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राहत की खबर: कोरोना से ठीक हो चुके मरीजों के फेफड़ों के दाग खुद हो रहे 'बेदाग', डॉक्टर बोले- इसपर शोध की जरूरत

Mon, 23 Aug 2021 05:57 PM IST
vivek shukla अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
कोरोना की दूसरी लहर में संक्रमण का शिकार हुए लोगों के फेफड़ों के दाग खुद ही बेदाग हो जा रहे हैं। संक्रमण से ठीक हो चुके लोगों के लिए यह राहत भरी खबर है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बड़ा बदलाव है। 60 से 70 प्रतिशत मरीजों के छाती में बने दाग बिना दवाओं के ही खत्म हो जा रहे हैं। केवल 10 प्रतिशत मरीजों को ही दवाई खानी पड़ रही हैं। बीआरडी मेडिकल कॉलेज में इस तरह के प्रतिदिन 50 से 60 मरीज चेस्ट विभाग की ओपीडी में आ रहे हैं।

बीआरडी में चेस्ट विभागाध्यक्ष डॉ अश्वनी मिश्रा ने बताया कि संक्रमण से ठीक हो चुके लोगों के फेफड़ों में दाग का रहना आम बात थी। इसे साइंस की भाषा में फाइब्रोसिस कहते हैं। पहली लहर के शिकार हुए लोगों के दाग ठीक होने में छह से आठ माह का समय लग गया था। लेकिन, दूसरी लहर में जिस तेजी से संक्रमण का असर हुआ, उतनी ही तेजी से उनके फेफड़े रिकवर भी हुए। आगे की स्लाइड्स में पढ़ें पूरी खबर...

 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
ओपीडी में आने वाले मरीजों में 60 से 70 मरीज प्रतिदिन ऐसे आ रहे हैं, जिनके फेफड़ों में संक्रमण के दौरान बड़े दाग उभरकर सामने आए थे। चेस्ट सीटी स्कैन में फाइब्रोसिस की समस्या थी, लेकिन महज एक से डेढ़ माह के अंदर यह दाग बिना दवाओं के इस्तेमाल के ही खत्म हो गए। इस पर जब मरीजों से जानकारी ली गई तो पता चला कि मरीजों ने एक भी दवा नहीं ली है। केवल बेहतर खान-पान और व्यायाम किया है।

 
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डॉ. अश्वनी मिश्रा। - फोटो : अमर उजाला।
ठीक होने में लगे सात से आठ महीने
डॉ. अश्वनी मिश्रा ने बताया कि पहली लहर में संक्रमण का शिकार हुए लोग ठीक होने के बाद फेफड़ों की समस्या लेकर सात से आठ महीने तक लगातार आते रहे हैं। इन्हें फाइब्रोसिस की समस्या भी छह से सात माह तक परेशान करती रही है।

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कोरोना वायरस। - फोटो : अमर उजाला
लगातार मरीजों को दवाई खानी पड़ी है, जबकि दूसरी लहर में संक्रमण की दर सबसे अधिक थी। फिर भी मरीजों के फेफड़े को ठीक होने में कम समय लगा है। हालांकि, दूसरी लहर में 25 से 30 मरीज ऐसे भी मिले हैं जिनके फेफड़े बदलने तक की नौबत तक आ चुकी है, जबकि पहली लहर में ऐसे मरीज नहीं मिले थे।
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कोरोना वायरस की जांच - फोटो : Amar Ujala
पांच प्रतिशत मरीजों को देनी पड़ी है दवा
पांच प्रतिशत मरीजों को खून पतला करने वाली दवा देनी पड़ी है। इसके अलावा फाइब्रोसिस में चलने वाली दवाई भी केवल पांच प्रतिशत मरीजों को दी गई है। बाकी 60 से 70 प्रतिशत मरीज बिना दवाओं के ही ठीक हो गए हैं। इन मरीजों के चेस्ट सीटी स्कैन में फाइब्रोसिस की समस्या एक से डेढ़ माह बाद खुद ही खत्म हो गई है।
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