सिद्धार्थनगर जिले के हल्लौर गांव की परंपरा विचित्र है। यहां तो लोग जीते जी अपने व परिवार के लिए कफन खरीद कर रख लेते हैं। साथ ही दोस्तों, रिश्तेदारों को भी तोहफे में कफन देते हैं और सभी इसे खुशी-खुशी कबूल भी करते हैं। शिया समुदाय में सौ फीसदी न सही, पर अधिकांश परिवार ऐसे जरूर मिल जाएंगे, जिन्होंने जिंदा रहते ही अपने लिए कफन खरीद कर रख लिया है।
दरअसल यह कफन होता तो आम ही की तरह, पर इस्लाम धर्म के आखिरी पैगंबर हजरत मोहम्मद मुस्तफा के नवासे हजरत इमाम हुसैन की पाक सरजमीन कर्बला से आने की वजह से खास हो जाता है। हल्लौर निवासी डॉ. तनवीर रिजवी, गुलाम कम्बर, कैसर अहमद, अनवार मेंहदी, वजीहुल हसन, ताकीब रिजवी, नफीस हैदर, शादाब हुसैन, जमाल हैदर, फजल अब्बास, हबीबुल हसन, शफीक रजा, आरजू अहमद जैसे न जाने कितने लोग हैं, जिन्होंने कफन मंगाकर रख लिया है।