प्रियामणि
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
सिनेमा के बीते दो दशक परिवर्तन के दशक रहे हैं। कैमरे के सामने आपके भी दो दशक पूरे हो चुके हैं, कितना बदला है सिनेमा इस अंतराल में?
सिनेमा की तकनीक भले बदल जाए, लेकिन सिनेमा का मूल भाव जो दर्शकों के साथ दिल का रिश्ता जोड़ता है, वह कभी नहीं बदलने वाला। सिनेमा वही है जो लोगों को हंसा सके, रुला सके और जो भी वक्त दर्शक सिनेमाहाल के अंधेरे में गुजारे, उस वक्त में सिनेमा उसकी सारी तकलीफें भुला सके, यही सिनेमा का मूल मंत्र है।