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गोरखपुर का वह डॉन, जिसने 25 साल की उम्र में सीएम को मारने की ली थी सुपारी

Fri, 12 Jun 2020 08:28 AM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
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Sri prakash Shukla - फोटो : सोशल मीडिया।
90 के दशक में श्रीप्रकाश शुक्ला के नाम से यूपी में लोग कांपते थे। गोरखपुर के 25-26 साल के शार्प-शूटर से पुलिस के साथ अपराधी भी खौफ खाते थे। उस दौर में श्रीप्रकाश के पास एके-47 थी। इस डॉन को पकड़ने के लिए ही यूपी में एसटीएफ का गठन हुआ था। इसकी कहानी भी किसी फिल्म से कम नहीं है।
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Sri prakash Shukla - फोटो : सोशल मीडिया।
श्रीप्रकाश शुक्ला का जन्म गोरखपुर के ममखोर गांव में हुआ था। उसके पिता एक स्कूल में शिक्षक थे। 1993 में श्रीप्रकाश शुक्ला की बहन को देखकर किसी ने छिंटाकशी कर दी थी, उसने उस शख्स को बीच बाजार गोली मार दी थी।  श्रीप्रकाश ने 20 साल की उम्र में यह पहला अपराध किया था। बताया जाता है कि इस कांड के बाद वह बैंकॉक भाग गया  लेकिन, पैसे की तंगी के चलते उसे वापस आना पड़ा। वापस देश में आने के बाद उसने मोकामा (बिहार) का रुख किया और सूबे के सूरजभान गैंग में शामिल हो गया।
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बिहार सरकार के मंत्री बृज बिहारी प्रसाद। (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया।
वर्ष 1997 में लखनऊ में बाहुबली राजनेता वीरेंद्र शाही को श्रीप्रकाश शुक्ला ने दिन दहाड़े मौत के घाट उतार दिया था। इसके बाद तो यूपी में श्रीप्रकाश शुक्ला का आतंक कायम हो गया। इसके अलावा श्रीप्रकाश शुक्ला ने 13 जून 1998 को पटना स्थित इंदिरा गांधी अस्पताल के बाहर बिहार सरकार के मंत्री बृज बिहारी प्रसाद को उनके सुरक्षाकर्मियों के सामने ही गोलियों से भून दिया था। उसने इस घटना को एके-47 राइफल से अंजाम दिया था।

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पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह। (फाइल फोटो) - फोटो : amar ujala
इसके बाद 4 मई 1998 को यूपी पुलिस के तत्कालीन एडीजी अजयराज शर्मा ने राज्य पुलिस के बेहतरीन 50 जवानों को छांट कर स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) बनाई। इस फोर्स का पहला टास्क श्रीप्रकाश शुक्ला को जिंदा या मुर्दा पकड़ना था। इसके बाद श्रीप्रकाश उस समय सूबे के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की हत्या की सुपारी (ठेका) ले ली थी। बताया जाता है कि यह सौदा 5 करोड़ में तय हुआ था। उस समय श्रीप्रकाश शुक्ला की एक प्रेमिका भी थी जो दिल्ली में रहती थी। एसटीएफ को इस बात की जानकारी मिल गई थी।
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श्रीप्रकाश शुक्ला। (File Photo) - फोटो : सोशल मीडिया।
23 सितंबर 1998 को एसटीएफ के प्रभारी अरुण कुमार को सूचना मिली कि श्रीप्रकाश दिल्ली से गाजियाबाद की तरफ आ रहा है। जैसे उसकी कार इंदिरापुरम के सुनसान इलाके में दाखिल हुई, एसटीएफ ने उसे घेर लिया। श्रीप्रकाश शुक्ला को सरेंडर करने को कहा गया लेकिन वह नहीं माना और फायरिंग शुरू कर दी। पुलिस की जवाबी फायरिंग में श्रीप्रकाश मारा गया।  श्रीप्रकाश की मौत के बाद उसका खौफ भले ही खत्म हो गया था लेकिन जयराम की दुनिया में उसके आज भी चर्चे होते हैं।
 
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