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अमर उजाला संवाद: विशेषज्ञ बोले- लोगों के जीवन की कीमत पर न हो विकास, आपदा का आना तय, खुद को तैयार करना होगा

Mon, 24 Aug 2026 10:39 PM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।

सार

अमर उजाला शिमला के 26 अगस्त को होने वाले स्थापना दिवस के अवसर पर अमर उजाला कार्यालय शिमला में जलवायु परिवर्तन-पर्यावरण एवं हम विषय पर हुए संवाद में विशेषज्ञों ने कहा कि विकास जरूरी है, लेकिन इसकी कीमत लोगों के जीवन, जंगलों, जल स्रोतों, ग्लेशियरों और जैव विविधता को नुकसान पहुंचाकर नहीं चुकाई जा सकती।
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अमर उजाला कार्यालय शिमला में जलवायु परिवर्तन-पर्यावरण एवं हम विषय पर हुआ संवाद। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
हिमाचल में तेजी से बदलते पर्यावरणीय परिदृश्य और जलवायु परिवर्तन से पैदा हो रही चुनौतियों को लेकर विशेषज्ञों ने गंभीर चिंता जताई है। अमर उजाला शिमला के 26 अगस्त को होने वाले स्थापना दिवस के अवसर पर अमर उजाला कार्यालय शिमला में जलवायु परिवर्तन-पर्यावरण एवं हम विषय पर हुए संवाद में विशेषज्ञों ने कहा कि विकास जरूरी है, लेकिन इसकी कीमत लोगों के जीवन, जंगलों, जल स्रोतों, ग्लेशियरों और जैव विविधता को नुकसान पहुंचाकर नहीं चुकाई जा सकती। रिपोर्ट बता रही हैं कि आपदा का आना तय है, इसके लिए हमें खुद को तैयार करना होगा। व्यक्तिगत प्रयासों से आगे बढ़कर अब सरकारों को इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी।
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टिकेंद्र सिंह पंवर। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
ई-व्हीकल और पौधरोपण से आगे बड़े कदम उठाने की जरूरत: टिकेंद्र सिंह पंवर
पर्यावरण विशेषज्ञ एवं शिमला के पूर्व उप महापौर टिकेंद्र सिंह पंवर ने कहा कि आईपीसीसी-6 की रिपोर्ट के अनुसार आपदा का आना तय है। 1994 के बाद पैदा हुआ हर बच्चा औसतन दो साल में एक आपदा देख रहा है, जो बदलते हालात की गंभीरता को दर्शाता है। लेकिन हम इसके लिए तैयार हैं। इस खतरे के मद्देनजर हमें हर क्षेत्र में कदम उठाने होंगे। संवेदनशील क्षेत्रों को नो कंस्ट्रक्शन जोन घोषित करना समय की मांग है। लेकिन इसके लिए सरकारों को आगे आना होगा। ई-व्हीकल और पौधरोपण से आगे बढ़कर अब बड़े कदम उठाने की जरूरत है।
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अधिवक्ता देवेंद्र खन्ना। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
आपस में संवाद करती हैं वनस्पतियां, जहर न छिड़कें: देवेंद्र खन्ना 
पर्यावरण संरक्षण के लिए लड़ रहे अधिवक्ता देवेंद्र खन्ना ने अभयारण्यों और कोर क्षेत्र को डिनोटिफाई करने तथा जंगलों के व्यावसायिक इस्तेमाल पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि लोगों के जीवन की कीमत पर विकास नहीं होना चाहिए। पर्यावरणीय आकलन के बिना उद्योगों और बिजली परियोजनाओं को लगाना सही नहीं है। हर्बीसाइड्स के छिड़काव को पूरे वन तंत्र के लिए खतरा बताते हुए उन्होंने कहा कि वनस्पतियां आपस में संवाद करती हैं और एक-दूसरे को पोषक तत्व पहुंचाती हैं। इन पर जहर छिड़कना घातक है।

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पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. एसएस रंधावा। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
ग्लेशियरों के पिघलने से पहाड़ों पर बनीं झीलें खतरा: डॉ. एसएस रंधावा
पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. एसएस रंधावा ने कहा कि पिछले तीन दशकों में हिमाचल प्रदेश में बड़े ग्लेशियरों की संख्या कम हुई है, जबकि उनसे टूटकर बने छोटे ग्लेशियरों के पिघलने से पहाड़ों पर हजारों झीलें बन गई हैं। इनके टूटने पर प्रदेश में बड़ी तबाही हो सकती है। जलवायु परिवर्तन से शिमला समेत हिमाचल में बारिश-बर्फबारी का पैटर्न भी बदल रहा है। उन्होंने कहा कि सीमाओं पर सुरक्षा बढ़ाई गई है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे के बीच अब हम अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं हैं।
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पूर्व आईएएस अधिकारी बीएम नांटा। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
जड़ी-बूटियों का अवैध दोहन बिगाड़ रहा पारिस्थितिकी: बीएम नांटा
पूर्व आईएएस अधिकारी और चूड़धार मंदिर कमेटी के अध्यक्ष बीएम नांटा ने कहा कि बचपन में दिखाई देने वाली कई तितलियां और औषधीय पौधे अब लुप्त हैं। चूड़धार का उदाहरण देते हुए कहा कहा कि यहां एक पर्व पर 8 से 10 हजार लोग पहुंच रहे हैं और जगह-जगह प्लास्टिक की बोतलें फेंकी जा रही हैं। ऐसे तमाम क्षेत्रों में जड़ी-बूटियों का अवैध दोहन भी पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव बढ़ा रहा है। उन्होंने पहाड़ में रोपवे को कनेक्टिविटी का एक पर्यावरण मित्र विकल्प बताया।
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पूर्व एचएएस अधिकारी डीके मांटा। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
हर जगह ढांचे बने तो जमीन नहीं बचेगी: डीके मांटा
पूर्व एचएएस अधिकारी डीके मांटा ने कहा कि हिमाचल प्रदेश में केवल करीब 11 प्रतिशत क्षेत्र ही कृषि योग्य है। ऐसे में यदि कृषि भूमि पर भी लगातार परियोजनाओं के नाम पर ढांचे विकसित किए जाते रहे तो भविष्य में खेती के लिए जमीन नहीं बचेगी। पर्यावरण की कीमत पर विकास उचित नहीं है। वन महोत्सव तो मनाए जाते हैं, लेकिन कितने पौधे वास्तव में जीवित रहे, इसका कोई रिकॉर्ड नहीं है। हरित आवरण को बढ़ाने की जरूरत है।
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स्वास्थ्य विभाग में सेवानिवृत्त उप निदेशक डॉ. रमेश चंद। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
प्रदूषण बढ़ा तो दमा के मरीज भी बढ़े: डॉ. रमेश चंद
स्वास्थ्य विभाग में सेवानिवृत्त उप निदेशक डॉ. रमेश चंद ने कहा कि अस्पतालों में खांसी, दमा और सीओपीडी के मरीज बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं। इसका प्रमुख कारण वायु प्रदूषण है। उन्होंने अश्वनी खड्ड में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से दूषित पानी के रिसाव की घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि जल प्रदूषण लोगों के बीमार होने का बड़ा कारण है। प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर व्यवहारिक कार्रवाई करना जरूरी है। सिर्फ सर्टिफिकेट देखने से काम नहीं चलेगा।

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साहित्यकार डॉ. त्रिलोक सूर्यवंशी। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
सूर्यवंशी ने सुनाई ‘धौलाधार की ये पुकार’ कविता
साहित्यकार डॉ. त्रिलोक सूर्यवंशी ने संवाद के दौरान कांगड़ी में अपनी कविता ‘धौलाधार की ये पुकार’ सुनाई। उन्होंने कहा कि परंपरा से हम मानते हैं कि धरती हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या हम उसके साथ सही व्यवहार कर रहे हैं। उन्होंने पेड़ों की कटाई और बढ़ते प्रदूषण पर चिंता जताते हुए पर्यावरण संरक्षण के लिए जीवनशैली में बदलाव की जरूरत बताई।

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समाजशास्त्री डॉ. रुचि रमेश। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
‘घोस्ट विलेज’ दिखा रहे बदले समाज की तस्वीर: डॉ. रुचि रमेश 
समाजशास्त्री डॉ. रुचि रमेश ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण में प्रत्येक व्यक्ति को योगदान देना होगा। उन्होंने कहा कि बड़े पैमाने पर हो रहा माइग्रेशन भी पर्यावरणीय बदलाव से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा हैं। ‘घोस्ट विलेज’ के रूप में इसकी एक सामाजिक तस्वीर सामने आती है। उन्होंने सामाजिक-सांस्कृतिक ढांचे को मजबूत करने और पारंपरिक वास्तुकला को बढ़ावा देने की बात की।

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हाइड्रो इंजीनियर आरएल जस्टा। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
पर्यटन, पर्यावरण और जल विद्युत दोहन में संतुलन जरूरत: आरएल जस्टा
हाइड्रो इंजीनियर आरएल जस्टा ने कहा कि हिमाचल में पर्यटन, पर्यावरण और जल विद्युत दोहन के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। उन्होंने अवय शुक्ला समिति की सात हजार फीट से अधिक ऊंचाई और ट्री लाइन से ऊपर बिजली परियोजनाएं नहीं लगाने की सिफारिश लागू करने को कहा। उन्होंने नॉर्वे और स्वीडन की तर्ज पर जलविद्युत दोहन क्षमता के 20 प्रतिशत क्षेत्र को स्थायी रूप से संरक्षित रखने की बात कही।

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सीपीआरआई के सामाजिक विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. आलोक कुमार। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
आलू की पैदावार घटने की आशंका: डॉ. आलोक कुमार
सीपीआरआई के सामाजिक विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. आलोक कुमार ने कहा कि बढ़ते तापमान का असर आलू की फसल की गुणवत्ता और उत्पादकता पर पड़ रहा है। आने वाले समय में तापमान में और वृद्धि हुई तो आलू उत्पादन में बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है। उन्होंने कहा कि कुफरी में विकसित आलू की 78 किस्में देशभर में दी गई हैं पर आलू की फसल के लिए एक निश्चित तापमान जरूरी होता है जो चुनौती होगा।
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शिवा प्रोजेक्ट के पूर्व परियोजना निदेशक डॉ. देवेंद्र सिंह ठाकुर। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
बागवानों को अपना नजरिया बदलना होगा: डॉ. देवेंद्र सिंह ठाकुर
बागवानी विभाग के शिवा प्रोजेक्ट के पूर्व परियोजना निदेशक डॉ. देवेंद्र सिंह ठाकुर ने कहा कि हिमाचल प्रदेश में सेब और टेंपरेट (शीतोषण)) फलों पर जलवायु परिवर्तन का बड़ा प्रभाव पड़ा है। पिछले 10-15 वर्षों से फलों की किस्मों में बदलाव किया जा रहा है, जिससे बदलती जलवायु के अनुरूप बागवानी को ढाला जा सके। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए बागवानों को अपना नजरिया बदलना होगा और नई तकनीक तथा जलवायु अनुकूल तकनीकों को अपनाकर आगे बढ़ना होगा।
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