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Sankashti Chaturthi: जानिए कब है संकष्टी चतुर्थी व्रत? मुहूर्त, पूजन विधि, यहां पढ़ें पूरी जानकारी

Sat, 30 Jan 2021 10:30 AM IST
vivek shukla अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
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Sankashti Chaturthi - फोटो : Pixabay
संकटों का नाश करने वाले गणेश संकष्टी चतुर्थी व्रत का पर्व रविवार को मनाया जाएगा। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक रविवार को माघ कृष्ण तृतीया तिथि का मान रात्रि नौ बजकर 40 मिनट तक पश्चात चतुर्थी तिथि है। इस दिन पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र, शोभन योग और छत्र नामक महाऔदायिक योग भी है। जो अत्यंत फलदायी होता है। इस दिन चंद्रोदय रात को आठ बजकर 20 मिनट पर हो रहा है। दूसरे दिन एक फरवरी को शाम चतुर्थी तिथि सात बजकर 57 मिनट पर समाप्त हो जा रहा है। इस दिन चंद्रोदय के समय पंचमी तिथि होने से पूर्व दिन अर्थात 31 जनवरी को ही संकष्टी चतुर्थी व्रत किया जाएगा।
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Sankashti Chaturthi - फोटो : Pixabay
व्रत का महत्व
पंडित देवेंद्र प्रताप मिश्र के अनुसार, भविष्यपुराण में ऐसा कहा गया है कि जब-जब मनुष्य भारी संकट में हो, संकटों और मुसीबतों से घिरा महसूस करें या निकट भविष्य में किसी अनिष्ट की आशंका हो तो उसे संकष्टी चतुर्थी का व्रत करना चाहिए। इससे इस लोक और परलोक में सुख मिलता है। इस व्रत को करने से व्रती के समस्त कष्ट दूर हो जाते है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस व्रत को करने से विद्यार्थी को विद्या और रोगी को आरोग्यता की प्राप्ति भी होती है।
 
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Sankashti Chaturthi - फोटो : Pixabay
गणेश चतुर्थी पूजन विधि
पंडित राकेश पांडेय के अनुसार, सुबह स्नान के पश्चात व्रत का संकल्प करके दिन भर गणेशजी का स्मरण एवं भजन करें। चंद्रोदय होने से पूर्व गणेश मूर्ति या सुपाड़ी के द्वारा निर्मित सांकेतिक गणेश देवता को चौकी या पीढ़े पर स्थापित करें। इसके बाद षोडशोपचार विधि से भक्तिभाव से पूजन संपन्न करें। पुन: मोदक और गुड़ में बने हुए तिल के लड्डू का निवेश अर्पित करें। आचमन कराकर प्रदक्षिणा और नमस्कार करके पुष्पांजलि अर्पित करें। चंद्रोदय होने पर चंद्रमा को विशेषार्घ्य प्रदान करें।
 
 

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Sankashti Chaturthi - फोटो : Pixabay
अर्घ्य अर्पित करने की विधि
पंडित शरद चंद्र मिश्र के अनुसार, तिथि की अधिष्ठात्री देवी तथा रोहिणीपति चंद्रमा को कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को गणेश-पूजन के पश्चात अर्घ्य प्रदान करना चाहिए। गणेश पुराण के अनुसार, चंद्रोदय काल में गणेश के लिए तीन, तिथि के लिए तीन और चंद्रमा के लिए सात अर्घ्य प्रदान करना चाहिए। इस व्रत में तृतीया तिथि से युक्त चतुर्थी तिथि ग्राह्य है। तृतीया के स्वामी गौरी माता और चतुर्थी के स्वामी श्रीगणेश जी हैं।

 
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Sankashti Chaturthi - फोटो : Pixabay
(चतुर्थी यदि पंचमी से युक्त है तो वह अग्राह्य है, क्योंकि पंचमी के स्वामी सर्प या नाग देवता है। गणेश और नागदेव का संबंध विपरीत होने से यह मान्य नहीं है।) इस दिन गौरी व्रत भी किया जाता है। अत: इस दिन योगिनी गण सहित गौरी की पूजा करनी चाहिए। स्त्रियों को कुंद पुष्प, कुंकुम, लाल सूत, लाल फूल, महावर, धूप, अदरक, दूध, खीर इत्यादि से गौरी की उपासना करनी चाहिए। गणेश जी के अर्घ्य में जल, पुष्प, सुपाड़ी, अक्षत, फल, चंदन और दक्षिणा का प्रयोग करना चाहिए। इससे भगवान गणेश प्रसन्न होकर अभीष्ट फल प्रदान करते हैं।



 
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Sankashti Chaturthi - फोटो : Pixabay
व्रत कथा
पंडित बृजेश पांडेय के अनुसार, सतयुग मे नल नामक एक राजा था। जिसकी दमयंती नामक पत्नी थीं। जब राजा नल पर संकट आया और उसका घर आग में जल गया। सब कुछ खोने के बाद उसे अपनी पत्नी के साथ जगह-जगह भटकना पड़ा। इस प्रकार कष्ट प्राप्त करते हुए वे दोनो शरभंग ऋषि के आश्रम मे पहुंचे और अपनी दु:ख भरी कथा सुनाई। इस पर ऋषि ने उन्हें भगवान गणेश के व्रत के बारे में बताया और संकट के निवारण के लिए गणेश के व्रतार्चन की शिक्षा दी। इस व्रत को दमयंती ने सविधि व्रत किया। व्रत के बाद उसे अपने राज्य की प्राप्ति हुई। तभी से इस व्रत की परंपरा चली आ रही है।
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