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Shabana Azmi: अपने आप में एक्टिंग स्कूल हैं शबाना आजमी, कलाकारों के लिए आज भी प्रेरणास्त्रोत है उनकी ये फिल्मे

Thu, 17 Oct 2024 08:46 PM IST
सर्वजीत कृष्णा एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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शबाना आजमी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
शबाना आजमी हिंदी फिल्मों के इतिहास में एक बड़ा नाम हैं। उन्होंने अपने करियर में एक से बढ़कर एक फिल्में की हैं। साल 1974 में रिलीज हुई फिल्म 'अंकुर' से अपने करियर की शुरुआत करने वाली शबाना, मशहूर शायर कैफी आजमी की बेटी हैं। उन्होंने अपने करियर में कई शानदार फिल्में की हैं, जिस वजह से उन्होंने कई बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीता है।  वह 1983 से 1985 तक तीन साल तक लगातार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त करने वाली अभिनेत्री बनीं। बीते शुक्रवार को प्रतिष्ठित मामी मुंबई फिल्म महोत्सव में उनके 50 साल के करियर को मान्यता देते हुए प्रतिष्ठित एक्सीलेंस सिनेमा पुरस्कार से सम्मानित किए जाने का एलान किया गया है। इस मौके पर चलिए जानते हैं उनकी 10 बेहतरीन फिल्मों के बारे में। 
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शबाना आजमी - फोटो : इंस्टाग्राम
 'अंकुर' 
श्याम बेनेगल द्वारा निर्देशित फिल्म 'अंकुर' उनकी पहली फिल्म है। इस फिल्म में उन्होंने लक्ष्मी का किरदार निभाया है, जो एक गरीब महिला है, जिसकी शादी एक मूक-बधिर मजदूर से हो जाती है। इस फिल्म में उनके शानदार अभिनय और विशेष रूप से ग्रामीण महिलाओं की पीड़ा को चित्रित करने की उनकी अभिनय क्षमता की वजह से उन्हें काफी तारीफें मिलीं। इस फिल्म ने उन्हें अपने करियर का पहला सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिलाया। 
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 'शतरंज के खिलाड़ी'
साल 1977 में रिलीज हुई फिल्म 'शतरंज के खिलाड़ी' उनकी एक और ऐसी फिल्म है, जिसे दर्शकों से काफी सराहना मिली थी। फिल्म इस नाम से ही मुंशी प्रेमचंद की लिखी कहानी पर आधारित है। इसकी कहानी दोनों शतरंज खेलने वाले खिलाड़ियों पर आधारित है, जो खेल में इतने व्यस्त रहते हैं कि उन्हें अपने शासन तथा परिवार की भी फिक्र नहीं रहती। फिल्म को तीन फिल्म फेयर पुरस्कार मिले थे। 
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शबाना आजमी - फोटो : इंस्टाग्राम
'स्पर्श'
साल 1980 में रिलीज हुई फिल्म 'स्पर्श' भी शबाना आजमी की बेहतरीन फिल्मों में से एक है। इस फिल्म का निर्देशन सई परांजपे ने किया है। फिल्म में शबाना आजमी और नसीरुद्दीन शाह ने दृष्टिहीन प्रिंसिपल और शिक्षिका का किरदार निभाया है, जो अंधे लोगों की स्कूल में पढ़ाते हैं। फिल्म की कहानी और अभिनय काफी सूक्ष्म और मार्मिक लगती है, जो अंधे और देख सकने वाली दुनिया के बीच भावनात्मक और धारणाओं के अंतर को उजागर करती है। फिल्म ने सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता है। 
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'अर्थ' 
महेश भट्ट द्वारा निर्देशित 'अर्थ' साल 1982 में रिलीज हुई थी। इस फिल्म में शबाना आजमी ने पूजा का किरदार निभाया है,  जिसकी दुनिया तब बिखर जाती है, जब उसका पति उसे छोड़कर दूसरी महिला के पास चला जाता है। यह फिल्म पूजा की खुद को फिर से खोजने और पितृसत्तात्मक समाज में अपनी आजादी का दावा करने की उसकी यात्रा को दर्शाती है। फिल्म में उनका अभिनय काफी मासूम और भावनात्मक रूप से भरा हुआ था। इस फिल्म के लिए भी उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्रा का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। 

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शबाना आजमी - फोटो : इंस्टाग्राम@azmishabana18
 'मंडी' 
साल 1983 में रिलीज हुई श्याम बेनेगल की फिल्म 'मंडी' में शबाना आजमी ने एक अभिनेत्री के रूप में अपनी क्षमताओं का एक बार और प्रदर्शन किया। राजनीति, सत्ता और वेश्यावृत्ति के बारे में इस व्यंग्यपूर्ण फिल्म में, उन्होंने वेश्यालय की मालकिन रुक्मिणी बाई की भूमिका को बहुत ही शानदार और जटिल तरीके से निभाया। अभिनेत्री ने इस फिल्म में अपनी भूमिका के लिए वजन भी बढ़ाया। इसमें उनका किरदार प्रभावशाली होने के साथ-साथ कमजोर भी है। 
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'मासूम' 
शेखर कपूर निर्देशित साल 1983 की फिल्म 'मासूम' भी उनकी शानदार फिल्मों में से एक है। इस फिल्म में उन्होंने एक प्यारी पत्नी और मां की भूमिका निभाई है,  जिसे अपने पति की बेवफाई का सामना करने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जब उसका नाजायज बेटा उनके जीवन में प्रवेश करता है। इस फिल्म में उन्हें बेहद शानदार अभिनय का प्रदर्शन विश्वासघात, ईर्ष्या और स्वीकृति की भावनाओं को खूबसूरती से दर्शाती हैं। फिल्म में नसीरुद्दीन शाह ने उनके पति की भूमिका निभाई, जिनके साथ उनकी फिल्म स्पर्श भी काफी सफल रही थी। 
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शबाना आजमी - फोटो : ट्विटर
 'खंडहर'
साल 1984 की मृणाल सेन निर्देशित फिल्म 'खंडहर' में, आज़मी ने जामिनी का किरदार निभाया है, जो जीवन और प्यार से परित्यक्त एक महिला है। इसमें उनका किरदार एक खस्ताहाल हवेली में फंसी हुई है। यह फिल्म अकेलेपन और अधूरी इच्छाओं की एक उदासी भरी खोज है। फिल्म में वह बिस्तर पर पड़ी मां के प्रति कर्तव्य और प्यार की आशा के बीच फंसी हुई नजर आती हैं। अभिनय के मामले में ये फिल्म एक बेहतरीन उदाहरण है, जिस प्रकार शबाना आजमी ने अपनी अभिनय क्षमता का प्रदर्शन किया है। 
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 'फायर' 
साल 1996 की फिल्म 'फायर' भी शबाना आजमी की बेहतरीन फिल्मों में से एक है। दीपा मेहता निर्देशित इस फिल्म में उन्होंने अपनी सबसे विवादित और चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं में से एक को निभाया है। राधा की भूमिका में वो एक अधेड़ उम्र की महिला बनी हैं, जो प्रेमहीन विवाह में है और अपनी भाभी के साथ नाजायज संबंध में पड़ जाती है। कामुकता और अपनी इच्छाओं की खोज करने वाली महिला का उनका चित्रण काफी साहसी और भावनात्मक रूप से गहराई भरा है। 
 
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शबाना आजमी - फोटो : इंस्टाग्राम@azmishabana18
'गॉडमदर'
साल 1999 की फिल्म 'गॉडमदर' में एक बार फिर शबाना आजमी ने अपने शानदार अभिनय का प्रदर्शन किया। इस फिल्म में उन्होंने रंभी का किरदार निभाया है, जो अपने पति की मृत्यु के बाद राजनीति और अपराध की पुरुष-प्रधान दुनिया में सत्ता में आती है। यह जटिल किरदार एक दुखी विधवा से एक शक्तिशाली और निर्दयी मातृसत्ता के रूप में विकसित होता है। इस फिल्म में उनका अभिनय परिवर्तन काफी प्रभावशाली है। इस फिल्म से उन्हें एक और राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। 
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'मकड़ी'
साल 2003 की फिल्म 'मकड़ी' एक कॉमेडी हॉरर फिल्म है, जिसमें शबाना आजमी ने मकड़ी नाम के चुड़ैल का किरदार निभाया है। इस फिल्म को विशाल भारद्वाज ने लिखा और निर्देशित किया है। इस फिल्म के लिए शबाना आजमी को बतौर खलनायिका फिल्म फेयर अवॉर्ड के लिए नामांकित किया गया था। 
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