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स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाली लक्ष्मीबाई, ये है उनके संघर्ष की दास्तान

Tue, 19 Jun 2018 09:44 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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 18 जून भारतीयों के लिए बहुत खास दिवस है। आज ही के दिन 1858 में देश की पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी जिसका नाम लेकर आज भी महिलाओं और बच्चियों में जोश भरा जाता है, वह वीरगति को प्राप्त हुई थीं। वह वीरांगना थी रानी लक्ष्मी बाई। रानी लक्ष्मीबाई देश की वो नायिका हैं जो वीरता की श्रेणी में सबसे ऊपर हैं और जब भी वीरता की बात चलती है सबसे पहले उनका जिक्र आता है। 
रानी लक्ष्मी बाई ग्वालियर में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ते हुए आज ही के दिन शहीद हुई थीं। उनके इस दिन को बलिदान दिवस के रूप में याद किया जाता है।  

 
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स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाली लक्ष्मीबाई बचपन से ही त्याग करती रहीं जिसके बाद वह फौलाद बन गई थीं। जिसकी वजह से बड़े से बड़ा निर्णय वह झट से ले लेती थीं। बनारस के करीब एक छोटे से गांव में पैदा हुई मणिकर्णिका बचपन से ही तेज तर्रार थीं। मां को चार साल की उम्र में ही खो चुकी मनु का लालन-पालन देश के योद्धा की तरह किया गया था। 18 साल की आयु में उनकी शादी कर दी गई। वह जल्द ही झांसी के शासक के रूप में उभरीं। उनके तेजतर्रार,हार न मानने वाली छवि के कारण उन्हें लक्ष्मीबाई कहा जाने लगा। 
गैलरी में लगा यह निमंत्रण पत्र मणिकर्णिका  और झांसी के महाराज की शादी का है। यह कार्ड आज भी भोपाल स्थित राज्य संग्राहलय में देखा जा सकता है। 

 
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उनके पति राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बहुत खराब रहता थी जिसके कारण उन्हें एक पुत्र गोद लिया। जिसका नाम दामोदर रखा।  लेकिन ब्रिटिश सरकार उनके दत्तक पुत्र को वारिस मानने से इनकार कर दिया उसके बाद लक्ष्मी ने अपने नवजात बेटे को कमर से बांध कर युद्ध के मैदान में उतरीं। उनकी वही छवि आज भी हर जगह देखने को मिलती है। उनकी इसी वीरांगना छवि को जनमानस तक पहुंचाने का काम किया कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने। उनकी कविता “खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी” ने आज भी बच्चे-बच्चों की जुबां पर है। 
 

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ब्रिटिश आर्मी के सीनियर अधिकारी कैप्टन ह्यूरोज ने रानी लक्ष्मी के साहस को देखकर उन्हें सुंदर और चतुर महिला कहा था। अंग्रेजों से युद्ध के दौरान रानी ने भी अपने घोड़े सहित किले से छलांग लगाई थी। 
जब वह मैदान में लड़ाई लड़ रहीं थी तब वह देश में एक ऐसा इतिहास रच रही थीं जिसे आज भी गाते हुए रोंगटे खड़े हो जाते हैं। खून खौल उठता है और सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। जिस दौड़ में महिलाएं पारंगत तो युद्ध की हर कला के लिए की जाती थीं लेकिन उन्हें सिर्फ महल की शोभा बना कर रखा जाता था इस दौड़ में रानी लक्ष्मी बाई ने महिला सशक्तिकरण की इबारत लिख दी थी। 



 
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रानी न केवल कुशल नेतृत्व करता थीं वहीं वह कूटनीति में भी माहिर थीं। उनके निर्णय को पूरा झांसी मानने लगा था यही वजह थी कमजोर पड़ते झांसी के नेतृत्व के बीच उन्हें अपना सेनापति घोषित किया। 

 इतिहासकार बताते हैं कि सैनिक झांसी के किले पर लक्ष्मीबाई के जयकारे लगाने लगे तो रानी ने उनका नेतृत्व करना स्वीकार किया और उसके बाद वह तब तक शांत नहीं बैठीं जब तक वह खुद शांत नहीं हो गईं। इतिहासकार बताते हैं कि रानी चाहती थीं कि अंग्रेजों से युद्ध न करना पड़े, ताकि झांसी की बेगुनाह जनता को इस लड़ाई की कीमत न चुकानी पड़े। रानी आखिरी दम तक राज्य को किसी भी तरह की त्रासदी से बचाना चाहती थीं। 

 
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लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों से लोहा लेते हुए उनसे किसी भी तरह के समझौते से इनकार किया और झांसी को वापस लेने की कसम खा ली। उन्हें कई बार देशद्रोहियों का सामना करना पड़ा, लेकिन वे डिगी नहीं और उन्हें टक्कर दी और हराया भी। अंग्रेजों के साथ युद्ध में उन्होंने बहुत बहादुरी से उनका मुकाबला किया, लेकिन अंग्रेजों की सेना बड़ी थी और लक्ष्मीबाई की छोटी इसलिए अंतत: उन्होंने झांसी के लिए खुद का बलिदान दिया।  
 
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