गोरखपुर टेराकोटा
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सरकार ने बनवाकर दिया है कार्यशाला
विक्रम प्रजापति के घर के सामने ही सरकार की तरफ से बनवाया गया दो मंजिला कार्यशाला है। लक्ष्मी स्वयं सहायता समूह के 12 सदस्यों को इसमें दो-दो कमरे आवंटित हैं। इसमें इलेक्ट्रॉनिक चॉक, मिट्टी बनाने की मशीन, बने बर्तन व मूर्तियां आदि रखी जाती हैं। सामने के खाली परिसर में मूर्तियों को सुखाने और सामान लाने-भेजने का काम होता है। इन सभी कार्याें में 100 से अधिक मजदूर भी काम में लगे हैं, जो मिट्टी बनाने, पकाने और लोडिंग-अनलोडिंग में सहयोग देते हैं।
मिट्टी और कंडे की भी बढ़ी डिमांड
औरंगाबाद में तैयार मूर्तियों को खरीदने के लिए दूर-दूर से लोग आने लगे। इसे देखते हुए अगल-बगल के गांवों अशरफपुर, बेलवा रामपुर, रुपाडीह,भलवरिया, जंगल एकला नंबर-2 आदि के लोग भी यहां आकर मिट्टी की मूर्तियां बनाना सीखने लगे। अब वे अपने गांवों में अपना कारोबार चला रहे हैं। इस कार्य से जुड़े लोगों ने बताया कि एक कारीगर परिवार एक साल में तीन चार से चार ट्राली मिट्टी की खपत करता है। एक ट्राली मिट्टी पांच हजार रुपये में आती है। इसके अलावा मूर्तियों को पकाने के लिए प्रतिवर्ष 40 से 50 हजार रुपये का कंडा खरीदा जाता है। गांव के पशुपालकों से इसकी आपूर्ति नहीं हो पाती तो अगल-बगल के चार-पांच गांव में जाकर खरीदारी करनी पड़ती है।