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Zakir Khan Interview: तहजीब से हिंदू, परवरिश से मुसलमान हूं, गंगा में वजू करता, मैं ही तो हिंदुस्तान हूं...

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जाकिर खान एक्सक्लूसिव - फोटो : अमर उजाला
स्टैंडअप कॉमेडी की दुनिया में जाकिर खान का बड़ा नाम हैं। विरासत तो उन्हें शास्त्रीय संगीत की ही मिली थी संभालने को, लेकिन सुरों की बजाय वह दर्शकों के दिल सिफत से छूते हैं। ओटीटी के वह महारथी हैं और टेलीविजन पर उतरे हैं कॉमेडी के रण में, अपना खुद का शो, ‘आपका अपना जाकिर’ लेकर। जाकिर खान से ये खास मुलाकात की ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने।
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जाकिर खान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

शुरुआत हम नाम से ही करते हैं, किस ख्याल पर घरवालों ने रखा होगा आपका ये नाम?

जाकिर, मतलब जिक्र करने वाला। जो अच्छा वक्ता हो, लीडर हो! और, ये नाम रखा गया हिंदुस्तान के बहुत बड़े कलाकार जाकिर हुसैन के नाम पर जो तबला बजाते हैं। हम सांगीतिक परिवार से आते हैं। वालिद साब हमारे सितार बजाते थे और दादा जी सारंगी। दादाजी (उस्ताद मोइनुद्दीन खान) को पद्मश्री मिली है। जैसे शाहरुख खान के स्टारडम के दौर में बहुत सारे बच्चों का नाम राहुल पड़ा तो हमारे परिवार के राहुल बराबर स्टारडम अगर किसी का था तो वह रहा तबला वादक उस्ताद जाकिर हुसैन साब का। उन्हीं के नाम पर हमारा नाम रखा गया। और, तब, जब हम सितार बजाते तो लोग हमसे बार-बार पूछते, क्यों जाकिर तबला नहीं बजाते?
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जाकिर खान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

और, सितार शायद आपने बहुत छोटी उम्र में ही बजाना शुरू कर दिया था?

जी हां, चार साल की उम्र थी और हमारे वालिद साब दिल्ली से एक सितार खरीद कर लाए थे छोटी, हमने वह बजाना शुरू की। बड़ा हमको उस साज से बड़ा प्रेम है इसीलिए।

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माता-पिता के साथ जाकिर खान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

साज से आप आए आवाज की तरफ। बड़ा मुश्किल काम माना जाता है किसी के होठों पर मुस्कुराहट लाना और आपने ये काम सुरों से भी किए और अपने लफ्जों से भी...

मेरे ख्याल से जब आपका काम चलता है, तो लगता है कि हम बड़े तुर्रम खां हैं। हमने बहुत कुछ किया है। लेकिन, उम्र के साथ समझ आता है कि आपका क्या ही किया हुआ है इसमें। ये कई सारी पीढ़ियों की दुआएं हैं। मेहनत है जो शायद एक साथ मेरे हाथ में आकर फली हैं।
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जाकिर खान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

हां, आम खाने वाली पीढ़ी को पेड़ लगाने वाली पीढ़ी का शुक्रिया जरूर ही अदा करना चाहिए..

हमसे पहले की पीढ़ी यानी हमारे ताऊजी, चाचा आदि को उनके बुजुर्गों ने सिखाया। और, उनके बुजुर्गों ने उनको। हमने आपने दादा की शागिर्दगी में बहुत वक्त बिताया है। वह जिस लहजे में लोगों से बात करते थे, हम भी उसी को इस्तेमाल करते हैं, तो लोग बड़ा प्यार करते हैं। तो ये सब हमारे पहले की बातें हैं और यही संदर्भ है। दुनिया में एक ही बात सच है, वह है संदर्भ, बाकी सब झूठ है।
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जाकिर खान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

अच्छा, आपको अपना पहला इंटरव्यू याद है?

मेरे हिसाब से बहुत जल्दी आ गया था वह वक्त। सातवीं-आठवीं में थे और कोई म्यूजिक कंपटीशन जीत लिया था। अखबार में हमारा इंटरव्यू छपा था। अब आप सोचिए कि 12 साल के एक लड़के का क्या ही घमंड रहा होगा तब। और, जो रियाज पर हो। जीवन में हम जहां पहुंचे हैं, तो हमसे लोग कहते हैं कि तुममें घमंड क्यों नहीं है? मैं बस इतना कहता हूं कि सही टाइम में मिले हो। बचपन में मिल गए होते, तब बताता मैं।
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जाकिर खान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

तब क्या करते थे?

सीधे मुंह बात नहीं करना किसी से। आप तब सबसे अपनी ताकत पर मिलना चाहते हो कि हम तो आठ घंटे रियाज करते हैं, तुम कितना करते हो? तो हम उतनी अकड़ से उतर के यहां आए हैं। हमने पहाड़ की ऊंचाई देख रखी है। उस वक्त जब हमसे पूछा गया कि कि कैसा लग रहा है आपको जीत के? तो बचपना देखिए हमारा। हमने कहा, हमको पता था हम जीतने वाले हैं। उसमें लगने वाली क्या बात है।

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जाकिर खान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

अच्छा, तो ये सब बोला हुआ है आपने?

हां, बोला हुआ तो है। लेकिन, हम सब अब उन सारी बातों से अपना कोई ताल्लुक नहीं मानते हैं। हम कहते हैं कि नहीं नहीं, हम नहीं थे वो सब! हो गया गलती से..

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आपका अपना जाकिर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

और, वहां से होते हुए अब ‘आपका अपना जाकिर’!

ऐसा है कि आप अपने हिस्से का शो अगर नहीं बना रहे हैं, अगर आप अपने लिए दुनिया की सबसे बेहतरीन चीजों में खुद को नहीं देख रहे हैं तो लानत है आपके ख्वाब देखने के लिए। हमने तो सोच ही रखा था कि एक दिन हमारे नाम का भी शो आना है और फिर हम ऐसा करेंगे और उसमें यह करेंगे और उसमें ये बनाएंगे आदि, इत्यादि..

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भाइयों के साथ जाकिर खान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

लोग टीवी पर शोहरत पाकर ओटीटी पर जा रहे हैं और आपने शोहरत ओटीटी पर हासिल की और उसके दाम वसूलने टेलीविजन पर आ रहे हैं। क्या खासियत है इस शो की?

क्या बात है! सही तरीके से आपने इस पूरी बात को रख दिया। कार्यक्रम का नाम है, ‘आपका अपना जाकिर’, यानी इसमें हमारे साथ एक पूरा कुनबा चलता है। असल जिंदगी में भी हम ऐसे ही हैं। इस बंबई में भी हमारा बंबई अलग है। कुनबा लेकर चलने वाली जो हमारी आदत है, उस आदत को हम कभी ढंग से पेश नहीं कर पाते लेकिन, हम सारे काम इस कुनबे के साथ ही करते हैं। ये शो सिर्फ कॉमेडी तक सीमित नहीं है।

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जाकिर खान-कपिल शर्मा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

कॉमेडी शो में टेलीविजन पर जो लीक कपिल शर्मा ने पहले से बनाई है, उसे छोड़कर चलने की कितनी कोशिश रहेगी?

हमारी कोई ऐसी कोशिश नहीं है कि हम वैसा नहीं करेंगे और ऐसा करेंगे। 10-15 साल पहले अपने घर से जो सोच लेकर हम निकले थे, बस उसी को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। ‘मूवर्स एंड शेकर्स’ से लेकर या उसके पहले से भी जो कुछ होता आया है, वह भी इसमें होगा लेकिन मेरा एक अपना गुफ्तगू का अंदाज है जो लोगों से मैं करता हूं। हमारे वालिद साब कहते हैं कि रुई के धागे से तो सब टांका लगाते हैं जो मखमल से टांका लगाएगा, उसका नाम होगा।

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माता-पिता के साथ जाकिर खान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

मतलब, कि ये टांका आपने तलाश लिया है..

हमारा जो ये टांका है, साब। वह है बेहतर समझ का और सहानुभूति का। हम किसी की कीमत पर उससे कोई बात निकलवाना नहीं चाहते है। हम अपनी जिस तरह की हमारी परवरिश है, वैसा कुछ लेकर आए हैं। हम बहुत भावुक खानदान से आते हैं। हमारी अम्मी बड़ी इमोशनल हैं। मैंने जितनी वाह वाली चीजें सीखीं हैं, वह मेरे वालिद साब से मैंने सीखी हैं और जितनी आह वाली चीजें हैं और जिनसे लोगों का दिल मुझसे जुड़ता है, वे मैंने मेरी मां से सीखी हैं।

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जाकिर खान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

इस उम्र तक आते-आते जीवन का कौन सा फलसफा है इश्क मोहब्बत और दोस्ती में जो अब तक आपकी समझ नहीं आया या जिसके उस्ताद नहीं बन पाए?

एक चीज जो सबसे जरूरी और जो बहुत बड़ी है वह समझ में आई कि सबकुछ समझ में सबको नहीं आता और ये मान लेने की समझ हममें बहुत सही समय पर आ गई और हम बच गए अपने आप को बहुत ज्ञाता मानने से। देखा जाए तो हम पहुंच तो गए थे वहीं, लेकिन हम अब वापस आ गए हैं।

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जाकिर खान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

एक और चीज जो लोग ज़ाकिर खान से सुनना चाहेंगे या उनको पढ़ते देखना चाहेंगे, वह है आपकी शायरी साहब, क्योंकि आपकी शायरी कहीं अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है? कभी आएगी ये किताब की शक्ल में?

नहीं साहब, हमारी बिल्कुल दिलचस्पी नहीं है उसके अंदर भी। और, हम लिखते हैं अपने लिए। हमारा ये कोई दावा नहीं है कि ये दुनिया की सबसे बेहतरीन कविताओं की किताब है और शायरी की किताब है।

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जाकिर खान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

आपके इंस्टाग्राम पेज पर मुझे एक फोटो दिखी वाराणसी की। माथे पर चंदन लगाए और नीचे लिखा, तहजीब से हिंदू, परवरिश से मुसलमान हूं, गंगा में वजू करता, मैं ही तो हिंदुस्तान हूं...

हां, हमारा मानना है वह सब कुछ। हमारी परवरिश का हिस्सा है ये सब कुछ। जिस जमीन मैं पला बढ़ा हूं, जिस नियत से मैं पला बढ़ा हूं, उसमें मेरा यकीदा बहुत ज्यादा है। कोई चीज उसको हिला नहीं सकती । मैं हमेशा अपने हित की बात कहूंगा ही जो मुझे लगता है। और, मैं मैं किसी भी तरह के स्ट्रक्चर से बच के भी नहीं निकलूंगा।

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जाकिर खान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

और, ये मुस्कुराहट जो आपके चेहरे पर हमेशा रहती है क्या उसके बीज राम कथा में पीछे बैठकर सितार बजाते समय पड़े?

दो चीजें हमारे व्यक्तित्व को गढ़ती हैं, परवरिश और हादसे। ये राम कथाएं मेरी परवरिश का हिस्सा है। हमने बहुत तरह के संतों को सुना है। कथा का जो गूढ़ रहस्य है, वह उसको आकर्षक बनाता है। किस्से कहने की कला हमने रामकथा से ही सीखी। कितना खूबसूरत जीवन रहा है हमारा कि सेंट पॉल हायर सेकेंडरी स्कूल पढ़ते थे। शाम को घर आकर नमाज पढ़ने जाते थे और फिर दोस्त का बुलावा आता कि मंदिर में आकर मिलो हमको।

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जाकिर खान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

और, इंदौर के शनि मंदिर संगीत समारोह की तो बात ही निराली है...

हमारा बचपन गुजरा है शनि मंदिर के प्रांगण में। 14 दिन का वह समारोह और कौन नहीं आता है वहां। शास्त्रीय संगीत हमारी घुट्टी में रहा। लेकिन अब जो शास्त्रीय संगीत की प्रासंगिकता है वही घटती जा रही है, नहीं तो रात रात भर जागकर हमने क्या क्या लोगों को सुना है। एक चीज का घमंड हमको है कि बड़ा खूबसूरत बचपन हमने देख लिया।

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जाकिर खान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

यही छाप आपके काम पर भी दिखती है?

हां, उसको मैं अपने काम में लाता हूं। इसीलिए, मैं शरमाता नहीं हूं जब मैं कहता हूं कि ये मां बेटे का रिश्ता है, इसे सेकुलर ही रहने दो। मैंने अपने शहर में हाल ही में एक शो किया। बहुत दिनों के बाद किया था। तब मैंने कहा कि पिछले 12 साल जो हैं, वह मेरा वनवास था और आज जब मैं शो कर रहा हूं तो ये मेरी दिवाली है। लेकिन, मैं इसके लिए न कोई मेडल चाहता हूं और न ही इसके लिए नंबर बनाना चाहता हूं कि अरे देखो, मैंने क्या बोल दिया। मेरी जो संस्कृति है, वही मेरी करंसी है। जो मेरी मिट्टी से मुझे मिला और मैं क्यों न उसका फख्र करूं।

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जाकिर खान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

अभी तक आपके पास एक सहूलियत थी कि आपने एक शो बनाया एक घंटे का और उसे ओटीटी पर दे दिया। फिर अगला अपने हिसाब से बनाया, यहां टेलीविजन पर तो लगातार काम करना होगा? तो ये कितनी बड़ी चुनौती है?


नया तो है ही, साब। हम ऐसे ही किसी को कह रहे थे कि जब ग्यारहवीं में आए थे तो  ग्यारहवीं की पढ़ाई तो नहीं आती थी, कैसे जैसे साल भर तैयारी करी और साल निकाल लिया। और, जिनको आता है उनको भी क्या आता था क्या? सबने सब कुछ कहीं न कहीं से शुरू किया ही है। सीखा है। हमारी ये शुरुआत है। देखते हैं, कहां जाएगा?
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आपका अपना जाकिर-अमिताभ बच्चन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

एक बहुत अच्छी लाइन है कि कोई चीज पहली बार आपने आखिरी बार कब की थी..

हां, मैं चीजों को पहली बार करने पर बहुत ज्यादा भरोसा करता हूं। तभी तो हमारे शो की पहली लाइन ही यही है कि नए और पहले में फर्क होता है। आपके लिए नया होगा पर हमारे लिए ये पहला है।
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