फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

हमारी राष्ट्रीय अस्मिता की प्रतीक 'हिंदी' किसी मंच की मोहताज नहीं

Fri, 21 Aug 2020 08:08 PM IST
मुकेश कुमार झा अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
विज्ञापन
1 of 10
हिंदी हैं हम - फोटो : अमर उजाला
कहते हैं न जो स्वभाव का मीठा हो, वो सबको अपना बना ही लेता है। यही खूबी हमारी मातृभाषा हिंदी में भी है, जो अपनी मिठास के कारण विश्व फलक के माथे की बिंदी बन रही है। सहजता और आत्मीयता से संवाद होने के कारण ही विश्व आज इसके सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक महत्त्व को भी समझ रहा है। अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से चलाए जा रहे 'हिंदी हैं हम' अभियान के अगले चरण में बुधवार को आयोजित वेबिनार में दुनिया के अलग-अलग देशों से लोगों ने हिस्सा लिया। वेबिनार में शामिल भारतीय परंपराओं के पोषक अतिथियों ने तय किया कि हम सभी अपनी हिंदी भाषा पर गर्व करेंगे, सम्मानित महसूस करेंगे, साथ ही हिंदी को भी सम्मान देंगे और दिलवाएंगे भी।
 
विज्ञापन

2 of 10
अर्चना पैन्यूली - फोटो : अमर उजाला
भाषा किसी मंच की मोहताज नहीं। साहित्य के क्षेत्र में युवाओं के लिए अपार संभावनाएं हैं, लेकिन युवा पीढ़ी का रुझान हिंदी भाषा की तरफ दिनोंदिन कम होता दिख रहा है। दुनिया में हमारी हिंदी का बढ़ता महत्व हमें गौरवान्वित भी कर रहा है। हिंदी सिर्फ एक भाषा ही नहीं है, वो हमारी संस्कृति और परंपराओं की संवाहिका भी है।
- अर्चना पैन्यूली, विख्यात प्रवासी साहित्यकार, डेनमार्क
 
विज्ञापन

3 of 10
चैतन्य कौशिक - फोटो : अमर उजाला
मेरा हिंदी से सरोकार आज सिर्फ माता-पिता से बातचीत करने तक ही सीमित है। ये जानकर मुझे बहुत खुशी हुई है कि नई शिक्षा नीति में मातृभाषा को सम्मान देने की शुरुआत की गई  है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसे लागू कर पाना बहुत बड़ी बात है। अपनी जड़ को मजबूत करने के लिए हमें अपनी प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में ही करनी चाहिए।
- चैतन्य कौशिक, उद्यमी, स्वीडन

4 of 10
धनदेव भगेलू - फोटो : अमर उजाला
हिंदी हमारी राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक है, सांस्कृतिक और सामाजिक संरचना की वाहिका और दूत भी है। बीते समय में हिंदी को वह सम्मान नहीं मिल पाया, जो उसे मिलना चाहिए था। हिंदी प्रतीकात्मक राजभाषा बनकर रह गई है। हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए हम यहां पर अपनी तरफ से भरपूर कोशिश कर रहे हैं और लोगों को भी हिंदी सिखा रहे हैं।
- धनदेव भगेलू, व्यवसायी, हॉलैंड
विज्ञापन

5 of 10
मुदित पंत - फोटो : अमर उजाला
हिंदी हमारे भावनाओं की भाषा, हमारी पहचान है। अपनी भाषा की महत्वता का अहसास बाहर जाकर अधिक होता है। अब मैं ज्यादातर हिंदी भाषा में ही संवाद करना पसंद करता हूं। हिंदी भाषा में लोगों को अवसर नहीं मिल पाने की वजह से कई प्रतिभावान बच्चे आगे नहीं बढ़ पाते हैं। मुझे लगता है कि अपनी भाषा को लेकर हमें गंभीर होना चाहिए।
- मुदित पंत, वित्तीय जोखिम सलाहकार, न्यूयॉर्क
विज्ञापन

6 of 10
राहुल गुप्ता - फोटो : अमर उजाला
हिंदी भाषा में जो अपनापन महसूस होता है वो किसी दूसरी भाषा में नहीं। यूं तो भाषा के लिहाज से हर भाषा का सम्मान है, लेकिन मातृभाषा का स्थान और कोई भाषा नहीं ले सकती। हिंदी भाषा का जुगाड़ शब्द इतना प्रचलित हुआ कि ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने उसे शामिल किया। एकीकृत होने के लिए हमें अपनी संस्कृति, सभ्यता और परंपराओं को समझना होगा।
- राहुल गुप्ता, व्यवसायी, नीदरलैंड
विज्ञापन

7 of 10
रजनीश वाजपेई - फोटो : अमर उजाला
परदेस में रहते हुए भी हम हिंदी भाषा के जरिए ही सांस्कृतिक जुड़ाव महसूस करते हैं। युवाओं को इस दिशा में प्रेरित करने की आवश्यकता है, वो बहुत बेहतर कर सकते हैं। अवसर न मिलने के कारण वो पीछे रह जाते हैं। भाषा एक संवाद का माध्यम है, जो हमारे आस-पास के वातावरण, इच्छाशक्ति और मानसिकता पर निर्भर करता है।
- रजनीश वाजपेई, सामाजिक उद्यमी, अमेरिका

8 of 10
रुफिना - फोटो : अमर उजाला
हिंदी को लेकर लोगों की अलग-अलग मान्यताएं हैं। लेकिन हिंदी के महत्त्व को पूरी दुनिया मानती है। पिछले कुछ दशकों में हिंदी रोजगार की भाषा भी बनी है। साहित्य के क्षेत्र में अवसर तो हैं ही साथ ही तकनीकी युग में भी हिंदी भाषा के लिए अपार संभावनाएं है। लेकिन अभी इस दिशा में बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
- रुफिना, समाज सेविका, सऊदी अरब

9 of 10
गौरव सिंह - फोटो : अमर उजाला
हिंदी मेरे लिए भाव और भावनाओं की भाषा है। स्थानीय संस्कृति में समरस होकर भी हम अपनी मातृभाषा, संस्कृति और परंपराओं से जुड़े रहते हैं। दूसरे देशों के लोग मातृभाषा को लेकर खासा सम्मानित महसूस करते हैं, यह भाव हमें अपने देश के लोगों में भी जागृत करना होगा।
- गौरव सिंह, दूरसंचार कंपनी- वरिष्ठ उत्पाद प्रबंधक, बेल्जियम
विज्ञापन

10 of 10
विपुल पाण्डेय - फोटो : अमर उजाला
हिंदी भाषा को लेकर लोगों में हीनभावना देखने को मिलती है। तकनीकी ने भी हिंदी को आगे बढ़ाने में अपना योगदान देना शुरू कर दिया है, लेकिन हमें भी जमीनी स्तर पर अपने देश में हिंदी भाषा को बढ़ावा देने के लिए जोर देना होगा। शुरुआत हमें अपने घर से करनी होगी और उच्च-स्तरीय शिक्षा में भी हमें अपनी मातृभाषा के महत्त्व को शामिल करना होगा, उसके बाद ही बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा।
- विपुल पाण्डेय, सॉफ्टवेयर इंजीनियर, कैलीफोर्निया
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें