आरक्षण का गणित बदलते ही सैकड़ों की संख्या में प्रधानी के दावेदारों के तेवर भी बदल गए। कोई खामोशी से घर बैठ गया तो, जो दिल्ली-मुंबई से काम छोड़ किस्मत आजमाने गांव आए थे, वे लौटने लगे। अचानक कई पंचायतों में दावतों का दौर बंद हो गया। दावेदार से मोटे चंदे की आस में गांव-गांव हो रही खेल प्रतियोगिताएं भी कम हो गईं। कई दावेदार वोटरों को लुभाने में किए गए खर्च का हिसाब लगा रहे हैं। जनता को भनक लगी, तो कई के घर सुबह से जुटने वाली भीड़ अचानक लापता हो गई। वहीं, कुछ चुनाव में खुद को ताल ठोंक पाने से वंचित होता देख डमी प्रत्याशी की तलाश में जुट गए हैं। किसी ऐसे की तलाश की जा रही है, जिसकी उस बिरादरी में थोड़ी बहुत पहचान भी हो और जिस पर चुनाव में रुपये खर्च कर पांच साल तक के लिए उसकी निष्ठा व ईमानदारी पर दांव खेला जा सके।