मूर्तिकार का सृजन तो काल्पनिक था, लेकिन उनकी ये फंतासी व्यक्ति को अमूर्त से मूर्त की ओर ले जाती है। साथ ही हमेशा भौतिक रूप व्यक्ति के साथ ही रहती है।