2026 Independence Day of India: भारत की आजादी की लड़ाई का इतिहास केवल दिल्ली, मुंबई, कोलकाता या पंजाब तक सीमित नहीं है। हिमालय की गोद में बसे हिमाचल प्रदेश ने भी स्वतंत्रता संग्राम में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। यहां के वीरों ने अंग्रेजी हुकूमत और रियासती दमन के खिलाफ संघर्ष का बिगुल फूंका और देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रदेश उन महान सपूतों को याद कर रहा है, जिनके साहस और बलिदान ने राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा दी।
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वजीर राम सिंह पठानिया(फाइल)।
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
वजीर राम सिंह पठानिया
भारत की आजादी की लड़ाई का इतिहास केवल दिल्ली, मुंबई, कोलकाता या पंजाब तक सीमित नहीं है। हिमालय की गोद में बसे हिमाचल प्रदेश ने भी स्वतंत्रता संग्राम में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। यहां के वीरों ने अंग्रेजी हुकूमत और रियासती दमन के खिलाफ संघर्ष का बिगुल फूंका और देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।हिमाचल के स्वतंत्रता संग्राम का जिक्र वजीर राम सिंह पठानिया के बिना अधूरा है। नूरपुर रियासत के वीर सेनानी राम सिंह पठानिया को अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह का अग्रदूत माना जाता है। वर्ष 1848-49 में उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया और नूरपुर किले पर कब्जा कर स्वतंत्र शासन की घोषणा तक कर दी। राम सिंह पठानिया ने स्थानीय राजाओं और जनता को संगठित कर अंग्रेजों को चुनौती दी। हालांकि अंग्रेजों ने इस विद्रोह को दबा दिया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया, लेकिन उनका संघर्ष 1857 की क्रांति से पहले अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ उठी सबसे बड़ी आवाजों में गिना जाता है। इतिहासकार उन्हें उत्तर भारत में औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध प्रारंभिक क्रांतिकारियों में शामिल करते हैं।
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बाबा कांशी राम।
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बाबा कांशी राम
कांगड़ा के पहाड़ी गांधी यानी बाबा कांशी राम को पहाड़ी गांधी के नाम से जाना जाता है। जलियांवाला बाग हत्याकांड से व्यथित होकर उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ आजीवन संघर्ष का संकल्प लिया। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि भारत के स्वतंत्र होने तक सफेद कपड़े नहीं पहनेंगे और जीवनभर काले वस्त्र धारण किए।
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भाई हिरदा राम।
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भाई हिरदा राम
मंडी के भाई हिरदा राम गदर आंदोलन से जुड़े प्रमुख क्रांतिकारियों में थे। उन्होंने अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकने के लिए क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया। गिरफ्तारी और कठोर यातनाओं के बावजूद उनका हौसला नहीं टूटा। स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान को आज भी सम्मान के साथ याद किया जाता है।
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रानी खैरगढ़ी।
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रानी खैरगढ़ी
मंडी रियासत की रानी खैरगढ़ी ने स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों को संरक्षण दिया। उन्होंने अंग्रेज विरोधी गतिविधियों का खुलकर समर्थन किया और जनता के अधिकारों के लिए आवाज उठाई। महिलाओं की भागीदारी के प्रतीक के रूप में उनका नाम आज भी सम्मान से लिया जाता है।
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हिमाचल निर्माता डॉ. वाईएस परमार।
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डॉ. वाईएस परमार
डॉ. यशवंत सिंह परमार ने स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ पहाड़ी क्षेत्रों को एकजुट कर आधुनिक हिमाचल प्रदेश के निर्माण में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। उन्हें हिमाचल प्रदेश का शिल्पकार और प्रथम मुख्यमंत्री माना जाता है।
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दौलतराम सांख्यायन
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दौलतराम सांख्यायन
बिलासपुर के दौलतराम सांख्यायन ने प्रजामंडल आंदोलन के माध्यम से जनता के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। उन्होंने रियासती शासन के खिलाफ जनआंदोलन खड़ा कर लोकतांत्रिक व्यवस्था की मांग को मजबूत किया।
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सत्यदेव बुशहरी।
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सत्यदेव बुशहरी
शिमला के सत्यदेव बुशहरी ने बुशहर रियासत में प्रजामंडल आंदोलन का नेतृत्व किया। उन्होंने जनता को लोकतांत्रिक अधिकार दिलाने और रियासती दमन के खिलाफ संगठित करने में अहम भूमिका निभाई। कई बार जेल जाने के बावजूद उन्होंने संघर्ष जारी रखा।
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स्वामी कृष्णानंद ।
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स्वामी कृष्णानंद
स्वामी कृष्णानंद का जीवन मंडी के स्वतंत्रता आंदोलन की महत्वपूर्ण कड़ी रहा। उनका नाम हरदेव बताया जाता है। गदर आंदोलन के प्रभाव में मंडी में क्रांतिकारी गतिविधियां तेज हुईं और कृष्णानंद भी इससे जुड़े। मंडी षड्यंत्र 1914-15 में गदर पार्टी के प्रभाव में सामने आया था। इस दौरान मंडी और सुकेत में बैठकें हुईं तथा अंग्रेजी शासन के खिलाफ बड़े कदम उठाने की योजना बनी।।
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पं. गौरी प्रसाद ।
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पं. गौरी प्रसाद
प्रजामंडल के दौर में पंडित गौरी प्रसाद का नाम भी क्रांतिकारी चेहरों में शामिल रहा। लाहौर में पढ़ाई के दौरान उन्होंने क्रांति का झंडा बुलंद किया था। मंडी रियासत लौटने पर उन्होंने प्रजामंडल का झंडा उठाया। प्रधान रहते हुए पंडित गौरी प्रसाद ने रियासती शासन के खिलाफ आंदोलन किया। रत्ती गोलीकांड में उन्हें छह माह के कारावास की सजा हुई थी।
भागमल सोहटा
रजवाड़ा शाही के चंगुल से जनता को छुटकारा दिलाने की दिशा प्रजामंडल के सदस्य भागमल सोहटा ने दिखाई थी। शिमला के धामी के पास एक छोटी सी रियासत थी। 1937 में यहां का जनसमूह प्रेम प्रचारिणी सभा के नाम से जाना जाता था। सीताराम के नेतृत्व में लोगों ने बेगार प्रथा के विरुद्ध लगान में कमी और धामी प्रजामंडल को मान्यता के लिए आवाज उठाई।